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मैं मृत्यु सिखाता हूँ
यह मौत से डरा हुआ आदमी अपने को
मजबूत करने के लिए दोहराता है कि 'आत्मा अमर है।' वह यह कह रहा है कि नहीं,
नहीं मुझे नहीं मरना पड़ेगा, आत्मा अमर है। लेकिन भीतर प्राण कांप रहे हैं
और वह ऊपर से कह रहा है कि आत्मा अमर है। जो आदमी जानता है कि आत्मा अमर
है, उसे एक बार भी यह दोहराने की जरूरत नहीं है कि आत्मा अमर है क्योंकि वह
जानता है, बात खतम हो गई।
जीवन
क्या है, मनुष्य इसे भी नहीं जानता है। और जीवन को ही हम न जान सकें, तो
मृत्यु को जानने की तो कोई संभावना हो शेष नहीं रह जाती। जीवन ही अपरिचित
और अज्ञात हो तो मृत्यु परिचित और ज्ञात नहीं हो सकती है। सच तो यह है कि
हमें जीवन का पता नहीं, इसलिए ही मृत्यु घटित होती प्रतीत होती है। जो जीवन
को जानते है, उनके लिए मृत्यु एक असंभव शब्द है, जो न कभी घटा, न घटता है,
न घट सकता है। जगत् में कुछ शब्द बिल्कुल ही झूठे हैं, उन शब्दों में कुछ
भी सत्य नहीं है। उन्हीं शब्दों में मृत्यु भी एक शब्द है, जो नितांत असत्य
है। मृत्यु जैसी घटना कहीं भी नहीं घटती। लेकिन हम लोगों को तो रोज मरते
देखते हैं, चारों तरफ रोज मृत्यु घटती हुई मालूम होती है। गांव-गांव में
मरघट हैं। और ठीक से हम समझें तो ज्ञात होगा कि जहां-जहां हम खड़े हैं,
वहां-वहां न मालूम कितने मनुष्यों की अर्थी जल चुकी है। जहां हम निवास बनाए
हुए हैं, उस भूमि के सभी स्थल मरघट रह चुके हैं। करोड़ों-करोड़ों लोग मरे है,
रोज मर रहे हैं, और अगर मैं यह कहूं कि मृत्यु जैसा झूठा शब्द नहीं है
मनुष्य की भाषा में, तो आश्चर्य होगा। यह बात वैसी ही है जैसी आपने सुनी
होगी कि एक बार अंधकार ने भगवान से जाकर प्रार्थना की थी कि यह सूरज
तुम्हारा, मेरे पीछे बहुत बुरी तरह पड़ा हुआ है। मैं बहुत थक गया हूं। सुबह
से मेरा पीछा होता है और सांझ मुश्किल से मुझे छोड़ा जाता है। मेरा कसूर
क्या है? दुश्मनी कैसी है यह? यह सूरज क्यों मुझे सताने के लिए मेरे पीछे
दिन-रात दौड़ता रहता है? और रात भर में मैं दिन भर की थकान से विश्राम भी
नहीं कर पाता हूं कि फिर सुबह सूरज द्वार पर आकर ख़डा हो जाता है। फिर भागो।
फिर बचो। यह अनंत काल से चल रहा है। अब मेरी धैर्य की सीमा आ गई और मैं
प्रार्थना करता हूं, इस सूरज को समझा दें।
सुनते
हैं, भगवान ने सूरज को बुलाया और कहा कि तुम अंधेरे के पीछे क्यों पड़े हो?
क्या बिगाडा है अंधेरे ने तुम्हारा? क्या है शत्रुता? क्या है शिकायत? सूरज
कहने लगा, अंधेरा! अनंत काल हो गया मुझे विश्व का परिभ्रमण करते हुए, लेकिन
अब तक अंधेरे से मेरी कोई मुलाकात नहीं हुई। अंधेरे को मैं जानता ही नहीं।
कहां है अंधेरा? आप उसे मेरे सामने बुला दें, तो मैं क्षमा भी मांग लूं और
आगे के लिए पहचान लूं कि वह कौन है ताकि उसके प्रति कोई भूल न हो सके।
इस बात को हुए भी अनंत काल हो गए। भगवान की फाइल में यह बात वहीं पड़ी है।
वह अब तक अंधेरे को सूरज के सामने नहीं बुला सके हैं। नहीं बुला सकेंगे। यह
मामला हल नहीं होने का है। सूरज के सामने अंधकार कैसे बुलाया जा सकता है?
अंधकार कोई सत्ता ही नहीं है, कोई एक्झिस्टेंस नहीं है। अंधकार की कोई
पॉजिटिव, कोई विधायक स्थिति नहीं है। अंधकार तो सिर्फ प्रकाश के अभाव का
नाम है। वह तो प्रकाश की गैर मौजूदगी है, वह तो एबसेंस है, वह तो
अनुपस्थिति है। तो सूरज के सामने ही सूरज की अनुपस्थिति को कैसे बुलाया जा
सकता है।
नही! अंधकार को सूरज के सामने नहीं लाया जा सकता है। सूरज तो बहुत बड़ा है,
एक छोटे से दीए के सामने भी अंधकार को लाना मुश्किल है। दीए के प्रकाश के
घेरे में अंधकार का प्रवेश मुश्किल है। दीए के सामने मुठभेड़ मुश्किल है।
प्रकाश है जहां, वहां अंधकार कैसे आ सकता है! जीवन है जहां, वहां मृत्यु
कैसे आ सकती है! या तो जीवन है ही नहीं और या फिर मृत्यु नहीं है। दोनों
बातें एक साथ नही हो सकतीं। हम जीवित हैं, लेकिन हमें पता नहीं कि जीवन
क्या है। इस अज्ञान के कारण ही हमें ज्ञात होता है कि मृत्यु भी घटती है।
मृत्यु एक अज्ञान है। जीवन का अज्ञान ही मृत्यु की घटना बन जाती है। काश!
