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धार्मिक कार्य और
'क्यों
?'
हर इंसान अपने किसी न किसी रूप एवं कृत्यों के माध्यम से थोड़ा या बहुत
अधिक धार्मिक अवश्य होता है जिसके चलते वह धर्म एवं आस्था से जुड़े ऐसे कई
कार्य करता है जिसे न सिर्फ व स्वयं बल्कि उसकी
पीढ़ियां भी कई युगों से परंपरा एवं संस्कृति के रूप में धर्म के नाम पर
करती आ रही हैं जो आज पूरे समाज में रच बस गई हैं। विभिन्न धार्मिक कृत्य
हम क्यों करते हैं?
करने के पीछे कौन से धार्मिक एवं मनोवैज्ञानिक कारण
हैं। जानिए निम्नलिखित 'तथ्यों'
द्वारा...
आरती
क्यों लेनी चाहिए?
भगवान
की आरती हो जाने के बाद सब भक्त उस ज्योति पर हाथ घुमाकर अपने-अपने मुख
पर लगाते हैं यह क्यों?
शास्त्र में लिखा है कि- जैसे दीपक की लौ नित्य ऊपर
को जाती है, उसी प्रकार दीप-दान-आरती
करने
वाले भक्त को भी ऊर्ध्वगति प्राप्त होती है। भगवान की ज्योति
'आरती'
जिस भक्त के शरीर को स्पर्श करती है उसे सहस्त्रों
यज्ञान्त अवभृथ स्नानों का फल मिलता है। भावनावाद सिध्दांत के अनुसार
भक्त-जन ज्योति की निरंतर ऊंचे उठती लौ को देखकर यह भावना दृढ़ करता है कि
जैसे यह ज्योति की शिखा चारों ओर बराबर रिक्त स्थान को ही जाती है
क्योंकि इस अग्नि का उत्पादक मूल स्त्रोत सूर्य भगवान ऊपर द्यौ:लोक में
ही विराजमान हैं। अत: यह अग्नि सूर्य का अंश होने के कारण अपने अंशों को
सूर्य की ओर ही सदैव अभिमुख होती है। इसी प्रकार मुझ नर को भी अपने
उद्गम-केन्द्र नारायण प्रभु की शरण में ही जाना चाहिए।
इसके
अतिरिक्त देव प्रतिभा के सान्निध्य में तथा बीज मंत्र के अभिमंत्रण से
प्रभावित विद्युत ज्योति का हाथों द्वारा ग्रहण करके ज्ञानेन्द्रियों के
केन्द्र स्थान अपने मुख में आधान करना एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया भी है,
जिससे
भक्तों के ज्ञान तन्तुओं में एक विलक्षण अदृश्य स्फुरण उत्पन्न होती है,
और जिसका प्रत्यक्ष प्रभाव मैस्मरेजम के अभ्यासी
मास्टरों द्वारा इसी प्रकार अपने हाथों के व्यापार से अमुक व्यक्ति को
मूर्छित तक कर सकने में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
चार
धाम ही क्यों
?
भारतीय तीर्थों में सर्वोपरि प्रतिष्ठा चार धामों की है। ये चार धाम हैं-
श्री जगन्नाथ,
श्री बद्रीनाथ, श्री
द्वारिकाधीश और श्री रामेश्वर। पुराण शास्त्रों में इनकी महिमा का बड़े
विस्तार से वर्णन किया गया है। उपरोक्त चार धामों
की श्रध्दालु जनता के हृदय में बड़ी प्रतिष्ठा है। प्रत्येक भारतीय इनके
दर्शन करने पर ही अपने जीवन को कृतकार्य समझता है। तीर्थ तो अनेक हैं पर
धाम चार ही क्यों- यह समझ लेना आवश्यक है।
वास्तव में चार की यह संख्या निर्हेतुक नहीं है जिस संस्कृति का मूलाधार
ऋग्वेद,
यजुर्वेद, सामवेद,
अथर्ववेद इन चार वेदों पर हो,
जिसके अनुयायी ब्राह्मण,
क्षत्रिय, वैश्य,
शूद्र, इन चार वर्ण और ब्रह्मचर्य,
गृहस्थ, वानप्रस्थ,
संन्यास इन चार आश्रमों में विभक्त होकर
धर्मार्थकाममोक्षरूप चतुर्विध पुरुषार्थ का सम्पादन करते हों उसके परम
पवित्र धाम भी यदि चार ही हों तो क्या आश्चर्य। फिर दिशाएं भी तो चार
