|
|
|
|
 |
अध्यात्म
नवयुग के पत्रकारों की
गढी ज़ा रही है एक पीढ़ी
विश्वविद्यालय परिसर में नवयुग के नए पत्रकारों को
गढ़ा जा रहा है। ऐसे पत्रकार, जो न केवल अपनी
योग्यता-प्रतिभा की दष्टि से अनूठे हों, बल्कि
व्यक्तित्व की दष्टि से भी विशिष्ट हों। जिन्हें
पत्रकारिता के पवित्र उद्देश्यों में आस्था हो, जो
इसके सामाजिक दायित्व से सुपरिचित हों, जिनको इस
सत्य का ज्ञान हो कि पत्रकार एवं पत्रकारिता का
मकसद समाज में नैतिक क्रांति, बौद्धिक क्रांति एवं
सामाजिक क्रांति की अलख जगाना है। आज के युग
मेंपत्रकारिता एवं जनसंचार माध्यम धन एवं
व्यावसायिकता की चकाचौंध में डूबे हुए हैं,
आदर्शों की बातें कुछ अजब सी लगती हैं, परनतु जो
संकल्प के धनी हैं, वे इस विचित्र स्थिति में भी
अपनी विशिष्ट पहचान बनाए रखते हैं।
देव संस्ेंति विश्वविद्यालय में पत्रकारिता एवं
जनसंचार विभाग की शुरुआत वर्ष 2005 के जुलाई सत्र
से की गई थी। अध्ययन-अध्यापन के उचित संसाधनों का
यहां प्राय: अभाव था, इसीलिए डिप्लोमा एवं मास्टर
डिग्री के प्राय: सभी पाठयक्रमों को नई दिल्ली के
गायत्री चेतना केन्द्र में पूरा कराया गया। इस बैच
के विद्यार्थियों को वहलृ पर नई दिल्ली के विशिष्ठ
एवं वरिष्ठ विशेषज्ञ विषय का ज्ञान देते रहे और
गायत्री चेतनाकेंद्र का वातावरण उन्हें
आध्यात्मिकके संस्कार देता रहा। बीच-बीच में इन
विद्यार्थियों को विश्वविद्यालय परिसर मेंं बुलाकर
उनके व्यक्तित्व को विशिष्ट बनाने का कार्य भी
किया गया। इस बैच के विद्यार्थियों के
अध्ययन-अध्यापन में कई तरह की अस्थिरता एवं
असुविधाएं थलृ, परन्तु 2007 के जुलाई मास में
इन्होंने सफलतापूर्वक अपना अध्ययन पूर्ण किया।
इसके बाद अपनी इंटर्नशिप की अवधि भी पूरी की।
अक्टूबर-नवंबर माह की अवधि में इस बैच के
विद्यार्थी पत्रकारिता के व्यवसाय से जुड़ने लगे।
कुछ नेप्रिंट मीडिया की राह पकड़ी तो कुछ ने
इलेक्ट्रानिक मीडिया को अपना कार्यक्षेत्र बनाया।
इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जिन्होंने अपने पास आए
कई आकर्षक प्रलोभनों को ठुकराकर विश्वविद्यालय के
पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग में ही अपनी सेवाएं
देने का निश्चय किया।
आज की स्थिति में देव संस्ेंति विश्वविद्यालय में
पढे हुए और गढ़े हुए विद्यार्थी अलग-अलग स्थानों पर
कार्यरत हैं। इनमें से कुछ दैनिक भास्कर नाम के
प्रतिष्ठित समाचार समूह में कार्य कर रहे हैं तो
कुछ ने दैनिक जागरण्ा समाचार समूह में अपनी सेवाएं
दी हैं। कई विद्यार्थी यहां से जाने के बाद
राजस्थान पत्रिका से जुड़कर पत्रकारिता को नई धार
दे रहे हैं। किसी ने नई दिल्ली के नवप्रकाशित आज
समाज से जुड़कर अपनी पत्रकारिता को और भी तराशने का
काम शुरू किया है। नई दुनिया का समाचार समूह में
भी यहां के विद्यार्थी कार्य कर रहे हैं। प्रिंट
मीडिया की दुनिया के इन स्थापित हस्ताक्षरों के