हम उस जीवन से परिचित हो सकें जो भीतर है।
मनुष्य
मृत्यु नहीं है, मनुष्य अमृत हैं। समस्त जीवन अमृत है। लेकिन हम अमृत की ओर
आंख ही नहीं उठाते हैं। हम जीवन की तरफ, जीवन की दिशा में कोई खोज ही नहीं
करते हैं, एक कदम भी नहीं उठाते। जीवन से रह जाते हैं अपरिचित और इसलिए
मृत्यु से भयभीत प्रतीत होते हैं। जिसे हम जान लेते है, उससे हम मुक्त हो
जाते हैं। और जिसे हम जान लेते है, उसे हम जीत भी लेते हैं। हमारी हार और
पराजय हमारे अज्ञान के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अंधकार है, इसलिए पराजय
है। प्रकाश हो तो पराजय असंभव है। प्रकाश विजय बन जायेगा। जीवन का जो रूप
हमने दिया है, वह भी मृत्यु के भय के कारण ही दिया है! मृत्यु के भय ने
समाज बनाया है, राष्ट्र बनाये हैं, परिवार बनाये है, मित्र इकट्ठे किए है।
मृत्यु के भय ने धन इकट्ठे करने की दौड़ दी है, मृत्यु के भय ने पदों की
आकांक्षा दी हैं, और सबसे बड़ा आश्चर्य यह है कि मृत्यु के भय ने हमारे
भगवान और हमारे मंदिर भी खड़े कर दिए है। मृत्यु से भयभीत घुटने टेक कर
प्रार्थना करते हुए लोग हैं। और मृत्यु से ज्यादा असत्य कुछ भी नहीं है।
लेकिन मृत्यु का असत्य हमें कैसे पता चले? यह हम कैसे जान पाएं कि मृत्यु
नही है? और जब तक हम यह न जान पाएं, तब तक हमारा भय विलीन नहीं होगा। और जब
तक हम यह न जान पाएं कि मृत्यु असत्य है, तब तक जीवन हमारा सत्य नहीं हो
सकता है। जब तक मृत्यु का भय है, तब तक जीवन सत्य नहीं हो सकता है। जीवन को
केवल वही जी सकता है, जिसके सामने से मृत्यु की छाया विदा और विलीन हो गई
है। कंपता हुआ मन कैसे जीएगा? डरा हुआ मन कैसे जीएगा? और मौत जब प्रतिपल
आती हुई मालूम पड़ती हो तो हम कैसे जीएं? हम कैसे जी सकते हैं? और हम कितना
भी भुलाए रखें मृत्यु को, वह भूली नहीं रहती। मरघट हम गांव के बाहर बनाएं
तो भी कोई फर्क नहीं पड़ता, वह दिखाई पड़ ही जाता है। रोज कोई न कोई मरता है,
रोज कहीं न कहीं मृत्यु घटित होती है और हमारे जीवन की सारी नींव हिल जाती
है। और प्रत्येक बार जब भी मृत्यु घटती हुई दिखाई पडती है, तभी हम जानते है
कि मैं भी मरूंगा। जब हम किसी की मृत्यु पर रोते हैं, तब हम सिर्फ उसकी
मृत्यु पर ही नहीं रोते, अपनी मृत्यु की खबर पर भी रोते हैं। उसमें हमारे
मरने की संभावना भी प्रकट हो गई होती है। मृत्यु के भय ने एक तरह के मंदिर
निर्मित किए हैं वे परमात्मा के मंदिर नहीं हैं। और मृत्यु के भय से एक तरह
की प्रार्थनाएं निर्मित हुई हैं, वे भी परमात्मा की प्रार्थनाएं नहीं हैं।
परमात्मा के मंदिर पर तो वह पहुंचता है, जो जीवन के आनंद से परिपूरित हो
जाता है। और परमात्मा की सीढ़ियां जीवन के सौंदर्य और जीवन के रस से भरी हुई
हैं। और परमात्मा के द्वार की घंटियां सिर्फ उनके लिए बजती हैं, जो सब तरह
के भय से मुक्त होकर अभय हो जाते हैं।
मृत्यु
के संबंध में पहली बात आपसे यह कहना चाहूंगा कि मृत्यु से अधिक असत्य और
कुछ भी नहीं है। लेकिन मृत्यु ही सत्य मालूम होती है। न केवल सत्य मालूम
होती है, बल्कि जीवन का केंद्रीय सत्य भी वही मालूम होती है। और ऐसा प्रतीत
होता है कि सारा जीवन मृत्यु से घिरा हुआ है। और चाहे हम भूल जाते हों,
भुला देते हो, लेकिन फिर भी मृत्यु चारों तरफ निकट ही खड़ी रहती हैं। अपनी
छाया से भी ज्यादा अपने पास मृत्यु है।
: प्रस्तुति स्वामी चैतन्य कीर्ति ओशो वर्ल्ड
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