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Radhey Shyam Sharma गड़बडाते जनतंत्र में लड़खड़ता गणतंत्र

एक लम्बी गुलामी के बाद भारत आजाद हुआ, तब सभी के सामने केवल एक ही प्रश्न था कि अब हम किस रीति, नीति, विधि से चले ताकि सभी को बिना भेदभाव, अत्याचार, अनाचार के भयहीन माहौल निर्मित कर प्रगति एवं विकास कर सकें। इसे मूर्त रूप देने का काम डॉ. राजेन्द्र प्रसाद एवं डॉ. भीमराव अम्बेडकर को भारत की परिस्थितियों को मद्देनजर रख संविधान निर्माण का दायित्व सौंपा। निःसंदेह उन्होंने अपने पूरे अन्तः प्राणों से देश चलाने के लिए पवन पावन संविधान बनाया। भारत के संविधान की उद्देशिका ही इतनी अदभुत है कि इसकी मूल भावना को समझने में किसी भी प्रकार का संदेह न रहे। ‘‘हम भारत के लोग, भारत को एक संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथ निरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए तथा उसके समस्त नागरिकों को समााजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय, विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखण्डता सुनिश्चित् करने वाली बंधुता बढाने के लिए दृढ़ संकल्प हो अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर 1949 ई. मिति मार्ग शीर्ष शुक्ल सप्तमी, संवत दो हजार छह विक्रमी को एतद् द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।’’
हमारे तथाकथित समाजसेवी एवं जनप्रतिनिधि इसे मटियामेट करने में कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ रहे हैं, हर कार्य संविधान उद्देशिका के विपरीत करने में पूरे प्राणों से जुटे हुए हैं। मसलन समाजवादी हम रहे नहीं, सामजिक एवं आर्थिक में हमने खाई पैदा कर दी, जनता को जातियों में बॉंट आरक्षण की दीवार खडी कर और विभाजन करने में जुटे, जिससे अवसर की समता स्वतः खत्म हो गई। रहा सवाल देश की एकता, अखण्डता गरिमा का वह क्षैत्रियवादता के द्वारा और खण्ड-खण्ड करने में लगे है अंतिम सवाल है देश की गरिमा का वो हम सभी आए दिन देख रहे है कि किस तरह देश के तथाकथित जनप्रतिनिधि संवैधानिक मर्यादाओं को त्याग देश को गिद्ध की भांति नोचने में लग, काले धन को देश के बाहर जमा करने में बगुला की भांति लगे हुए है।
आज जन प्रतिनिधि अपने संवैधानिक कर्त्तव्यों को भूल केवल अधिकार की ही जुगत में लगे रहने के साथ-साथ कार्यपालिका के क्षेत्र में छेद करने में लगे हैं। आज विधायी पालिका के पास जनोमुखी विकास का कोई भी ब्लू प्रिन्ट नहीं है। विधायी पालिका राजनीतिक गठबंधन में उलझ निरीह, असहाय हो चौराहा पर केवल मजाक, हंसी ठिठोली तो कभी रूदन का कारण बन रही है।
संविधान के चीरहरण में हमारे दुःशासन तथाकथित जनप्रतिनिधि एवं मंत्रीगण भरपूर विधायी पालिका का दोहन करने के साथ-साथ न्यायपालिका को भी अपनी रखेल बनाने की कुचेष्ठा कर रहे हैं? इसमें मंत्रियों से लेकर विधायकों की लम्बी फेहरिस्त हैं हाल ही में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियों को नजरअंदाज करते हुए विलासराव देशमुख को केन्द्रीय मंत्री बनाए रखने से जस्टिस अशोक कुमार गांगोली इतने आहत एवं क्रोधित है कि उन्होंने सार्वजनिक तौर पर इसे सरकार की बेशर्मी करार दिया। दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री न्यायालयो को हद में रहने की घुट्टी पिला रहे है। मनमोहन सिंह निःसंदेह ईमानदार छबि के है लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि उनके बिगडेैल मंत्रियों को ले, न्यायालय यदि कोई टीका टिप्पणी करता है तो उसे गंभीरता से लेना चाहिए ताकि समाज में एक अच्छा संदेश जायें ना कि बिगडैल मंत्रियों को बचायें। प्रधानमंत्री को आखिर भारत की जनता को यह बताना ही होगा कि आखिर किस प्रकार न्यायालय ने मर्यादा तोडी? क्या गलत कहा? इसे दुर्भाग्य कहे या विडंबना आज हर राष्ट्रीय पर्व पर संवैधानिक पदों पर बैठे जनप्रतिनिधियों की