साथ अपने व्यक्तित्व को जोड़कर जो लोग काम कर रहे
हैं, उन्होंने इस कुछ ही समय में अपने वातावरण में
देव संस्ेंति के वैभव एवं गौरव को बिखेरा है।
पत्रकारिता एवं जनसंचार के इस पहले बैच के कई
छात्र-छात्राएं इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी अपनी
प्रतिभा को नियोजित कर रहे हैं। इलेक्ट्रानिक
मीडिया के जिन क्षेत्रों में अपने यहां के
विद्यार्थी काम कर रहे हैं, उनमें से प्रमुख हैं-
मैट्रिक्स मल्टीमीडिया, एस-1 टीवी चैनल, जी-न्यूज
एवं नवस्थापित न्यूज चैनल अब तक। इन सभी स्थानों
में काम करने वाले इन छात्र-छात्राओं ने अपने
व्यक्तित्व की विशिष्टता की छाप अंकित की है।
जहां भी अपने विद्यार्थी काम कर रहे हैं, उनसे
मिलने के लिये एवं उनके कार्यकारी अधिकारियों से
संपर्क स्थापित करने के लिये अभी कुछ ही समय पूर्व
विभाग के समन्वयक गए थे। यहां के विभाग एवं
विश्वविद्यालय दोनों को ही उत्सुकता थी कि अपने
छात्र-छात्राएं बाहर जाकर कैसा काम कर रहे हैं?
उनकी योग्यता अन्यों की तुलना में कैसी है? इन
प्रश्नों के उक्तार में जो प्रतिक्रियाएं मिललृ,
वे न केवल उत्साहवर्द्धक थलृ, बल्कि यह भी
प्रमाणित करथलृ कि विश्वविद्यालय के पत्रकारिता
एवं जनसंचार विभाग ने अपने उावल भविष्य की ओर
सार्थक कदम रखा है। उदाहरण के लिए अब तक न्यूज
चैनल के लिये हुई साक्षात्कार परीक्षा में कई
संस्थानों के छात्र-छात्राएं आए हुए थे। इनमेंसे
कुछ एक संस्थान ऐसे थे, जो पत्रकारिता एवं जनसंचार
के क्षेत्र में अपना विशिष्ट वर्चस्व रखते हैं,
लेकिन परीक्षा की कसौटी पर यहां के छात्र
अपेक्षोंत बहुत खरे साबित हुए। साक्षात्कार
परीक्षा समाप्त होने के बाद, साक्षात्कार लेने
वाले अधिकारियों ने जब उनसे पूछा कि आप ने अपनी
पढाई कहां से पूरी की है तो उन्होंने उक्तार में
देव संस्ेंति विश्वविद्यालय का नाम लिया। सुनने
वालों को पहले तो यह नाम बड़ा अटपटा सा लगा, लेकिन
जब बाद में इन विद्यार्थियोंने विश्वविद्यालय का
विस्तार से परिचय दिया तो सुनने वालों ने कहा-
अच्छा, ऐसा है। किसी आध्यात्मिक संस्था से जुड़े
हुए लोग भी प्रतिभा को विकसित करने के लिये इतने
अधिक प्रयत्नशील हैं, ऐसा कहलृ देखने में नहलृ
मिलता। फिर भी यह तामानना पड़ेगा कि देव संस्ेंति
विश्वविद्यालय टेलेंट पैदा कर रहा है।
दैनिक जागरण समाचार समूह के विभिन्न संपादकों से
जब विश्वविद्यालय के पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
के समन्वयक ने बातचीत की तो उन्होंने कहा- आपके
यहां के विद्यार्थी कुछ खास हैं, पढाई-लिखाई के
ढंग से योग्य तो हमारे पास और भी लोग हैं, पर जो
लोग आपके यहां से आए हैं, वे योग्यता में इक्कीस
तो हैं ही, काम के प्रति जिम्मेदार भी हैं। उनकी
लगन एवं मेहनत का भी कोई जवाब नहलृ। ऊपर से वे सब
शिष्ट-शालीन, मिलनसार,दूसरों को सम्मान देने वाले
हैं। ऐसे लोग आजकल कहलृ ढूंढे से नहलृ मिलते। अंत
