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  वनावरण - जलवायु परिवर्तन का जवाब
कल्पना पालकीवाला
जौन मैकार्मिक ने पुस्तक न्न रिक्लेमिन्ग पैराडाइज में लिखा है, स्टॉकहोम सम्मेलन में इस बात पर कोई शक नहीं था कि अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय विकास में यह एक अभूतपूर्व घटना है क्योंकि पहली बार विश्व पर्यावरण संबंधी राजनैतिक, सामाजिक और आर्थिक समस्याआं पर अंतर-सरकारी मंच पर चर्चा हुई ताकि वास्तव में सुधार के कदम उठाए जा सकें ।
      मानव पर्यावरण पर स्टॉकहोम सम्मेलन की शुरूआत को रेखांकित करते हुए संयुक्त राष्ट्र आम सभा ने 1972 में विश्व पर्यावरण दिवस की स्थापना की जो हर वर्ष पांच जून को मनाया जाता है । विश्व पर्यावरण दिवस प्रमुख आधार है जिसके माध्यम से संयुक्त राष्ट्र पूरे विश्व में पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करता है और राजनैतिक ध्यानाकर्षण को बढाता है । 1972 में ही संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की स्थापना किया गया था जो विश्व पर्यावरण दिवस का, पर्यावरण के प्रति जागरूकता पैदा करने और लोगों को पहल करने के लिए प्रोत्साहित करने में उपयोग करता है ।
      विश्व पर्यावरण दिवस का एजेंडा है पर्यावरणीय मुद्दों को मानवीय चेहरा देना, सतत और बराबरी वाले विकास के लिए लोगों को अधिकार सम्पन्न करना, समुदायों में यह भाव पैदा करना कि वे पर्यावरण के प्रति नजरिए में बदलाव लाने और स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय भावनाओं से ऊपर उठकर साझेदारी को प्रोत्साहित करने में प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि लोग पहले से ज्यादा सुरक्षित और समृध्द भविष्य में कदम रख सकें ।
        विश्व पर्यावरण दिवस 2009 का विषय है - आपके ग्रह को जरूरत है आपकी  - जलवायु परिवर्तन से लड़ने को एक हों ।  इस विषय से यह स्पष्ट हो जाता है कि सभी देशों को जलवायु के संबंध में एक होने की जरूरत है । यह एकता इसी साल कोपेनहेगन में आयोजित होने वाली जलवायु संबंधी बैठक में दिखानी होगी । यह बैठक गरीबी से पार पाने और वन प्रबंधन में सुधार के बीच जो रिश्ता है, उसे परिलक्षित करती है । इस वर्ष के विश्व पर्यावरण दिवस का मेहमान देश मैक्सिको है ।
        मैक्सिको हरित अर्थव्यवस्था और जलवायु परिवर्तन के विरूध्द जंग में होने वाली क्षेत्रीय और विश्व पहल का केन्द्र है । यहीं विश्व पर्यावरण दिवस - 2009 मनाया जा रहा है । मैक्सिको का चयन इसीलिए किया गया कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ जंग में लातीनी अमेरिका में उसकी व्यावहारिक और राजनैतिक भूमिका बढती ज़ा रही है जिसमें कार्बन बाजार में उसकी बढती हिस्सेदारी सम्मिलित है । संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम ने एक नए और पहले से ज्यादा महत्त्वाकांक्षी चरण - सात अरब वृक्ष अभियान की शुरूआत की है ।
      वनावरण और जलवायु परिवर्तन मोर्चा 
      भारत में पौधा रोपण, उसे पालना, बचाना और उसका संरक्षण करना बहुत पुरानी परंपरा और उसका ऐतिहासिक महत्त्व भी है । कुछ समुदायों में पेड़ को काटने से पहले प्रार्थना की जाती है और पेड़ से क्षमता मांगी जाती है । पूरे भारत में झुरमुटों को पवित्र मानना आम है जहां पौधों और पेड़ों के झुरमुटों  की सुरक्षा की जाती है और समृध्दि के लिए उनकी पूजा की जाती है । हिन्दू, जैन और बौध्द पौधों और पेड़ों का सम्मान करते हैं और उन्हें जीवित प्राणी की तरह मानते हैं । बौध्द भिक्षु जो उपदेश देने के लिए सदैव चलायमान रहते हैं, वे भी वर्षा काल में यात्रा स्थगित कर देते हैं ताकि पौधे और अंकुरित बीज नष्ट न हो जाएं । जैन धर्म में अंकुरित दाना खाना मना है क्योंकि जैन समुदाय दाने को पनपता जीवन मानते हैं जिसे बढने क़ी अनुमति होनी चाहिए।