हैं- पूर्व, पश्चिम,
उत्तर, दक्षिण। चारों
दिशाओं में चार धाम हैं- पूर्व में जगन्नाथ,
पश्चिम में द्वारिका, दक्षिण में रामेश्वरम्
और उत्तर में बद्रीनाथ।
चार वेदों के प्रतीक : इन धामों का वेदों के साथ केवल संख्यात्मक साम्य
ही नहीं है बल्कि ये चारों वेदों के प्रतीक रूप ही हैं। भगवान
बद्रीनारायण को हम यजुर्वेद का प्रतीक कह सकते हैं। उक्त वेद की भांति
भगवान् बद्रीनाथ भी कर्म और तप: प्रधान देव हैं। यहां की पूजा-पध्दति भी
यजुर्मयी ही दिखाई पड़ती है। ऋग्वेद के प्रतीक होने के कारण भगवान
रामेश्वर ऋक् प्रोक्त उपासना तथा संयम प्रधान देव कहे जाते हैं।
वहां
की पूजा विधि तद्नुकूल है और ऋग्वेदाध्यायी ब्राह्मणों के कण्ठघोष से
मंदिर गर्भगृह सदा गुंजायमान रहता है। सामवेद के प्रतीक भगवान द्वारिकेश
जिनकी बांसुरी के एक-एक स्वर से साम की पावन ऋचायें फूट पड़ती थीं,
आज भी द्वारिका में विराजमान संसार के आर्तजनों को
भक्ति का संदेश देने प्रतीत होते हैं। भगवान् जगन्नाथ साक्षात् अथर्व के
प्रतीक हैं, यह बात यहां की सवर्णमयी सामूहिक
तांत्रिक पूजा विधि को देखकर स्पष्ट हो जाती है। इन्हें हम ज्ञान तथा
अथर्व के विशेष प्रतिपाद्य अभिचार का मुख्य देव कह सकते हैं। मंदिर के
बाह्य प्रांगण में विद्यमान अनेक प्रकार के वीभत्स चित्रों को देखकर
अथर्व के मोहन, वशीकरण,
उच्चाटन आदि अभिचार प्रयोगों का सहसा स्मरण हो आता
है।
वर्णाश्रम के प्रतीक : चारों वर्णों व आश्रमों के साथ भी इन धामों का
असाधारण संबंध है। रामेश्वरम् यदि ब्राह्मणों और संन्यासियों का मुख्य
पीठ है तो बद्रीनारायण क्षत्रियों और ब्रह्मचारियों का मुख्य अध्यात्म
केन्द्र।
इसीलिए बद्रीनारायण में आज भी क्षत्रियवंशी टिहरी नरेश के नायकत्व में
अविवाहित रावल नामधारी वंशधर ही मुख्य पूजक नियत होते हैं। भगवान्
द्वारिकेश गृहस्थ आश्रम और वैश्य वर्ण के प्रतीक हैं। इसी पवित्र धाम में
उन्होंने अपनी गृहस्थ लीलाएं की थीं अत: इसे गृहस्थियों का प्रधान पाठ
कहा जाता है। इसीलिए गोस्वामियों के तत्वावधान में उनके शिष्य प्रशिष्य
लक्ष्मीपुत्र भाटिया,
लुवाणा आदि धनिक वैश्य वर्ग का
वैभव उनके द्वार पर खूब देखा जा सकता है। जगन्नाथ जी चूंकि चतुर्थ वर्ण
और वानप्रस्थ के प्रतीक हैं अत: वहां तादृश वर्ण और आश्रम की महत्ता
स्पष्ट देखी जा सकती है। अन्य पुजारियों के अतिरिक्त चतुर्थ वर्ण के
प्रतिनिधि भोल वंशधरों का भी पूजक होने का परम्परागत अधिकार आज भी
अक्षुण्ण चला आता है। इस प्रकार ये चारों धाम अनादिकाल से प्रचलित
वर्णाश्रम मर्यादा के ज्वलन्त प्रतीक कहे जा सकते हैं।
चारों
पुरुषार्थों के प्रतीक : भारतीय संस्कृति में जहां चार वेद हैं,
चार वर्ण हैं, चार आश्रम
हैं वहां मानव-जीवन के उद्देश्य भी चार ही हैं,
जिन्हें पुरुषार्थ कहा जाता है। वे हैं- धर्म,
अर्थ, काम और मोक्ष। चारों
धाम इन चारों
पुरुषार्थों के प्रतीक भी हैं। भगवान बद्रीनाथ धर्म के प्रतीक हैं तो
द्वारिकेश अर्थ के। जगन्नाथ जी का दर्शन अभीष्ठ काम का दाता है तो मोक्ष
प्राप्ति के लिये भगवान रामेश्वर के चरण शरण हैं।
चार
स्थानों में ही कुम्भ क्यों
?
