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दिवाली विशेष
कमलासना की पूजा से वैभव:
गृहस्थ को हमेशा कमलासन पर विराजित लक्ष्मी की
पूजा करनी चाहिए। देवीभागवत में कहा गया है कि
कमलासना लक्ष्मी की आराधना से इंद्र ने देवाधिराज
होने का गौरव प्राप्त किया था। इंद्र ने लक्ष्मी
की आराधना ‘ú कमलवासिन्यै नम:’ मंत्र से की थी। यह
मंत्र आज भी अचूक है।
दीपावली को अपने घर के ईशानकोण में कमलासन पर
मिट्टी या चांदी की लक्ष्मी की प्रतिमा को विराजित
कर, श्रीयंत्र के साथ यदि उक्त मंत्र से पूजन किया
जाए और निरंतर जाप किया जाए तो चंचला लक्ष्मी
स्थिर होती है। बचत आरंभ होती है और पदोन्नति
मिलती है। साधक को अपने सिर पर बिल्व पत्र रखकर
पंद्रह श्लोकों वाले श्रीसूक्त का जाप भी करना
चाहिए।
लक्ष्मी पूजन
लक्ष्मी का लघु पूजन (सही उच्चारण हो सके, इस हेतु
संधि-विच्छेद किया है।) महालक्ष्मी पूजनकर्ता
स्नान करके कोरे अथवा धुले हुए शुद्ध वस्त्र
पहनें, माथे पर तिलक लगाएँ और शुभ मुहूर्त में
पूजन शुरू करें। इस हेतु शुभ आसन पर पूर्व या
उत्तर दिशा की ओर मुँह करके पूजन करें। अपनी
जानकारी हेतु पूजन शुरू करने के पूर्व प्रस्तुत
पद्धति एक बार जरूर पढ़ लें।
पूजा सामग्री का शुध्दिकरण :
बाएँ हाथ में जल लेकर दाहिने हाथ की अनामिका से
निम्न मंत्र बोलते हुए अपने ऊपर एवं पूजन सामग्री
पर जल छिड़कें-
ॐ अ-पवित्र-ह पवित्रो वा सर्व-अवस्थाम् गतोअपि वा
।
य-ह स्मरेत् पुण्डरी-काक्षम् स बाह्य-अभ्यंतरह
शुचि-हि ॥
पुन-ह पुण्डरी-काक्षम् पुन-ह पुण्डरी-काक्षम्,
पुन-ह पुण्डरी-काक्षम् ।
आसन का शुध्दिकरण :
निम्न मंत्र से अपने आसन पर उपरोक्त तरह से जल
छिड़कें-
ॐ पृथ्वी त्वया घता लोका देवि त्वम् विष्णु-ना
घृता ।
त्वम् च धारय माम् देवि पवित्रम् कुरु च-आसनम्
॥
आचमन कैसे करें:
दाहिने हाथ में जल लेकर तीन बार आचमन करें-
ॐ केशवाय नम-ह स्वाहा,
ॐ नारायणाय नम-ह स्वाहा,
ॐ माधवाय नम-ह स्वाहा ।
अंत में इस मंत्र का उच्चारण कर हाथ धो लें-
ॐ गोविन्दाय नम-ह हस्तम् प्रक्षाल-यामि ।
दीपक :
दीपक प्रज्वलित करें (एवं हाथ धोकर) दीपक पर पुष्प
एवं कुंकु से पूजन करें-
दीप देवि महादेवि शुभम् भवतु मे सदा ।
यावत्-पूजा-समाप्ति-हि स्याता-वत् प्रज्वल
सु-स्थिरा-हा ॥
(पूजन कर प्रणाम करें)
स्वस्ति-वाचन :
निम्न मंगल मंत्र बोलें-
ॐ स्वस्ति न इंद्रो वृद्ध-श्रवा-हा स्वस्ति न-ह
पूषा विश्व-वेदा-हा ।
स्वस्ति न-ह ताक्षर्यो अरिष्ट-नेमि-हि स्वस्ति नो
बृहस्पति-हि-दधातु ॥
द्-यौ-हौ शांति-हि अन्-तरिक्ष-गुम् शान्-ति-हि
पृथिवी शान्-ति-हि-आप-ह ।
शान्-ति-हि ओष-धय-ह शान्-ति-हि वनस्-पतय-ह
शान्-ति-हि-विश्वे-देवा-हा
शान्-ति-हि ब्रह्म शान्-ति-हि सर्व(गुम्)
