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संघर्षो पर विजय पाना सीखो, उनसे भय करना
नहीं
संसार में संघर्ष
अवश्य आते है; परन्तु यदि एक बार मनुष्य, ईश्वर का आशीर्वाद एवं स्नेह
पाने में सक्षम हो जाता है, तो संघर्षो का वेग स्वयं ही दिशा बदल लेता
है। आती हुई प्रतिकूल स्थिति, कब अनुकूलता में बदल जाती है, पता नहीं
चलता है, क्योंकि यह जीवन ईश्वर की है देन है, और जब जीवन ईश्वर के ही
चरणों में समर्पित हो जाता है, तो उसमें असम्भव का स्थान ही कहाँ बचता
है? चित्र भले ही स्वयं अपना अधूरापन चाहे न भर पाये, परन्तु यदि
चित्रकार चाहे, तो उस चित्र के अधूरेपन को समाप्त कर, उसकी सुंदरता का
कारण बन सकते है। ईश्वर में अस्था रखकर ही प्रतिकूलता को अनुकूलता में,
अपूर्णता को पूर्णता में, बदला जा सकता है। परन्तु प्रतिकूलता को
अनूकूलता में परिवर्तित करने के लिए, अपूर्णता को पूर्णता का रूप देने के
लिये अवश्य है, ईश्वर में अस्था का होना-ऐसी पूर्ण आस्था, जिसमें ईश्वर
के अस्तित्व के लिये शंका न हो, वह आस्था, जिसमें ईश्वर पर विश्वास हो,
बिना किसी प्रश्न के वह आस्था, जो स्वयं उत्तर हो, हर प्रश्न का, जो किसी
अनुभव के पहले ही निर्णय कर सके, ईश्वर के साथ होने, का जो जीवन के विकट
से विकट संघर्षो का सामना करने की शक्ति दे पाये, बिना किसी भय के। जो
इतनी आस्था, अर्जित कर पाता है, वह हर संघर्ष का सामना, आत्मविश्वास साथ
करना जानता है; क्योंकि संघर्ष व्यक्ति को कमजोर नहीं बनाते, बल्कि उसकी
स्वयं की आत्मिक शक्ति की कमी ही, उसे बलहीन होने का अनुभव कराती है; और
यदि वह स्वयं को उस महाशक्ति से जोड़ने में सक्षम हो जाता है, जो स्वयं ही
सभी शक्तियों का केन्द्र है, तो उसकी यही आस्था परिवर्तित हो जाती है,
आत्मिक शक्ति में, जो मनुष्य को, संघर्षो से टूटने नहीं देती।
संघर्ष मनुष्य को जीवन में असफल नहीं बनाते। जीवन में असफलता के दो कारण
होते हैं-पहला कारण यह होता है, कि जब मनुष्य जानता भी है कि उसके लिये
किस राह पर चलना ठीक है, परन्तु फिर भी, भय के कारण, वह उस पथ पर नहीं
चलता। अत: इस वर्ग के लोगों का भय, जो कभी उन्हें समाज से होता है, कभी
असत्य, अधर्म से होता है, वह उनमें निष्यिता उत्पन्न कर देता है, जो उनकी
असफलता का कारण बन जाती है; क्योंकि कर्मशील एवं गतिशील रहने से ही
मनुष्य अपने लक्ष्य तक पहुचँ पाता है। दूसरे वर्ग के लोग वे होते है, जो
कर्म तो करते हैं, परन्तु सही ज्ञान न होने से उन्हें कर्म की दिशा नहीं
ज्ञात होती है, और लक्ष्य का ज्ञान न होते हुए भी जब व्यक्ति किसी भी राह
पर चल देता है, तो ऐसे व्यक्ति को जीवन में लाभ नहीं, हानि ही होती है।
अत: इस स्थिति में भी व्यक्ति की असफलता का कारण संघर्ष नहीं, बल्कि उसकी
स्वयं की अज्ञानता ही होती है। परन्तु व्यक्ति उन संघर्षो को ही अपनी
असफलता का कारण समझ कर, संघर्ष से ही भय करने लगता है। जीवन में सफलता
उसी व्यक्ति को मिलती है, जो संघर्षों से भय नहीं करता, बल्कि संघर्षं
उसके लिये चुनौती होते है, जिन पर विजयी होना, उसका लक्ष्य होता है। ऐसे
व्यक्ति पर संघर्ष विजयी नहीं हो पाते, बल्कि संघर्ष पर व्यक्ति विजय
प्राप्त करता है। सफलता की राह पर आने वाले संघर्षों से, जीवन का अनुभव
लेता हुआ, वह आगे बढता रहता है। उसके लिये संघर्ष सफलता की राह में बाधा
नहीं होते, बल्कि संघर्ष उसे जीवन में नया अनुभव, नया ज्ञान देने आते है,
उसको शक्ति एवं गति देने आते है, उसके जीवन को सबल बनाने आते है। ऐसा
व्यक्ति संघर्षों से भय नहीं करता, बल्कि उन संघर्षों के आने के पहले ही,
उन्हें पहचान लेता है, और उन्हीं के अनुसार वे कर्म करता है, जो संघर्षों
की समाप्ति के लिये आवश्यक होते हैं।
संघर्ष जीवन को गति देते हैं, गतिशून्य नहीं बनाते : यदि जीवन में संघर्ष
ही नहीं होगें, तो जीवन भी गतिशून्य हो जायेगा, जिसका न प्रारम्भ होगा, न
अंत: और गतिशून्य जीवन कभी भी सफलता के शिखर पर नहीं पहुँच सकता। अत: यदि
जीवन मेें सफलता प्राप्त करनी है तो संघर्षों को भी स्वयं ही जीतना होगा।
संघर्ष तो सफल जीवन का आभूषण होते है, जिनसे सज कर ही जीवन, सम्पूर्ण
संसार में सूर्य की तरह चमकता है। अत: प्रत्येक व्यक्ति संसार को,
कुरूक्षेत्र की युद्ध-भूमि मान सकता है, और प्रत्येक व्यक्ति ही अपने
अस्तित्व के लिये, इस युद्ध-भूमि में कठोर संघर्ष कर रहा है। परन्तु कुछ
ही व्यक्ति इस युद्ध-भूमि में विजय हो पाते है, ऐसा किस कारण से होता है?
ऐसा इसलिये होता है, क्योंकि उन्हे आत्म-विश्वास होता है, और इस
आत्मविश्वास के कारण ही वे अपनी शक्ति को पहचानते हैं, स्वयं के उन गुणों
से परिचित होते है, जो ईश्वर की संतान के रूप में उनके पास होते है
उन्हें विश्वास होता है ईश्वर की शक्ति पर, उनके सर्वविराजमान् रूप पर।
कुरूक्षेत्र की युद्ध-भूमि पर भी, ऐसे अनेक महान योद्धा थे, जो अर्जुन को
पराजित कर सकते थें, परन्तु श्री कृष्ण भगवान की कृपा से ही, अर्जुन उन
योद्धाओं को मारने में सफल हुये। ईश्वर तो सर्वत्र विराजमान् है उनके
संरक्षक रूप की शीतल छाया भी, हर उस व्यक्ति को मिल सकती है, जो ईश्वर पर
अडिग आस्था रखता हो। परन्तु जो ईश्वर के अस्तित्व से ही अपरिचित है, वह
ईश्वर की स्नेह की वर्षा का आनंद किसी प्रकार उठा सकता है?
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