यह
कथा सर्वविदित है कि जब अमृत से भरा घट प्रादुर्भूत हुआ तो उसे हथियाने
के लिये देव-दानव वृन्द टूट पडे। भगवान विष्णु के संकेत पर देवगुरु
बृहस्पति के नेतृत्व में इंद्रपुत्र जयंत ने उस अमृत कुम्भ को उठा लिया।
घट फूट न जाये एतदर्थ सूर्य को तद्रक्षार्थ नियुक्त किया गया। अमृत सुख न
जाये इसके लिये हिमांशु चंद्रमा को नियत किया गया। उक्त देवगण अमृतकुम्भ
को छुपाने के निमित्त तीनों लोकों में घूमे,
परन्तु दानवों ने उनका सर्वत्र पीछा किया। भूलोक में
दिव्य बारह दिन तक भ्रमण करते हुए उक्त अमृत कुम्भ को चार बार भूमि पर
रखने का अवसर आया। कुम्भ को रखते और उठाते हुए अमृतकण इन स्थानों पर बिखर
गए। जहां-जहां वह कुम्भ रखा गया था, वे स्थान
हरिद्वार, प्रयाग,
नासिक और उौन थे। दिव्य बारह दिन बारहमानव वर्षों के बराबर होते है। अत:
सूर्य चंद्र और बृहस्पति के योगायोग से बारह वर्षों में उक्त चारों
स्थानों में चार कुम्भ पर्वों का योग बनता है। अमृतकणों की सत्ता से उक्त
चारों स्थान श्रध्दालु भक्तों की अमरपद को भागी बनाने में समर्थ हैं
पृथ्वी की भांति चार कुम्भ देवलोक में और चार कुम्भ पाताललोक में भी होते
हैं।
मांस
क्यों नहीं खाना चाहिए
?
मांस
क्यों नहीं खाना चाहिए। इसका पहला हेतु प्राकृतिक है,
तद्नुसार जीभ से चपककर पानी पीने वाला कुत्ता,
बिल्ली, सिंह,
व्याघ्र आदि जीवनों के लिए ही मांस प्राकृतिक भक्ष्य
हो सकता है। ईश्वर ने उनके दांत, दाढ़ और नाखून
तथा आमाशय आदि भी अंग वैसे ही बनाए हैं,
परन्तु घूंटकर पानी पीने वाले- गाय, भैंस,
वानर, मनुष्य आदि जीवों के
लिये मांस प्राकृतिक भक्ष्य नहीं, क्योंकि
इनके अंग मांसाहारियों के समान नोचने कुचलने और चीरफाड़ करने योग्य नहीं
बने हैं। इसी कारण मनुष्य को छोड़कर अन्य कोई घूंटकर पीने वाला जीव
स्वभावत: मांसाहारी नहीं है। इसलिये मनुष्य को भी प्रकृति नियम भंग का
अपराधी नहीं बनना चाहिए।
दूसरा
हेतु यह है कि कोई भी मांसाहारी पुरुष आध्यात्मिक मार्ग का सफल पथिक नहीं
हो सकता,
क्योंकि उसका अन्त:करण पशुतामय परमाणुओं द्वारा
परिपुष्ट होने के कारण कभी सात्विक नहीं हो सकता। इसीलिए अन्यान्य विषयों
में आज पाश्चात्य देशवासी चाहे कितने भी उन्नत कहे जा सकते हों,
परन्तु आध्यात्मिक विषय में अब भी वे किसी महात्मा को
गुरु बनाकर ही शांति प्राप्त करते हैं। यही कारण है कि भारत में जिन
स्वामी विवेकानन्द और स्वामी रामतीर्थ को सिध्दांत के विचार से वेदान्त
का विद्यार्थी ही समझा जाता है, पाश्चात्य
देशों के आध्यात्मिक ज्ञान में सर्वथा शून्य लोगों में वे गुरु माने जाते
हैं। इसलिए अध्यात्मपथ के पथिक बनकर शांति चाहने वाले व्यक्तियों को मांस
भक्षण का दर्ुव्यसन छोड़ देना चाहिए।
चौथा
हेतु यह है कि आज प्राय: सुअर,
मुर्गा और मत्स्य, इन तीन
जीवों को ही अधिक खाया जाता है। सभी जानते हैं कि ये तीनों प्राणी
मलभक्षक हैं। ग्राम्य सुअर तो प्रत्यक्ष ही विष्टा (मल) खाता देखा जा
सकता है।
जंगली सुअर भी समस्त वन्य जन्तुओं का मल खाता है। इसीलिए वन में ढूंढने
पर भी अरण्य गोमय की भांति आरण्यक पशुओं का मल कहीं नहीं दिख पड़ता है। जल
में गिरा मल मछली तत्काल खा जाती है। मुर्गा तो मनुष्य की खंकार के शब्द
को सुनकर भागकर आता है और थूक को पृथ्वी पर गिरने से पहले चटकर जाने का
प्रयत्न करता है।
हनुमानजी का चोला सिन्दूरी क्यों
?