शान्-ति-हि शान्-ति-हि एव शान्-ति-हि सा
मा शान्-ति-हि। यतो यत-ह समिहसे ततो नो अभयम्
कुरु ।
शम्-न्न-ह कुरु प्रजाभ्यो अभयम् न-ह पशुभ्य-ह।
सु-शान्-ति-हि-भवतु॥
ॐ सिद्धि बुद्धि सहिताय श्री मन्-महा-गण-अधिपतये
नम-ह ॥
(नोट : पूजन शुरू करने के पूर्व पूजन की समस्त
सामग्री व्यवस्थित रूप से पूजा-स्थल पर रख लें।
श्री महालक्ष्मी की मूर्ति एवं श्री गणेशजी की
मूर्ति एक लकड़ी के पाटे पर कोरा लाल वस्त्र बिछाकर
उस पर स्थापित करें। गणेश एवं अंबिका की मूर्ति के
अभाव में दो सुपारियों को धोकर, पृथक-पृथक नाड़ा
बाँधकर कुंकु लगाकर गणेशजी के भाव से पाटे पर रखें
व उसके दाहिनी ओर अंबिका के भाव से दूसरी सुपारी
स्थापना हेतु रखें।)
संकल्प :
अपने दाहिने हाथ में जल, पुष्प, अक्षत, द्रव्य आदि
लेकर श्री महालक्ष्मीजी अन्य ज्ञात-अज्ञात
देवीदेवताओं के पूजन का संकल्प करें-
हरिॐ तत्सत् अद्यैत अस्य शुभ दीपावली बेलायाम्
मम महालक्ष्मी-प्रीत्यर्थम् यथासंभव द्रव्यै-है
यथाशक्ति उपचार द्वारा मम् अस्मिन प्रचलित
व्यापरे उत्तरोत्तर लाभार्थम् च दीपावली महोत्सवे
गणेश, महालक्ष्मी, महासरस्वती, महाकाली, लेखनी
कुबेरादि देवानाम् पूजनम् च करिष्ये।
( अब जल छोड़ दें।)
श्रीगणेश-अंबिका पूजन
हाथ में अक्षत व पुष्प लेकर श्रीगणेश एवं
श्रीअंबिका का ध्यान करें।
खगोलीय दृष्टि से
दिवाली का महत्व
मेष एवं तुला की संक्रांति में सूर्य विषुवत रेखा
(नाड़ीवृत्त) पर रहता है, जिसे देवता 6 माह तक
उत्तर की ओर तथा राक्षस 6 माह तक दक्षिण की ओर
खींचते हैं। मंदराचल पर्वत ही नाड़ीवृत्त है,
जिसके एक भाग में मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह और
कन्या राशि हैं जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे
भाग में तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन
राशि हैं जिन्हें राक्षस खींचते हैं। मंथन से चौदह
रत्न निकलते हैं, जिनमें महालक्ष्मी कार्तिक की
अमावस्या को प्रकट होती हैं।
कार्तिक कृष्ण अमावस्या को समुद्र मंथन के
परिणामस्वरूप महालक्ष्मी का जन्म हुआ था। हम जिस
लक्ष्मी की पूजा-अर्चना करते हैं वह अब भी
प्रतिवर्ष समुद्रमंथन से निकलती हैं।
ज्योतिषशास्त्र, भूगोल या खगोल की दृष्टि से देखें
तो सूर्य को सभी ग्रहों का केंद्र एवं राजा माना
गया है। सूर्य की बारह संक्रांतियां हैं।
नाड़ीवृत्त मध्य में होता है, तीन क्रांतिवृत्त
उत्तर को और तीन दक्षिण को होते हैं।
समुद्र मंथन में भगवान विष्णु की ही बड़ी भूमिका
रही है और सूर्य ही भगवान विष्णु स्वरूप हैं।
सूर्य क्रांतिवृत्त पर विचरण करता है। यह 6 माह
उत्तर गोल में एवं 6 माह दक्षिण गोल में विचरण
करता है, जिन्हें देवभाग एवं राक्षस भाग भी कहते
