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मीडिया के सामाजिक सराकारों में पूंजीपति रोड़ा
विज्ञापनों का बढ़ता दायरा चिंतनीय,
मौजूदा माँग के मुताबिक हो पत्रकारिता की
पढ़ाई, कलम का फिर जुड़े लोगों से
रिश्ता, वैचारिक विमर्श में बोले
विद्वजन,
राष्ट्रीय
पत्रकारिता पुरस्कार संगोष्ठी संपन्न
भविष्य का भारत और मीडिया की भूमिका को लेकर आज यहाँ हुए एक
परिसंवाद में पत्रकारिता,
साहित्य
और अभिनय क्षेत्रों की ख्यातिनाम हस्तियों ने विभिन्न दलीलों
के साथ मीडिया की भूमिका को विश्वसनीय बनाए जाने पर ज़ोर
दिया। उनका मानना था कि मीडिया के सामाजिक सरोकारों में
पूंजीगत खासा रोड़ा बन चुके हैं। विज्ञापनों का लगातार बढ़ता
दायरा चिंतनीय हो गया है। अब फिर से कलम का लोगों से रिश्ता
कायम होना जरूरी है। विश्वविद्यालयों में पत्रकारिता की पढ़ाई
में मौजूदा वक्त की माँग और जरूरतों का समावेश किया जाना
होगा। प्रदेश के जनसंपर्क विभाग की अगुवाई में यहाँ स्वर्गीय
माणिकचंद्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता पुरस्कार अलंकरण के
सिलसिले में हुए वैचारिक विमर्श में विद्वजन ने ये रायें
व्यक्त कीं। इसके साथ ही दो दिन तक चार सत्रों में विभिन्न
विषयों पर हुई इस संगोष्ठी का समापन भी हो गया।
मुख्य अतिथि के रूप में प्रख्यात टीवी सीरिअल अभिनेत्री
श्रीमती स्मृति ईरानी की इस मौके पर राय यह थी कि भारत के
भविष्य में मीडिया के रोल को लेकर आज तेजी से बढ़ता
विज्ञापनदाताओं का दखल ज्यादा चिंता की बात है। ऐसे में
सिध्दांतों की पत्रकारिता अब आसान नहीं रही है। श्रीमती
ईरानी ने कहा कि मौजूदा पत्रकारिता की शक्ल पर सवाल खड़े करने
के पहले हमें यह देखना होगा कि पत्रकार नौकरी किसकी कर रहे
हैं। ऐसे में उनके फर्ज मालिक के आदेश और इसके मुताबिक काम
करते हुए स्वयं के लाभ एवं हितों तक सिमट गए हैं। उन्होंने
पत्रकारिता के क्षेत्र की नई पीढ़ी का आव्हान किया कि अब उसे
देश के हित में फर्ज निभाने के लिए अपने ही विवेक पर अच्छे
और बुरे का निर्णय कर आगे का रास्ता तैयार करना होगा। अगर वे
खुद से पहले राष्ट्र के बारे में सोचेंगे तो यह राह आसान हो
जाएगी।
इस मौके पर सांसद और वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभात झा ने कहा
कि मीडिया का अतीत गौरवशाली रहा है और इसका भविष्य भी
शक्तिशाली है। जहाँ तक इसके वर्तमान की बात है तो वह भी
ज्यादा अशोभनीय नहीं है। उनका कहना था कि भारत तो पूरे विश्व
के भविष्य का उत्तर है,
इसलिए शक्तिशाली भारत के नवनिर्माण में
हमें कई असाधारण चुनौतियों से गुजरते हुए बाधाओं को पार करना
होगा। इस महत्वपूर्ण काम में सबसे बड़ा दायित्व मीडिया को
निभाना होगा। उन्होंने कहा कि वर्ष 2050
तक जबकि देश की आबादी 170
करोड़ हो चुकी होगी,
उसमें युवाओं की 70
प्रतिशत बड़ी
तादाद के साथ भागीदारी होगी। इस पीढ़ी को भविष्य की लड़ाई लड़ने
के लिए तैयार करते वक्त सक्षम बनाने के लिए हमें उसमें इस
