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आखिर क्या है पंचतत्व
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गर्भ
में जब जीव आता है तो उस गर्भ धारण करने वाली माता को अपनी पूरी
वृत्तियां नाम,
ध्यान में लगानी चाहिएं और जितना हो सके पवित्र
विचारों को अपने मन में बसाना चाहिए तथा ऊंचे पवित्र ग्रंथों को पढ़ना
चाहिए, शुध्द आहार का लेना मां के पेट में
पलते बच्चे को होनहार बना देता है उसके लिए पिछले जन्मों की होने वाली
पीड़ा को भी कम कर देता है। बच्चे का नौ महीने तक मां के पेट में रहना,
ऐसे समय में मां की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है।
विचार, आहार,
व्यवहार का नन्हें बालक पर बहुत असर होता है।
पांच
तत्व पृथ्वी,
अग्नि, पानी,
वायु, आकाश जिससे यह शरीर
बना है एवं तीन मन, बुध्दि,
अहंकार, पांच
ज्ञानेन्द्रिया तथा पांच कर्मेन्द्रियां यह अठारह शक्तियां पहले शरीर से
निकलती हैं फिर आत्मा शरीर को छोड़ती है। तब हम इस नश्वर देह को दफनाते
हैं या जलाते हैं। फिर अपने कर्मों के अनुसार यह सूक्ष्म शरीर लेन-देन जो
बच जाता है उन कर्मों का भुगतान कष्ट-पीड़ा या सुख-दुख लेने या देने के
लिए शरीर में। कर्मों के अनुसार उस गर्भ में आता है,
जिनसे लेन-देन होता है। गर्भ के धारण करने वाले शरीर
को उसके गर्भ में आने से ही कुछ महसूस होने लगता है। किसी को सुख होने
लगता है। किसी को कुछ अधिक मिलने लगता है किसी का कुछ कम होने लगता है।
किसी को शांति सी होने लगती है किसी को अशांति। पर है सब लेने-देने का
संबंध। जो मानव इस सूक्ष्म तत्व ज्ञान को समझ नहीं पाता।
किसी
गर्भ में जब जीव आता है तो उस स्त्री की भोग की वृत्ति बढ़ जाती है। किसी
की वृत्ति भक्ति में जागने लगती है। किसी की खान-पान में,
किसी की निंद्रा में, किसी
की संसारी कामनाओं में नाना प्रकार की वृत्तियां गर्भ धारण करने वाली
स्त्रियों को हो जाती हैं। यह उनके बस की बात नहीं। यह आने वाले जीव के
पिछले जन्मों के कर्मों के अनुसार मां की वृत्तियां होती जाती है। आने
वाले जीव की निशानियां होती हैं जो हम समझ नहीं पाते,
यहा थोडा सा बता देना चाहता हूं कि गर्भ में जब जीव
आता है तो उस गर्भ धारण करने वाली माता को अपनी पूरी वृत्तियां नाम,
ध्यान में लगानी चाहिएं और जितना हो सके पवित्र
विचारों को अपने मन में बसाना चाहिए तथा ऊंचे पवित्र ग्रंथों को पढ़ना
चाहिए, शुध्द आहार का लेना मां के पेट में
पलते बच्चे को होनहार बना देता है उसके किए पिछले जन्मों की होने वाली
पीड़ा को भी कम कर देता है। बच्चे का नौ महीने तक मां के पेट में रहना,
ऐसे समय में मां की जिम्मेदारी बहुत बढ़ जाती है।
विचार, आहार,
व्यवहार का नन्हें बालक पर बहुत असर होता है। यह भी सूक्ष्म शक्तियां ही
हैं जो सूक्ष्म रूप में वृत्तियों को बदलती हैं एवं जन्म तथा मृत्यु का
कारण बनती हैं और मानव जीवन पर असर डालती हैं। इसे भी ध्यान रखना चाहिए।
यदि मातृ शक्ति के मन में बच्चे को निरोग,
विद्वान, ज्ञानी,
विज्ञानी, ध्यानी या ब्रह्मज्ञानी बनाने की
भावना हो तो अपने गर्भ में पल रहे बच्चे के प्रति अपनी सूक्ष्म शक्तियों
का भी ध्यान रखे, जिससे बच्चा वीर,
धीर, दयावान बन सके। इन सब
बातों का मां ही कोशिश करे, ईश्वर की कृपा
मांगें। बाकी आने वाले जीव के कर्मों पर निर्भर है और माता-पिता के
कर्मों पर भी इसका कुछ हिस्सा जरूर होता है।
इस
सूक्ष्म जगत की बहुत शक्तियां हैं जिनका वर्णन करना मैं जरूरी नहीं समझता
और इन शक्तियों के बारे में लिखना भी ठीक नहीं है। जिसे भक्ति की
शक्तियां मिल गई होंगी उनमें सूक्ष्म जगत की शक्तियों का भंडार आ मिलता
है। जो बताने,
समझाने एवं लेखनी में नहीं आता और अगर आता है तो ठीक
नहीं, यह भक्ति की अलग-अलग स्टेज का अलग-अलग
अनुभव है। जो ईश्वर के मार्ग पर चलने वालों में अपने आप ही
(रिध्दि-सिध्दि) के रूपों में ईश्वर की कृपा से आ जाती है इनके लिये साधक
को प्रयत्न नहीं करना पड़ता। इसके लिए तो ईश्वर को समर्पण होना होता है।
बाकी तो उस परम की कृपा पर निर्भर है।
ठ्ठ सरवन कुमार
(साभार
: निर्वाण आत्मा)
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