हैं। मेष एवं तुला की संक्रांति में सूर्य विषुवत
रेखा (नाड़ीवृत्त) पर रहता है, जिसे देवता 6 माह
तक उत्तर की ओर तथा राक्षस 6 माह तक दक्षिण की ओर
खींचते हैं।
मंदराचल पर्वत ही नाड़ीवृत्त है, जिसके एक भाग में
मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह व कन्या राशि हैं
जिन्हें देवता खींचते हैं। दूसरे भाग में तुला,
वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ व मीन राशि हैं जिन्हें
राक्षस खींचते हैं। मंथन से चौदह रत्न निकलते हैं,
जिनमें महालक्ष्मी कार्तिक की अमावस्या को प्रकट
होती हैं।
लक्ष्मी, महालक्ष्मी, राजलक्ष्मी, गृहलक्ष्मी आदि
लक्ष्मी के अनेक रूप हैं। लक्ष्मी विहीन होने पर
लोग ज्योतिष की शरण में भी जाते हैं। दीपावली के
लिए पुराणों में अनेक कथाएं हैं। वास्तव में
कार्तिक कृष्ण अमावस्या को पृथ्वी का जन्म हुआ था
और पृथ्वी ही महालक्ष्मी के रूप में विष्णु की
पत्नी मानी गई है। दीपावली पृथ्वी का जन्मदिन है,
इसलिए इस दिन सफाई करके धूमावती नामक दरिद्रा को
कूड़े-करकट के रूप में घर से बाहर निकालकर सब ओर
ज्योति जलाते हैं तथा श्री कमला लक्ष्मी का आह्वान
करते हैं।
दीपावली से पूर्व अच्छी वर्षा से धनधान्य की
समृद्धि रूपी लक्ष्मी का आगमन भी होता है। संवत्सर
के उत्तरभाग में ऋत सोम तत्व रहता है जो लगातार
दक्षिण की ओर बहता रहता है। दक्षिण भाग में ऋत
अग्नि रहती है जो हमेशा उत्तर की ओर बहती है।
लक्ष्मी का आगमन ऋताग्नि का आगमन ही होता है।
यह दक्षिण से होता है, इसीलिए आज भी भारतीय किसान
फसल की पहली कटाई दक्षिण दिशा से ही करता है।
ऋताग्नि एक ऐसी ज्योति है जो पूरी प्रजा को
सुख-शांति एवं समृद्धि प्रदान करती है और वही
महालक्ष्मी है। ज्योतिषशास्त्र में भी जन्मकालीन
ग्रहयोगों के आधार पर महालक्ष्मी योग देखा जाता
है।
शास्त्रों में कहा गया है-
लक्ष्मीस्थानं त्रिकोणं स्यात् विष्णुस्थानं तु
केंद्रकम्।
तयो: संबंधमात्रेण राज्यश्रीलगते नर: ।।
यह योग श्री लक्ष्मी प्राप्ति का संकेत देता है।
केंद्रस्थान में लग्न, चतुर्थ, सप्तम एवं दशम भाव
गिने जाते हैं तथा त्रिकोण स्थान में पंचम एवं नवम
भाव को माना गया है। जिस व्यक्ति का शरीर स्वस्थ
हो, स्थायी संपत्ति, सुख-सुविधा के साधन हों,
जीवनसाथी मनोनुकूल हो तो वह विष्णुस्वरूप बन जाता
है।
इन सब गुणों का उपयोग सद्बुद्धि एवं धर्मपरायणता
के साथ हो तो व्यक्ति महालक्ष्मी एवं राज्यश्री को
प्राप्त करने वाला होता है। व्यक्ति यदि कर्मशील
होगा, सदाचारी होगा, गुरुनिंदा, चोरी, हिंसा आदि
दुराचारों से दूर रहेगा तो लक्ष्मी स्वत: उसके
यहां स्थान बना लेगी।

पौराणिक प्रसंगों में स्वयं लक्ष्मी कहती हैं-
नाकर्मशीले पुरुषे वरामि, न नास्तिके, सांकरिके