माटी से भारतीयता का नक्शा खींचना होगा। श्री झा का मानना था
कि आज लोगों में नागरिक बोध के बजाय मतदाता बोध ज्यादा
परिलक्षित हो रहा है और इस बुराई के खात्मे के लिए भरपूर
जनजागरण जरूरी है। उनका यह मानना भी था कि समाज के अन्य
विभिन्न क्षेत्रों की तरह मीडिया में भी मूल्यों की गिरावट
आई है। चूँकि मीडिया पर जिम्मेदारियाँ ज्यादा हैं इसलिए उस
पर नज़रें भी ज्यादा टिकी हैं। उन्होंने अपील की कि मीडिया को
रोटी के आगे राष्ट्र को रखने का संकल्प लेना होगा और
राष्ट्रीयता को महत्व देकर जातीयता की प्रवृत्तियों को तोड़ने
में मददगार बनना होगा।
संगोष्ठी में अध्यक्षीय उद्बोधन देते हुए वरिष्ठ पत्रकार
श्री महेश श्रीवास्तव ने दृढ़ता से कहा कि पूंजीपतियों के
चंगुल से आजाद होने की हिम्मत दिखाए बगैर मीडिया के लिये
सामाजिक सरोकारों की बात बेमानी है। उन्होंने याद दिलाया कि
1977 तक उस
आदर्श पत्रकारिता का प्रभाव दिखता था जिसने आजादी की लड़ाई और
अन्य अनेक महत्वपूर्ण मोर्चों पर खुद को खरा साबित किया था।
इसके बाद के दौर में वास्तविकताओं से मुँह फेरने की एक
शुरूआत पत्रकारिता में दृष्टिगोचर हुई। पेयजल,
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे अहम मुद्दों की
बजाय मीडिया ने अपना ध्यान ग्लेमर,
सेक्स और बाज़ार में उपजी अन्य
प्रवृत्तियों की ओर आकृष्ट कर दिया। पत्रकारिता अधिकाधिक
विज्ञापन,
स्वयं और संस्थान
के आर्थिक लाभ-हितों की ओर मुड़ गई है। श्री श्रीवास्तव की
राय थी कि भारत के नवनिर्माण में मीडिया का सार्थक योगदान
पूंजीपतियों की कैद से आजाद हुए बगैर संभव नहीं होगा।
वैचारिक विमर्श में भाग लेते हुए माखनलाल चतुर्वेदी
पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति श्री अच्युतानंद मिश्र
ने कहा कि गुजरे वक्त में मीडिया की भूमिका सिर्फ संघर्ष,
टकराव और मूल्यों को स्थापित करने की थी।
भारतीय मीडिया का तो यह भी गौरवशाली इतिहास रहा है कि आज़ादी
की जंग लड़ने वाले कई श्रेष्ठ सेनानियों में पत्रकार या अखबार
निकालने वालों की तादाद ही ज्यादा थी। बाद में उस दौर के
अखबारों का तेज निरंतर घटा और उन्होंने व्यावसायिक चोला ओढ़
लिया। हाल ही के वर्षों में तो इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने
वैश्विक स्वरूप लेकर दूरदर्शन को चुनौती दे डाली। मीडिया में
वैचारिकता का पक्ष अब गुम होकर इसकी जगह समाचारों ने ले ली
है। लेकिन, इन पर भी लोगों का
भरोसा नहीं है क्योंकि उनकी विश्वसनीयता का स्तर नीचे चला
गया है। मीडिया,
सत्ता और
राजनैतिक दलों के बीच अलिखित समझौता हो गया है। उन्होंने यह
उम्मीद जताई कि पत्रकारिता की युवा पीढ़ी ही इस क्षेत्र की
मौजूदा प्रवृत्तियों को बदलने का साहस कर नया इतिहास रच
सकेगी।
संगोष्ठी में हिस्सेदारी दर्ज करते हुए वरिष्ठ पत्रकार श्री
श्रवण गर्ग ने कहा कि मीडिया ने आपातकाल के साथ ही आज तक