चिंता का विषय अलगाववाद, आतंकवाद, भ्रष्टाचार और महंगाई ही होता है और हो भी क्यों न? चिंता वाजिब है। ऐसा ही कुछ दर्द 62वें गणतंत्र की पूर्व संध्या पर राष्ट्रपति महामहिम प्रतिभा पाटिल ने कहा कि विकास और योजनाओं में संवेदनहीनता से देश की प्रगति रूकती हैं। संसद की सुचारू कार्यवाही सिर्फ सरकार ही नही विपक्ष की भी जिम्मेदारी हैं। यदि यही हाल रहा तो संसद जनता का विश्वास खो देगी। ऐसा सोचते ही भारत के सामने मिस्त्र की जनता का बगावती तैवर अनायास ही तैरने लगता है। यहां मीडिया की भी जिम्मेदारी बनती है कि इस आंदोलन के बारीक पहलुओं को पूरा दिखाये ताकि नई पीढ़ी देखें कि क्रांति कैसे होती है। हालांकि पश्चिमी देशों की तरह भारत में जल्द क्रांति नहीं होती है और जब होती है उसे अंजाम तक पहुंचने के लिए कोई ताकत रोक नहीं पाती।
आज भारत के सामने संकट भ्रष्टाचार या काले धन का नहीं है। संकट है तो संवैधानिक पदों पर बैठे संवैधानिक जन प्रतिनिधियों का जो देश की निष्ठा के प्रति अविश्वास, प्रतिघात और विश्वासघात का चरित्र बनाए हुए है। ये लोग ऐसा निकृष्ट कार्य न केवल जनता के साथ कर रहे है बल्कि देश के साथ भी ऐसा कर उसे शर्मसार कर अपमानित कर रहे हैं। देश की तार-तार होती आबरू की भरपाई बयानवीरों से नहीं हो सकती? केवल मुकद्मा चलाने से नहीं हो सकती? बल्कि शीघ्र अति शीघ्र इन्हें सजा देने से ही हो सकती है। आज कोई भी राजनीतिक दल इससे अछूता नहीं है। ऐसा लगता है कि इस देश एवं देशवासियों का लहू नीला पड़ गया हैं। आज निर्लज्जता एवं बेशर्मी ही जनप्रतिनिधियों एवं अधिकारियों का गहना बनती जा रही है। राजनीतिक पार्टियों की बेशर्मी तो देखिए उनका पहला प्रयास दोषियों को बचाने का ही होता है फिर बात चाहे मंत्रियों की हो या अफसरों की। वो तो भला हो मीडिया और न्यायपालिका का जिनका जमीर समय-समय पर जोरमार जागृत हो जाता है। फिर राजनीतिक पार्टियों को अपने को स्वच्छ दिखाने के चक्कर में दोषी व्यक्ति को काफी नानुकर के बाद सीखचों के पीछे भिजवाने जैसा अप्रिय कदम भी उठाना पडता है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि न्यायालय एवं कुछ जागरूक प्रतिनिधियों के चलते केन्द्र सरकार को अपनी ही सरकार के मंत्री ए.राजा को जेल की सलाखों के पीछे भिजवाना पडा। अब, जब भ्रष्टाचार के स्वेटर का एक सिरा हाथ लग ही गया है तो अब पूरे भ्रष्टाचार के स्वेटर को केन्द्र सरकार को आगे बढ उधेडना ही होगा। इसी तरह पुराने घोटालों से जुडे सभी मंत्रियों को सत्ता सुख से वंचित कर शीघ्र हवालात भेजना होगा ताकि जनता का खोया विश्वास संसद पुनः प्राप्त कर सके। ईमानदार जन प्रतिनिधियों को चाहिए कि वे स्वयं भ्रष्टाचारियों को उनके सही स्थान जेल में भेजने के लिए जनता के बीच आंदोलन चला संविधान में आवश्यक सुधार की पहल करें। अब तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी मानने लगे है कि भ्रष्टाचार ने केवल सुशासन की जड़ों को खोखला कर रहा है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि भी धूमिल होने के साथ-साथ जनता के भी सामने शर्मिंदगी उठाना पड रही है।
भारत की जनता अब योग गुरू बाबा रामदेव में गांधी का अक्स देख रही हैं। निःसंदेह उनकी सोच भारत की जनता की सोच से मेल खा रही है। अब वक्त आ गया है कि राजनीतिक दलों को अपना पुर्नजन्म करना होगा। संवैधानिक पदों का दुरूपयोग करते मंत्रियों एवं जन प्रतिनिधियों को स्वयं बताना होगा कि चंद वर्षों में कैसे करोड़पति-अरबपति बनें? अपने धन्धों के लिए आय के स्त्रोतों को जनता के सामने बताने की स्वयं घोषणा करनी होगी। आज वक्त पारदर्शिता का है। जन प्रतिनिधियों को अपने गोरखधन्धों, जातिवाद, क्षेत्रवाद, निजी स्वार्थ को छोड़ खुले मन से जनता के साथ आना ही होगा।
लेखिका डॉ. शशि तिवारी
(सूचनामंत्र पत्रिका की संपादक है)
मो.- 9425677352
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