में अपनी बात पूरी करते हुए इन संपादक महोदय ने
कहा- सच तो यह है कि देव संस्ेंति विश्वविद्यालय
की अपनी अलग ब्रांड है। आपका संस्थान इस नजमाने को
क्या दे रहा है, इसकी कल्पना शायद आप वहां बैठकर
नहलृ कर सकते, पर हम लोग इस सच को अनुभव कर रहे
हैं। पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग के विभिन्न
छात्र-छात्राओं ने ऐसी और भी की अनुभूतियां अपने
और विश्वविद्यालयके आंगन में उंड़ेली हैं। यह सब
इतना अधिक है कि यदि इसे पूरा लिखा जाए तो संभवत:
एक पुस्तक का कलेवर भी कम पड़ जाएगा। हालांकि इन
अनुभूतियों को पाकर पत्रकारिता एवं जनसंचार विभाग
के समन्वयक एवं शिक्षक अभी संतुष्ट नहलृ हैं।
उन्होंने अगले दिनों पत्रकारिता-जगत में नए
प्रतिमान स्थापित करने का निश्चय किया है। इस क्रम
में वर्तमान पाठयक्रम के द्वारा (1) आर्थिक, (2)
राजतनीकि, (3) सांस्ेंतिक-धार्मिक, (4) खेल,
शिक्षा, स्वास्थ्य, विज्ञान, अपराध की विशेष
धाराओं के विशेषज्ञ पत्रकार बनाने के लिये कमर कस
ली है। ये तीव्रतर प्रयास निश्चित ही अगले दिनों
में चमत्कारी परिणाम पैदा करने वाले होंगे।
साभार : अखण्ड ज्योति (देव संस्ेंति
विश्वविद्यालय, शांतिकुंज, हरिद्वार)
एक
सामयिक चिंतन
यह कैसा लोकतंत्र? यह कैसी आजादी ?
भारत की आजादी को साठ साल पूरे
हुए। सन 1947 में विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतंत्र
अंग्रेजों के हाथ से स्वतंत्र हुआ था। ढेरों ने
अपनी कुरबानियां दी थलृ। अगणित अज्ञात स्थिति में
ही शहीद हो गए। न कहलृ किसका नाम आया, न
प्रशस्तिपत्र ही मिला, पर उनने इसकी चिंता नहलृ
की। दक्षिणेश्वर की माटी हाथ में लिये, जेब मे
गीता की छोटी पुस्तिका रखे न जाने कितने फांसी पर
चढ़ गये,न जाने कितनों ने सारा जीवन अविज्ञात
स्थिति मेंबिताकर देश की आजादी के लिये स्वयं व
परिवार को भूखा रखा, नगण्य से साधनों के लिये
स्वयं व परिवार को भूखा रखा, नगण्य से साधनों में
जिए एवं गुमनामी के परदे के पीछे चले गए। ढेरों
साहित्यकार, स्वयंसेवक स्तर के कार्यकर्ता, आजादी
के आंदोलन के सिपाही, सत्याग्रही, सविनय अवज्ञा
आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर अवज्ञा
आंदोलन का पालन करने वाले गांधी के अनुचर, खादी को
जीवनव्रत बना लेने वाले व्यक्ति एक उज्जवल भविष्य
वाले भारतवर्ष की उम्मीद में जीवन जीते रहे पर
नाउम्मीद होकर इस धरती से चले गए। हमारे शहीदों ने
कहा था कि हमारी चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले। पर
क्या ऐसा हुआ, लगता है, आजादी आने के बाद एक एसी
खुमारी छाई कि हम सारे त्यागी बलिदानियों को भूल
गये। पश्चिम की नकल में, काले आंग्रेजों की
दुरभिसंधियों में हम कहलृ भटक गये। पहले हमें
लूटने वाले मात्र ब्रिटिश रुल वाले बाहर से आए
आक्राता थे,पर अब अपनाने ही हमें लूटना आरंभ कर
दिया। प्रशासनिक अधिकारियों की एक नई कौम
अंग्रेजों द्वारा स्थापित अकादमियों से निकलने