अन्य कई मोर्चों पर प्रभावी लड़ाई लड़ता रहा है। इस तथ्य के
मद्देनज़र भविष्य की संभावनाओं में मीडिया की भूमिका को नकारा
नहीं जा सकेगा। अलबत्ता,
मीडिया आज
कई संकट के दौर से गुजर रहा है जिनमें राजनेताओं द्वारा उसे
अपनी गिरफ्त में लेने की कोशिशें भी शामिल हैं। श्री गर्ग का
सुझाव यह भी था कि भविष्य में इस क्षेत्र के योगदान को
सुनिश्चित करने के लिए पत्रकारिता विश्वविद्यालय को मौजूदा
संदर्भों और माँगों के अनुरूप पाठयक्रम तैयार कर नई पीढ़ी
गढ़ना होगी।
वरिष्ठ पत्रकार श्री प्रभु जोशी ने कहा कि इलेक्ट्रॉनिक
मीडिया ने लोगों को एक मूक दर्शक की तरह घरों में सिमटा दिया
है। उसकी भूमिका तो रामराज्य के उस धोबी की तरह हो गई है
जिसे संदेह उत्पन्न करने से मतलब है,
इसके दुष्परिणामों से कोई सरोकार नहीं।
उन्होंने कहा कि यदि मीडिया को भविष्य के निर्माण में सहायक
होना है तो उसे इसके आधार के लिए अतीत से रिश्ता कायम रखना
होगा। उन्होंने कहा कि अनौपचारिक साम्राज्यवाद का जो खौफनाक
चेहरा आज मीडिया में झलक रहा है,
उसे वक्त रहते देश के अतीत,
वर्तमान और
भविष्य की चुनौतियों के मुताबिक बदलना होगा।
सचिव और आयुक्त जनसंपर्क श्री मनोज श्रीवास्तव ने संगोष्ठी
के विषय को प्रतिपादित किया और इसका संचालन युवा पत्रकार
श्री शरद द्विवेदी ने किया।
भारतीय संस्कृति और परम्पराओं के प्रसार के लिये राज संरक्षण
की आवश्यकता (स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता
पुरस्कार
2008)
स्वाधीन भारत राष्ट्र का बौध्दिक अतीत और भविष्य विषय पर
विमर्श
भारतीय संस्कृति और परम्पराएँ लिखी नहीं हैं,
बल्कि ये
प्रत्येक भारतीय के जीवन में हैं। आज चुनौती इस बात की है कि
इस गौरवशाली परम्परा का आगे किस प्रकार से प्रसार हो सके।
इसके लिये समाज में गहन चिंतन की आवश्यकता है। यह विचार आज
भारत भवन में स्व. माणिकचन्द्र वाजपेयी राष्ट्रीय पत्रकारिता
पुरस्कार के संबंध में आयोजित दो दिवसीय विमर्र्श के दूसरे
दिन आयोजित प्रथम सत्र में विद्वान वक्ताओं ने व्यक्त किये।
विमर्श सत्र के अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में दीनदयाल शोध
संस्थान के पूर्व सचिव एवं सांसद श्री महेशचन्द्र शर्मा ने
कहा कि प्रत्येक भारतीय को अपने राष्ट्र को सही समझने और
जानने की आवश्यकता है। कुछ वर्षो की अंग्रेजों की गुलामी ने
भारतीय परम्परा और ज्ञान को बदलकर रख दिया है। भारत के
हजाराें वर्षो के इतिहास को सीमित कर दिया गया है। भारत जैसे
महान देश को बनाने में वाणिज्य,
कला,
विज्ञान एवं
दर्शन क्षेत्र की महान हस्तियों ने योगदान दिया है। उनकी
पहचान दुनियाभर में है। श्री शर्मा ने कहा कि युवा पीढ़ी को
भारतीय संस्कृति व परम्परा के बारे में गहन शोध करने की
आवश्यकता है। इन शोधों के जरिये सही भारत की पहचान दुनियाभर
में हो सकेगी। उन्होंने भारतीय परम्पराओं और हिन्दु दर्शन को
वर्तमान पाठयक्रमों में शामिल किये जाने की वकालत की। श्री
