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  आयोडेक्स मलिए, पर चलिए कहां ?

रेडियो और दूरदर्शन का एक विज्ञापन हमें ज्ञान देता है कि 'आयोडेक्स मलिए, काम पर चलिए'। लेकिन अफसोस कि विज्ञापन वाले अधूरी बात ही बताते हैं। वे आखिर यह क्यों नहीं बताते कि काम पर कहां चलें? हिंदुस्तान में करोड़ों बेराजगार काम तलाशने के काम में लगे हुए हैं। निष्काम भाव से काम की तलाश में देश का एक बड़ा तबका लगा हुआ है।
फिर काम पर चलने से पहले आयोडेक्स का मलना ही क्यों जरूरी है ? क्या बिना आयोडेक्स मले हम काम पर नहीं चल सकते ? आयोडेक्स मलने के बाद उसकी सुगंध वैसे भी घर पर रुकने नहीं देगी और आदमी घर छोड़ेकर बाहर की ओर जाएगा ही। जब बाहर जाएगा, तो कुछ न कुछ काम भी जरूर करेगा।
चोर-उचक्कों को यह विज्ञापन खूब भाया। शाम हुई नहीं कि आयोडेक्स लगाया और लूट-पाट, मार-काट के काम पर निकल पड़े। विज्ञापन ने कभी यह नहीं बताया कि किस काम पर निकलना है? काम अच्छा हो या बुरा, यह करने वाले को तय करना है। विज्ञापन वाला तो सिर्फ काम पर चलने की बात करता है।
अब एक नई बहस शुरू हो गई है। अभी तक सिर्फ सरकारी नौकरियों में आरक्षण था। अब निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी आरक्षण की आवाजें सुनाई देने लगी हैं। आप चाहें, तो निजी क्षेत्र की ओर रूख कर सकते हैं और चाहें, तो सरकारी नौकरियों की ओर। जोर तो सिर्फ चलने पर है।
साधु-महात्माओं को इस विज्ञापन का विरोध करना चाहिए, क्योंकि धर्म तो काम, क्रोध, लोभ और मोह से बचने की बात करता है। काम से विरक्ति धर्म का मूल है और काम पर चलना विज्ञापन का मूल। दोनों के मूल में विरोधाभास है। एक कहता है कि काम पर चलो, तो दूसरा कहता है, काम को छोड़ो।
मशहूर शायर गालिब ने कहा था, 'इश्क ने गालिब निकम्मा कर दिया, वरना हम भी आदमी थे काम के ।' गालिब ने कहा कि वह भी आदमी काम के थे, लेकिन यह नहीं स्पष्ट किया कि वह किस काम के थे ? अगर काम के ही थे, तो काम पर क्यों नहीं चलते थे ? लेकिन सवाल यह उठता है कि काम पर आखिर जाते भी कहां, क्योंकि वह तो बकौल खुद, निकम्मे हो चुके थे।
आम हिंदुस्तानी काम पर चलने से पहले हाथों में खैनी मलता है और यदि काम न बने, तो खाली हाथ मलता है। धार्मिक अनुष्ठान से पहले माथे पर चंदन मलता है। मौक्का लग जाए, तो दूसरों पर गोबर मलता है। हिंदुस्तान में मलने के लिए बहुत-सी चीजें मौजूद हैं, इसलिए किसी विज्ञापन के जरिये हिंदुस्तानियों को इस प्रकार की नेक सलाह की कतई जरूरत नहीं।
मूल सवाल फिर वही है कि आखिर आयोडेक्स मल कर जाएं, तो जाएं कहां ? सड़कें पैदल चलने लायक नहीं बचीं। रेलों में अब चोर-उचक्के, लुटेरे, धक्का देने वाले चल रहे हैं, इसलिए उसमें यात्रा करने का सवाल ही नहीं है। हवाई जहाज में उड़ने की अभी हमारी औकात हुई नहीं है। हे विज्ञापन वालो, हमें यह तो बताओ कि आखिर हम काम पर कहां जाएं ?
 
 

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