लगी। यह वह थी, जो प्रतिभा संपन्न थी, पर देश की
मिऑंी से जिसका वास्ता नहलृ था। इसने अपने हिससे
देश को चलाना शुरू कर दिया। परिणाम वही हुआ कि
कहलृ हम गड़बड़ा गये। बड़े सपने देखे थे हमारे
गांव-कसबों के लोगों ने। सोचा था, जमलृदारों खतम
हो गई, बड़े-बड़े राजे महाराजे, उनके राज्य ध्वस्त
हो गएअब वे चैन की सांस ले सकेंगे, पर नये जमलृदार
पैदा हो गए। भूदान आंदोलन अपने समय का एक सबसे पड़ा
यज्ञीय भाव से चला अभियान था। पर क्या हुआ? जिन
किसानों को पआाँ मिला, वे आज भी भूमिहीन हैं।
बहुराष्ट्रीय कंपनियाने डेरा डाल दिया। विशेष
आर्थिक क्षेत्र (सेज) की लूट-खसोट में हमारी
सिंचित ेंषि भूमि अब शहीदेंत या पूंजीवादी को
अमानत बनने जा रही है। ढेरों उपजाऊ, भूमि, बाढ़ या
अकाल से जूझने की व्यवस्था न बन पाने के लिये
कारण्ा, प्रोंतिक 0ष्टि से सबसे समृद्ध, इस देश से
रोज निर्दयतापूर्वक समुद्र मे झोंक दी जाती हैं-
भूमि के कटने के कारण-नवीनीकरण के कारण रासायनिक
खादों का ऐसा षड़यंत्र चला कि उपजाऊ जमीन बंजर हो
गई एवं किसान आत्महत्या को मजबूर हो रहे हैं।
जेनेटिकली इंजीनियर्डई ेंषि ऐसी आई हैं कि हम क्या
खा रहे हैं। क्या बन रहे हैं, इस भयावह चित्र की
लोगों को कल्पना ही नहलृ है। बेरोजगारी बढ़ती जा
रही है। विश्वविद्यालय-महाविद्यालय छोड़ देने वालों
कीसंख्या भी बढ़ी है। एक बड़ा तबका उच्च शिक्षा से
वंचित है। नशेबाजी के भंवर में सारा देश डूबा
दिखाई देता है। कभी हिचकोले लेता है, कभी लगता है
कि तरुणाई कहलृ हमसे छिन न जाए। सामाजिक कुप्रचलन
इस वैज्ञानिक सदी में भीबढ़ते जा रहे हैं।
अंधविश्वास , मूढ़मान्यताएं, बलि प्रकरण, भूत-प्रेत
आदि के किस्से चैनलों के लिये ऊंची टीअारपी क़े
माध्यम से बने हुए है। जैसे-तैसे हम इलेक्ट्रानिकी
में प्रगति कर रहे हैं, लोगों की मानसिकता और पिछड़
रही हैं। जातिवाद का विषवृक्ष कुछ ऐसी जड़े जमाए
फैला है कि आज भी दलित वर्ग सवर्ण कहे जाने वालों
के खिलाफ कुछ नहलृ कह सकता। सारी राजनीति इसी से
संचालित है। जो विभाजन व्यक्तित्व की विशेषताओं के
आधार पर गुण-कर्म के मूलआधार पर था, वह अब जन्म से
माना जाने लगा है एवं आरक्षण की आग में सारा देश
जलता दिखाई दे रहा है। राष्ट्रीय संपक्तिा को नष्ट
करने में किसी को दरद नहलृ होता। असुरक्षा वातावरण
ऐसा है कि आप कहलृ भी जाएं, आपको नहलृ माकि आप
सुरक्षित पहुंच पाएंगे या नहलृ। धनी और बनते जा
रहे हैं एव गरीब और निर्धन गांव उजड़ रहे हैं,
शहरों के पेट में समा रहे हैं। अब कोई गांव में
रहना नहलृ चाहता। अपसंस्ेंति ने, अपराधों ने वहां
भी पैठ बना ली है। सरपंचोकी भ्रष्ट राजनीति ने
गांवों की एकता नष्ट कर उन्हें भी बांट दिया है
एवं लगता है कि सब कुछ दांव पर लग गया है। क्या
यही आजादी है, क्या यही लोकतंत्र है, जिसमें एक
वैज्ञानिक-मनीषी ऋषि स्तर का व्यक्ति पुन:
राष्ट्रपति नहलृ ब सकता, क्योंकि दलीयराजनीति का