महेशचन्द्र शर्मा ने कहा कि भारत की स्वागत की परम्परा रही
है। इसलिये किसी भी विषय पर खुले मंच पर पक्ष एवं विपक्ष पर
चर्चा होना चाहिये। इन चर्चाओं के बाद ही सार्थक तत्व का बोध
हो सकेगा।
विमर्श सत्र में बीज वक्तव्य देते हुये राजस्थान
विश्वविद्यालय जयपुर के प्रो. डॉ. मधुकर श्याम चतुर्वेदी ने
कहा कि स्वतंत्र भारत में जब शिक्षा व्यवस्था की नींव डाली
जा रही थी,
तब हमारे राजनेताओं ने भारत की प्राचीन
शिक्षा व्यवस्था की अनदेखी की। जिसके दुष्परिणाम अब तक देखने
को मिल रहे हैं। लम्बे समय तक भारत के संविधान में राष्ट्र
की गौरवशाली परम्परा और संस्कृति का उल्लेख तक नहीं था।
'सेक्यूलर'
शब्द की आड़ में बहुसंख्यक भारतीयों की
भावनाओं की अनदेखी की गई। देश का स्वाधीनता आन्दोलन का
इतिहास कांग्रेस का पर्याय बनकर रह गया। अरविन्द एवं तिलक
जैसे जननायकों के विचारों को पूरी तरह से मान्यता नहीं मिल
सकी। इन जननायकों का चिन्तन पश्चिमी चिन्तन से मेल नहीं खाता
था। आज भारत में आत्म हनन को भारतीय संस्कृति की पहचान दी जा
रही है। धर्म पर चर्चा करना निषेध हो गया है। आजादी के बाद
उन व्यक्तियों को महत्व दिया गया,
जो पश्चिमी
सभ्यता से प्रभावित थे। लेकिन इन सबके बाबजूद भारतीय चिन्तन
और परम्परा ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारता है। उम्मीद है इस
दिशा में हमारे द्वारा किये गये सार्थक प्रयास भारत को
दुनिया में स्वणिर्म राष्ट्र के रूप में पहचान दिला सकेंगें।
विमर्श सत्र में निराला सृजन पीठ के श्री रामेश्वर मिश्र
पंकज ने अपने उद्बोधन में कहा कि अंग्रेजों के समय से शिक्षा
व्यवस्था एवं विश्वविद्यालयों में वायसराय का दखल रहता था,
जिसका प्रभाव अब तक देखने को मिल रहा है।
उन्होंने कहा कि महामना मदनमोहन मालवीय ने काशी हिन्दु
विश्वविद्यालय की स्थापना की थी,
लेकिन आजादी के
बाद यह विश्वविद्यालय भी पश्चिमी प्रभाव से अछूता नहीं रहा।
उन्होंने देश के अनेक प्राचीन विश्वविद्यालयों के अस्तित्व
समाप्ति की ओर ध्यान आकृष्ट किया। श्री रामेश्वर मिश्र पंकज
ने हिन्दुओं के संरक्षण के लिये राष्ट्रपति की ओर से विशेष
संरक्षण दिये जाने की आवश्यकता बताई।
स्वागत भाषण में संस्कृति एवं जनसंपर्क सचिव श्री मनोज
श्रीवास्तव ने कहा कि स्वाधीन भारत की चर्चा करते हुये हमें
1947 के
बाद के वक्त का ही जिक्र नहीं करना चाहिये,
बल्कि हमारी हजारों साल पुरानी परम्परा
है। उन्होंने कहा कि आर्यभट्ट,
चरक, कौटिल्य,
एवं स्कन्ध गुप्त जैसे महान व्यक्तियों
के कार्यों की अनदेखी नहीं की जा सकती। इनके ज्ञान का लोहा
दुनियाभर ने माना है। उन्होंने उम्मीद व्यक्त की कि आने वाले
समय में भारत दुनिया का नेतृत्व करेगा। इस देश में यह
क्षमतायें हैं,
जरूरत केवल इसे
निखारने की है।
विमर्श सत्र के प्रारम्भ में अपर संचालक,
जनसंपर्क विभाग श्री आर.एम.पी. सिंह ने
अतिथियों का स्वागत किया। कार्यक्रम का संचालन सुश्री अनुपमा
चौहान ने किया। कार्यक्रम में अपर संचालक,