राष्ट्रीय वनावरण एवं पारिस्थितिकी बोर्ड
        पर्यावरण एवं वन मंत्रालय में राष्ट्रीय वनावरण एवं पारिस्थितिकीय विकास बोर्ड की देश में वनावरण को प्रोत्साहन, पौधा रोपण, पारिस्थितिकीय पुन: स्थापना और पारिस्थतिकीय विकास गतिविधियां चलाने की जिम्मेदारी है । इसके तहत उजाड़ वन क्षेत्रों तथा वनों, राष्ट्रीय उद्यानों, अभयारण्यों और अन्य संरक्षित क्षेत्रों के साथ-साथ पारिस्थितिकीय रूप से कमजोर पश्चिमी हिमालय, अरावली और पश्चिमी घाटों पर विशेष ध्यान देना भी बोर्ड की जिम्मेदारी है ।
राष्ट्रीय वनावरण कार्यक्रम योजना
        राष्ट्रीय वनावरण कार्यक्रम, राष्ट्रीय वनावरण एवं पारिस्थितिकीय बोर्ड की अग्रणी योजना है जो वन विकास एजेंसियों को वास्तविक और सांस्थानिक समर्थन देती है, जो संयुक्त वन प्रबंधन के सांस्थानिकीकरण की दिशा में उठाया गया बड़ा कदम है । वन विकास एजेंसियों को वन उपखंड स्तर पर संयुक्त वन प्रबंधन समितियों के संघ के रूप में कल्पना और स्थापना की गयी है ताकि जनता की भागीदारी के साथ वनों का आमूल विकास हो सके । योजना के लक्ष्य हैं -
  • समुदायों की सक्रिय भागीदारी के जरिए प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा और संरक्षण करना
  • जमीनों को खराब होने, वनों के उजड़ने और जैव-विविधता के नुकसान को रोकना
  • पारिस्थितिकी का पुनरूध्दार, पर्यावरण का संरक्षण और पारिस्थितिकीय - विकास
  • गांवों में और उनके आस पास प्राकृतिक संसाधनों के सतत प्रबंधन के लिए गांव स्तरीय संगठनों की क्षमता बढाना ।
  • आम सामान के लिए उत्पादकता, समानता और दीर्घकालीनता के व्यापक उद्देश्यों को पूरा करना।
  • वनों के भीतर और आसपास रह रहे लोगों के जीवन और जीविका के स्तर में सुधार और
  • ग्रामीण लोगों की रोजगार क्षमता में सुधार के लिए उनकी प्रतिभा क्षमता और दक्षता को बढावा
       स्वायत्तशासी पहाड़ी जिलों सहित सभी 28 राज्यों के वनजीवन क्षेत्रों को इस कार्यक्रम में शामिल किया गया है । बेसहारों का पुनर्वास, कृषिरहित क्षेत्रों को कृषि क्षेत्र बनाना और औषधीय पौधों का पुन:उत्पादन का भी बीड़ा उठाया गया है ।
उपलब्धियां
        (31 मार्च, 2009) कुल 157.90 लाख हेक्टेयर क्षेत्र की देखभाल के लिए 2,675.26 करोड़ रूपये की लागत से 2000-01 में एफडीए व्यवस्था की शुरूआत के बाद से 795 एफडीए कार्यान्वित की जा चुकी है । इस कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि भूमियों के पुनर्वास पर विशेष ध्यान दिया गया है और पूर्वोत्तर राज्यों और ओड़िशा में 34 जेएचयूएम परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गयी है ।
        31 मार्च, 2009 को, राष्ट्रीय वनरोपण कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए वर्ष 2008-09 के दौरान एफडीए को 345.62 करोड़ रुपये जारी किए गए ।
        अनुमानत: 1 करोड़ 20 लाख गृह स्वामियों को लाभ पहुंचाते हुए 9 करोड़ 70 लाख कार्य दिवसों का सृजन किया गया । इनमें 22 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 38 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति शामिल थीं ।
        परियोजना ग्रामों में करीब 53 लाख गृह स्वामियों में 25 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 21 प्रतिशत जनजाति को शामिल किया गया 
        एंट्री पाईंट गतिविधि का लाभ करीब 19 लाख 20 हजार गृह स्वामियों को मिला जिसमें 23 प्रतिशत अनुसूचित जाति और 27 प्रतिशत अनुसूचित जनजाति से थे ।
पारिस्थितिकी विकाल बल (ईडीएफ) योजना