समीकरण उसके पक्ष में नहलृ है। क्या संविधान में
संशोधन कर जनता सीधे उसे नहलृ चुन सकती है? सभी
बेबस है। आस लगाये बैठे हैं। कहलृ से कोई अवतार
आयेगा और हमें रास्ता दिखायेगा। यह स्पष्ट समझ
लिया जाना चाहिए। जिस देके तथाकथित प्रबुद्ध अपने
वोट का उपयोग तक नहलृ करते, राष्ट्रीय मुद्दों पर
खुलकर बहस में भाग नहलृ लेते, कुछ सक्रिय आंदोलन
चलाने की बात कहलृ सोचते, वह देश कैसे सोचे कि ये
प्रतिभाशाली देश का उबार लेंगे। कोहरा और घना होता
है। हाथ को हाथ नहलृ सूझता। ऐेसी स्थिति दिखाई
देतीहै। क्या करें? कुछ समय नहलृ पड़ता। ऐसे में
गैरराजनीतिक स्तर पर, आत्यात्मिक क्रान्ति के स्तर
पर ही कोई पहल उठे तो उससे कुच उम्मीद की जा सकती
हैं। जब तक जनमानस जागेगा नहलृ, बदलाव आयेगा।
परमपूज्य गुरुदेव ने स्थान-स्थान पर लिखा व कहा है
कि राजनीति एवं दलदल है। इसमें प्रवेश नहलृ करना
है, पर इसका मार्गदर्शन करना है। सही व्यक्तियों
को चुनने का विवेक पैदा करना है। भारत की वर्तमान
राजनीति का पतझड़ आरंभ होकर विनाशकी ओर बढ़ रहा है।
यह जितने दिन टिकेगी, कभी बसंत नहलृ आने देगी।
ढेरों दल हैं, पर वे राजनीति के कब्रिस्तान बन गए
हैं। बाराह की तरह कीचड़ में लोट-पोट करते राजनीति
के व्यक्ति अपने में प्रसन्न है। किसी तरह अपना
पेट भरना,राष्ट्र मंदिर को नोचना-खसोटनाकी उनका
काम रह गया है। अब राजनेताओं में किसी को कोई
मसीहा नहलृ नजर आता। एक बहुत बड़े कामेडी मंच के
सभी पात्र बन गये हैं। एक साप्ताहिक पत्रिका ने
अपने सर्वेक्षण में सिद्ध किया है कि अस्सी
प्रतिशत भारतीय राजनेताओं से घृणा करते हैं कि यदि
सचमुच ऐसाहै तो हम सभी को मिलकर राष्ट्र चिंतन
करना होगा। क्या यही हमारे हीरी हैं, जो माफिया,
अपराधियां, भ्रष्टाचारियों से सांठ-गांठ कर हमारी
नियति निर्धारण कर रहे हैं। टुंकड़ों-टुकड़ों में
देश को बेच रहे हैं। यह आजादी का महापर्व बड़े ही
विलक्षण क्षणों में आया है एवं हम सभी से अपेक्षा
रखता है कि यदि हमें भविष्य की पीढ़ी की नीतियों
निर्धारण करेंगे। सन 1970 के अक्टूबर की अखंड
ज्योति के संपादकीय में एक महत्वपूर्ण लेख 7
पृष्ठों का प्रकाशित हुआ था- हम राजनीति में भाग
क्यों नहलृ लेते? यह उस जमाने मेंमथुरा से विदाई
से पूर्व उनका (पूज्य गुरुदेव का) उन सभी को एक
प्रकार से उक्तार था, जो उनसे इस संबंध में
स्पष्टीकरण की उपेक्षा रख रहे थे। इतना बड़ा संगठन
क्या राजनीति से निर्यात दूर रहेगा। उनसे जवाब
दिया कि राष्ट्र के रचनात्मक नवनिर्माण के लिये
तंत्र में रहकर नहलृउससे दूर रहकर अधिक ठोस,
निष्कलंक एवं प्रामाणिक कार्य किया जा सकता है। यह
लेक बाद में एक छोटी पुस्तिका के रूप में भी
प्रकाशित हुआ। इसमें तेईस साल के आजादी के बाद के
शासन की समीक्षा भी थी। पज्यवर स्वयं आजादी के
स्वतंत्रता संग्राम सैनिक रह चुके थे। युवावस्था
में किया गया वह संघर्ष उन्हें बार-बार समकालीन