जनसंपर्क विभाग
श्री रज्जु राय ने सभी के प्रति आभार व्यक्त किया।
स्वाइन फ्लू के इलाज के लिए भारत सरकार के नए मार्ग निर्देश
अस्पताल में आने वाले रोगियों के लक्षणों के आधार पर इलाज की
श्रेणियां बनाई गई
स्वाइन फ्लू के रोकथाम और इलाज के लिये भारत सरकार ने तीन
श्रेणियां बनाई हैं। इस संबंध में सभी संयुक्त संचालक
स्वास्थ्य,
चिकित्सा
महाविद्यालयों के अधिष्ठाताओं और मुख्य चिकित्सा एवं
स्वास्थ्य अधिकारियो को दिशा निर्देश भेजे गये हैं। इन दिशा
निर्देशों में भारत सरकार द्वारा दी गई गाईड लाइन के अनुसार
मरीजों का इलाज करना सुनिश्चित करने को कहा गया है।
श्रेणी ए के तहत किये जाने वाला इलाज
भारत सरकार द्वारा भेजे गये दिशा निर्देशों में कहा गया है
कि श्रेणी ए में जिन मरीजों को हल्का,
साधारण बुखार हो खाँसी हो,
गले में खर्राश हो और शरीर में दर्द होने
के साथ उल्टी दस्त की शिकायत हो उनका आवश्यक स्वास्थ्य
परीक्षण कर उपचार किया जाए। ऐसे मरीजों को भर्ती करने एवं
टेमीफ्लू की गोली देने की आवश्यकता नहीं है और न ही उनके एच-1,
एन-1 की जाँच
के लिये सैम्पल लेने की आवश्यकता है। निर्देशों में कहा गया
कि इन मरीजों की बीमारी पर अगले 24
से 48
घण्टे तक की
मॉनीटरिंग की जाए और उन्हें घर पर ही रहकर आराम करने तथा
परिवार के सदस्यों एवं अन्य लोगों से संपर्क नहीं करने की
सलाह दी जाए।
श्रेणी बी के तहत किये जाने वाला इलाज
श्रेणी बी में उन मरीजों को रखा गया है जिन्हें तेज बुखार के
साथ श्रेणी ए में बताए गए लक्षण भी हो। इसके अतिरिक्त पाँच
साल से कम आयु के बच्चे,
गर्भवती महिलाएं, 65
वर्ष से अधिक आयु के व्यक्ति,
ऐसे व्यक्ति जिनको फेफड़े,
ह्रदय, लीवर,
गुर्दे,
मधुमेह, कैंसर,
एचआईवी आदि की बीमारी हो अथवा लम्बे समय
से वे कार्टीजोन ट्रीटमेंट लेने वाले रोगी हों। इस वर्ग के
सभी रोगियों को सामान्य उपचार के साथ टेमीफ्लू टेबलेट से भी
उपचार करने को कहा गया है। इन मरीजों को न ही भर्ती करने की
आवश्यकता और न ही एच-1, एन-1
की जाँच
के सैम्पल लेने की जरूरत है। इन मरीजों की भी सतत मॉनीटरिंग
करने तथा उनके घर पर उपचार करने तथा आराम करने तथा परिवार के
सदस्यों एवं अन्य लोगों से सम्पर्क नहीं करने के सलाह देने
के निर्देश दिए गए हैं।
श्रेणी सी के तहत किये जाने वाला इलाज
श्रेणी सी में वे मरीज आयेंगे जिन्हें ए और बी श्रेणी में
बताए गए लक्षणों के साथ ही साँस लेने में तकलीफ हो,
छाती में दर्द हो,
बल्ड प्रेशर कम हो,
खखार में खून आए,
नाखून नीले पड़ जाए,
भोजन न करें तथा चिड़चिड़ापन आदि लक्षण हो
तो ऐसे मरीजों को तत्काल अस्पताल के प्रायवेट रूम#आईसोलेशन
वार्ड में भर्ती कर अन्य आवश्यक उपचार के साथ टेबलेट
टेमीफ्लू से भी उपचार करने के निर्देश दिए गए हैं साथ ही इन
रोगियों के एच-1, एन-1
की जाँच
सैम्पल एकत्रित कर एनआइसीडी लैब भेजने को कहा गया हैं।
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