कृतघ्ने।
न भिन्नवृत्ते, न नृशंरावण्रे, न चापि चौरे, न
गुरुष्वसूये।।
अत: कर्मशील एवं सदाचारी व्यक्ति को ही राज्यश्री
एवं महालक्ष्मी योग बन पाता है। जबकि लोगों की ऐसी
धारणा है कि खूब पैसा, धन दौलत हो तो आनंद की
प्राप्ति हो सकती है, पर यह धारणा गलत है।
ज्योतिषशास्त्र एवं पौराणिक ग्रंथों में
महालक्ष्मी का स्वरूप दन-दौलत या संपत्ति के रूप
में नहीं बताया गया है।
लक्ष्मीवान उस व्यक्ति को माना गया है जिसका शरीर
सही रहे और जिसे जीवन के हर मोड़ पर प्रसन्नता के
भाव मिलते रहें। मुद्रा के स्थान एवं खर्च के
स्थान को महालक्ष्मीयोग का कारक नहीं माना गया है
बल्कि प्राप्त मुद्रा रूपी लक्ष्मी को सद्बुद्धि
के साथ कैसे खर्च करके आनंद लिया जाए, इसे माना
गया है। इसीलिए महालक्ष्मी पूजन में महालक्ष्मी,
महासरस्वती एवं गणोश जी का पूजन एक साथ किया जाता
है।
गणोश बुद्धि के देवता हैं तथा सरस्वती ज्ञान की
देवी हैं, इसीलिए लक्ष्मी के पहले श्री शब्द लगाया
जाता है। यह श्री सरस्वती का बोधक होता है। इसका
भाव यह निकलता है कि मुद्रारूपी लक्ष्मी को भी यदि
कोई प्राप्त करता है तो श्रेष्ठ गति के साथ जो
उसका उपयोग एवं उपभोग करता है, वह आनंद की अनुभूति
करता है।
दीपक जलाने व
आतिशबाजी का कारण
दीपावली के दिन आतिशबाजी (आकाशदीप, कंडील आदि)
जलाने की प्रथा के पीछे संभवतः यह धारणा है कि
दीपावली-अमावस्या से पितरों की रात आरंभ होती है।
कहीं वे मार्ग से भटक न जाएँ, इसलिए उनके लिए
प्रकाश की व्यवस्था इस रूप में की जाती है। इस
प्रथा का बंगाल में विशेष प्रचलन है।
लक्ष्मीजी की आरती
ॐ जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता ।
तुमको निसदिन सेवत हर-विष्णु-धाता ॥ॐ जय...
उमा, रमा, ब्रह्माणी, तुम ही जग-माता ।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता ॥ॐ जय...
तुम पाताल-निरंजनि, सुख-सम्पत्ति-दाता ।
जोकोई तुमको ध्यावत, ऋद्धि-सिद्धि-धन पाता ॥ॐ
जय...
तुम पाताल-निवासिनि, तुम ही शुभदाता ।
कर्म-प्रभाव-प्रकाशिनि, भवनिधि की त्राता ॥ॐ जय...
जिस घर तुम रहती, तहँ सब सद्गुण आता ।
सब सम्भव हो जाता, मन नहिं घबराता ॥ॐ जय...
तुम बिन यज्ञ न होते, वस्त्र न हो पाता ।
खान-पान का वैभव सब तुमसे आता ॥ॐ जय...
शुभ-गुण-मंदिर सुन्दर, क्षीरोदधि-जाता ।
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहिं पाता ॥ॐ जय...
महालक्ष्मीजी की आरती, जो कई नर गाता ।
उर आनन्द समाता, पाप शमन हो जाता ॥ॐ जय...
(आरती करके शीतलीकरण हेतु जल छोड़ें एवं स्वयं आरती
लें, पूजा में सम्मिलित सभी लोगों को आरती दें फिर
हाथ धो लें।)
साभार हिन्दी मीडिया
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