परिस्थितियों पर लिखने को विवश भी कर रहा था। इस
लेख ने मिशन के सभी कार्यकर्ताओं को भी स्पष्ट राह
दिखा दी कि हमारा लक्ष्य जनमानस का भावनात्मक
नवनिर्माण है। राष्ट्र की सांस्ेंतिक आजादी है।
नैतिक-चारित्रिक उत्थान है। शिक्षा एवं विद्या का
समन्वय कर शिक्षण तंत्र में आमूलचूल परिवर्तन है।
आत्मबल संवर्द्धन कर राष्ट्र को समर्थ, सशक्त
नागरिक देना है, पर एक प्रश पूज्यवर के महाप्रयाण
के सत्रह वर्ष बाद उठता है कि सक्ताा के मद में
डूबे, वारुणी पीकर उन्मत राजनीतिक समुदाय को
सच्चिंतन सिखाएं तो कैसे? कैसे उनकीवह खुमारी
मिटाए, जो उन्हें प्रमादी भ्रष्ट तो बना ही रही
है, कुछ कार्य सक्रिय होने पर ऐसे करा रही, जिनसे
राष्ट्र की प्रगति का चक्र विपरीत दिशा में घूम
सकता है। इसी अंक में एक लेख हैं, जिसमें आज के
भारत की उावल तस्वीर दिखाई गयी हैं, पर वह है आज
से चालीस वर्ष बाद वह भवितव्यता है। होना ही है,
पर होगा तब, जब हम अभी से प्रयास में निरत होगे।
तरीका एक ही है- अध्यात्म तंत्र जागे (यहां ध्यान
रखे), धर्म तंत्र-बाबाजी लोगोंने उपदेशकों को
चर्चा नहलृ हो रह है), इसमे गैरराजनीतिक स्तर पर
सक्रिय प्रबुद्ध व्यक्ति जुड़े एवं जन-जन का
वैचारिक परिष्ककरने के लिये तत्पर हों। वैज्ञानिक
अध्यात्मकवाद, आध्यात्मिक मानववाद की धुरी पर सब
धर्म जातियां मिलकर एक हो जाते हैं। फिर राष्ट्र
देवता की प्रधान हो जाता है। आज का युगधर्म हमसे
यही कहता है कि चाहे हम भगवान को पजें न पूजें पर
आत्मदेवता को तो पहचानें-निखारें, आत्मबल बढ़ाएं,
जीवन देवता की साधना करें एवं समाज के नवनिर्माण
के लिये स्वयं को होम दें। इसके द्वारा माहौल ऐसा
बने के राजनीतिक वर्ग समर्थ सशक्त प्रबुद्ध
नागरिकों-जनमानस की बात सुनने पर विवश हो जाए।
इसके लिये जनमोर्चा बने, आंदोलन चलें, रैलियां
निकलें, पदयात्राएं हों, प्रिंट व इलेक्ट्रानिक
मीडिया को विश्वास में लिया जाए। यह आपदधर्म है।
इसे निभाना ही होगा। भारतीय राजनीति में एक प्रयोग
हो चुका है। उसे गांधी जी ने अपने समय में
सफलतापूर्वक लागू किया था। इसके द्वारा उनने एक
बड़े पैमाने पर आम भारतीय का राजनीतिकरण किया था,
उन्हें अहिंसक सविनय अवज्ञा आंदोलन से जोड़ा था एवं
आजादी के लक्ष्य को नजदीक ला दिया था, आज भी देश
को हजारों-लाखों-करोड़ों कार्यकर्ता चाहिए, जो
संघबद्ध हो गांव मोहल्ले-ब्लाक स्तर पर अन्याय और
शोषण के खिलाफ गांधीगिरी के मंत्र से ही लड़ सकें।
भ्रष्ट्र प्रशासनिक मशीनरी को ठीक करने का प्रयास
करें। कहलृ रिश्वतखोरी हो तोउससे भी जूझ सकें।
सभ्य, संपन्न, समर्थ भारत का निर्माण तभी होगा, जब
हम अभी से सार्वजनिक जीवन में कार्य कर सकने वाली
ऐसे कार्यकर्ताओं को दिशा दें। क्या गायत्री
परिवार के साथ कोई और संगठन जुड़कर नई आजादी के इस
आंदोलन में भागीदार बनना चाहेंगे।
अखंड ज्योति से साभार (जनसंवेदना कल्याण समिति
द्वारा जनहित में प्रसारित)
|
|
|
|
|