अद्भुत रामायण में एक कथा प्रसिध्द है कि श्री हनुमान जी ने जगजननी श्री
जानकी के मांग में सिन्दूर लगा देखकर आश्चर्यपूर्वक पूछा- माता,
आपने यह लाल द्रव्य मस्तक में क्यों लगाया है?
श्री जानकी जी ने
ब्रह्मचारी हनुमान की इस सीधी-सीधी बात पर प्रसन्न होकर कहा- पुत्र,
इसको लगाने से मेरे स्वामी की दीर्घायु होती है। श्री
हनुमान जी ने यह सुना तो बहुत प्रसन्न हुए और विचारा कि जब अंगुली भर
सिन्दूर लगाने से आयुष्य वृध्दि होती है तो फिर क्यों न सारे शरीर पर इसे
पोतकर अपने स्वामी को अजर अमर ही बना दूं। वैसा ही किया। सब शरीर पर
सिन्दूर पोतकर सभा में पहुंचे, तो भगवान्
उन्हें देखकर इतने हंसे जितने कि शायद कभी न हंसे होंगे। श्री हनुमान जी
की माता जानकी के वचनों में इससे और भी अधिक विश्वास हुआ। कहा जाता है कि
उस दिन हनुमान जी की इस उदात्त भक्ति के स्मरण में उनके शरीर पर सिन्दूर
का चोला चढ़ाया जाने लगा। इस कथानक से यह सहज ही समझ में आ जाता है कि
त्रेतायुग में भी स्त्रियों को मांग में सिन्दूर लगाने का शास्त्रीय
विधान प्रचलित था। इसका क्या हेतु है?
प्रसंगवश यहां रहस्य प्रकट करना आवश्यक न होगा।
शिखा
(चोटी) क्यों
?
शिखा
क्यों रखी जाए?
अपटुडेट समाज में मनुष्य बालों के इस गुच्छे को सिर
पर पालकर रखने से क्या फायदा?
शिखा हमारी ज्ञानशक्ति को चैतन्य रखते हुए उसे सर्वदा अभिवृध्दि की ओर
अग्रसर रखती है। यह विज्ञानानुकूल बात है कि काली वस्तु सूर्य की किरणों
में से अधिक ताप तथा शक्ति का आकर्षण किया करती है।
सम्पूर्ण प्रकृति मंडल में फैली हुई एक दूसरी शक्ति और है जिसे हम सतत
चिन्तन या ध्यानशक्ति द्वारा अपने शरीर में प्रविष्ट कर सबल तथा मेधावी
बन सकते हैं,
इसे आज शक्ति नाम से स्मरण किया जाता है। दुनिया के
सभी सन्त महात्माओं और आध्यात्मिक पुरुषों में निरन्तर ध्यानावस्था में
रहने से इसी अदृश्य शक्ति का प्रादुर्भाव हो जाया करता है जिसके बल पर वे
सहस्त्रों मनुष्यों के मन पर अपना अद्भुत प्रभाव डालने में समर्थ हो जाते
हैं। शिखा बांधकर पूर्वोक्त कार्यों का अनुष्ठान करते हुए हम ऐसी दशा में
आ जाते हैं कि हमारे शरीर में विद्यमान शक्ति जो रोमों द्वारा बाहर
निकलते हुए क्रमश: क्षीण होती जाती है- इसलिये शिखा बांधते हैं ताकि
शिक्षा क्षीण न हो और हम प्रकृति मंडल से अन्य शक्ति का आकर्षण
सुगमतापूर्वक कर सकें। तात्पर्य यह कि शिखा के द्वारा मानव मस्तिष्क अतीव
सुगमता से इस शक्ति के प्रवाह को धारण कर सकता है। शारीरिक विज्ञान के
अनुसार जिस स्थान पर शिखा रखी जाती है उसे पिनल ज्वैंड कहा जाता है। इसके
नीचे एक विशेष प्रकार की ग्रंथि होती है जो पिटयूटरी कहलाती है। इस
ग्रंथि में एक विशेष प्रकार का रस बनता है जो स्नायुओं द्वारा सम्पूर्ण
शरीर में व्याप्त होकर शरीर को बढाता और बलशाली बनता है। शिखा द्वारा इन
ग्रंथियों को अपना कार्य करने में बड़ी सहायता प्राप्त होती है एवं वे
चिरकाल तक अपना कार्य करती रहती है। इससे मनुष्य न केवल दीर्घकाल तक
स्वस्थ रह कर जीवन यापन करता है किन्तु उसकी ज्ञानशक्ति भी अक्षुण्ण बनी
रहती है। शिखा इस अत्यन्त कोमल तथा सद्योमारक मर्मस्थान के लिये
प्रकृतिप्रदत्त कवच है जो कि न केवल आकस्मिक आघातों में इस मर्म को बचाती
है किन्तु उग्र शीत आतपादि से भी इसकी रक्षा करती है।
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