        पारिस्थितिकी विकास बल (ईडीएफ) योजना 1982 में रक्षा मंत्रालय द्वारा प्रारंभ की गयी थी । इसका उद्देश्य वनरोपण, मिट्टी संरक्षण और जल संसाधन प्रबंधन के माध्यम से पारिस्थितिकी तंत्र को फिर से सुधारने के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों में वनरोपण और पारिस्थितिकी विकास में सेवानिवृत्ति कर्मचारियों को शामिल करना है । यह योजना पिछली चार योजनाओं से कार्यान्वित है ।
        वर्तमान में, सेवानिवृत्त कर्मचारियोंक्षेत्रीय सैन्यकर्मियों के माध्यम से छ: पारिस्थितिकी कार्य बल बटालियन है । ये शिवालिक, उत्तराखण्ड, राजस्थान, केनाल, बज्जू, जम्मू और कश्मीर, पिथौरागढ, उत्तराखण्ड, सोनितपुर (पश्चिम) और असम के हलतुगांव में कार्य कर रही हैं ।
प्रस्तावित ग्राम वन योजना स्कीम
        एक नई प्रस्तावित स्कीम है ग्रामपंचायत वन योजना । जो पंचायती राज संस्थानों को वन रोपण और वन रहित भूमियों में पौधारोपण के लिए शामिल करेगी । भारत ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी रणनीति के अंतर्गत 30 जून, 2008 को जलवायु परिवर्तन पर अपनी राष्ट्रीय कार्य योजना को जारी किया । राष्ट्रीय कार्य योजना एक ऐसी रणनीति की वकालत करता है जो जलवायु परिवर्तन और भारत के विकास पथ की दीर्घकालीनता को प्रोत्साहित करता है ।
जलवायु परिवर्तन पर आठ राष्ट्रीय अभियान
राष्ट्रीय सौर अभियान का उद्देश्य सौर प्रौद्योगिकियों के अलावा अन्य नवीकरण और परमाणु ऊर्जा, वायु ऊर्जा एवं जैविक जैसे गैर जीवाश्म विकल्पों के माध्यम से कुल ऊर्जा में सौर ऊर्जा के अंश को बढाना है । ऊर्जा दक्षता को बढाने के राष्ट्रीय अभियान में ऊर्जा का उपयोग करने वाले बड़े उद्योगों और सुविधाओं में अधिकृत ऊर्जा बचत में व्यवसाय के लिए एक बाजार आधारित व्यवस्था, निर्धारित क्षेत्रों में ऊर्जा कुशलता उपकरणों को बढावा, भविष्य में ऊर्जा बचत की योजना के द्वारा सभी क्षेत्रों में मांग अनुरूप प्रबंधन कार्यक्रम और ऊर्जा कुशलता के प्रोत्साहन के लिए वित्तीय साधनों का विकास जैसी चार नई पहलें शामिल हैं । भवनों, ठोस कचरे का प्रबंधन में ऊर्जा कुशलता और जैव-डीजल एवं हाइड्रोजन पर आधारित परिवहन विकल्पों सहित सार्वजनिक परिवहन के मॉडल में बदलाव को प्रोत्साहन देने वाले दीर्घकालीन प्रयासों पर राष्ट्रीय अभियान । राष्ट्रीय जल अभियान का उद्देश्य जल संरक्षण, दुरूपयोग को न्यूनतम करना और राज्यों में और एक से दूसरे राज्यों में अधिक समान वितरण को सुनिश्चित करना ।
हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र को बनाए रखने के लिए राष्ट्रीय अभियान का उद्देश्य हिमालय के हिमनदों और पहाड़ों की पारिस्थितिकी व्यवस्था की सुरक्षा और दीर्घकालीनता हेतु प्रबंधन उपाय करना है। हरित भारत के लिए राष्ट्रीय अभियान वन्य भूमि पर वनाच्छादन करके पारिस्थितिकी प्रणाली से संबंधित सेवाओं को बढाने पर जोर देता है ताकि राष्ट्रीय नीति के अधीन निर्धारित देश के कुल भू-क्षेत्र के 33 प्रतिशत भाग को वनाच्छादित किया जा सके । राष्ट्रीय धारणीय कृषि मिशन भारतीय कृषि को जलवायु परिवर्तन के प्रति और भी अधिक प्रतिरोधक बनाने हेतु रणनीतियां विकसित करने में मददगार होगी जो वर्षा के कारण नष्ट होने वाली कृषि की ताप उत्पादकता वाली नई प्रजाति के माध्यम से संभव हो सकता है । जलवायु परिवर्तन के लिए रणनीतिक ज्ञान पर आधारित राष्ट्रीय मिशन का लक्ष्य अनुसंधान और प्रौद्योगिकी विकास के साथ ही समुचित निधि सुनिश्चित करना तथा जलवायु परिवर्तन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ी चुनौतियों की पहचान करना और तदनुसार काम करना है ।
 
उप निदेशक, पत्र सूचना कार्यालय दिल्ली                               
शंकरअरूणसंजीवसुधीरसंजय-
 
 
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