नोटबन्दी: देश के साथ मध्यप्रदेश में अब तक है "असर"...

Location: Bhopal                                                 👤Posted By: Admin                                                                         Views: 422

Bhopal: पिछले साल 8 नवंबर को नोटबन्दी के फैसले को एक साल पूरा हो गया है। लेकिन नोटबन्दी सफल रही है या विफल इस पर अब भी सवालिया निशान खड़े हुए है। मोदी की अगुवाई में जहां केंद्र और भाजपा शासित राज्य इसे ऐतेहासिक कदम बता रहे है तो विपक्षी बड़ी भूल। बहारहाल मध्य प्रदेश पर इसका क्या असर पड़ा देखते हैं।

नोटबन्दी को आज एक साल पूरा हो गया है इसका सबसे बड़ा मकसद काले धन पर नियंत्रण, सरकारी ओर निजी क्षेत्रों में नकद भुगतान काम कर कैशलेस ट्रांजेक्शन को बढ़ावा देना था।

उम्मीद थी कि इस नोटबन्दी से काला धन वापस आएगा लेकिन प्रदेश में आंकड़े देंखे तो लगता नही प्रदेश में या देश में ऐसा हुआ हो।आयकर विभाग की माने तो नोटबन्दी के पहले ही 30 सितंबर तक मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में 3000 करोड़ का कालाधन सरेंडर हुआ जबकि नोटबन्दी के बाद यानी नवम्बर 16 से मार्च 17 तक सिर्फ 154 करोड़ की काली कमाई उजागर हुई।वह भी तब जब नोटबन्दी के बाद आयकर विभाग ने बैंकों में रकम जमा करने के लिए 64 हजार लोगों को नोटिस भेजे 22 बड़ी छापामार कार्यवाही की।यानी नोटबन्दी से पहले ही सरकारी पहल के चलते कालाधन लोग सरेंडर कर चुके थे।

वही राज्य सरकार का दावा था की नोटबन्दी के बाद टेक्स कलेक्शन बढ़ेगा लेकिन आयकर विभाग के आंकड़े बताते हैं कि 2015-16 मैं टेक्स वृद्धि 2000 करोड़ रुपये थी और नोटवंदी के बाद भी 2016-17 में इतना ही टेक्स प्रदेश में आया।

लेकिन नोटबन्दी में बैंकों का खजाना जरूर लबालब हो गया ओर यह अब भी बढ़ता ही जा रहा है। यानी नोटबन्दी के बाद से लोग बैंकों में पैसा जमा ज्यादा कर रहे है और निकाल काम रहे है।जून में खत्म हुई दूसरी तिमाही में बैंकों का डिपॉजिट 3.40 लाख करोड़ हो गया है।नोटबन्दी के दौरान प्रदेश में करीब 34 हजार करोड़ रुपये जमा हुए है। जाहिर है लोगो ने पैसे जमा करने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाई बनिस्पत निकलने।

किस पर क्या असर...
सरकार पर इस नोटबन्दी का खास असर नही दिखा लेकिन आंकड़ो की माने तो सरकार को गैर पेट्रोलियम पदार्थों से मिलने वाले टेक्स में एकदम से गिरावट आई गई।सरकार को मिलने वाला मासिक राजस्व अक्टूबर में 1510 करोड़ रुपये था जो अगले ही महीने गिरकर 1267 करोड़ रुपये हो गया। हालांकि पेट्रोलियम पदार्थों की बिक्री से अकेले नवम्बर महीने में सरकार को 293 करोड़ टेक्स मिला।

किसानों को इसका सबसे ज्यादा नुकसान उठाना पड़ा इस दौरान जहां बीज खाद की खरीद नही हो पाई वहीं फसलों के मूल्यों में भी भारी गिरावट आई।ग्रामीण बाजार चूंकि केश पर निर्भर रहता है इसलिए बैंकों और एटीएम पर सीमित रोक के चलते किसान चार महीने परेशान रहे।सरकार ओर बैंकों का ध्यान भी शहरी क्षेत्रों पर था इसलिए किसान और ग्रामीण नकदी के लिये तरसते रहे।नोटबन्दी के चलते विशेषज्ञों की माने तो पूरा एक फसल चक्र बर्बाद हुआ और रबी की फसल का उत्पादन 10 से 15 फीसदी गिरा।

व्यापारी वर्ग चाहे शहर का हो या गावँ का सबसे ज्यादा परेशान रहा।अचानक आई नकदी के संकट ने अगले चार महीनों तक जैसे बाजार को ठप्प कर दिया।अकेल भोपाल में ही जहां इस अविधि में 50 हजार करोड़ का व्यवसाय होता था वो सिमट कर 40 हजार करोड़ पर आ गया।व्यापारियों के मुताबिक भले ही डिजिटल ट्रांसेक्शन में 20 से 35 फीसदी की वृद्धि हुई लेकिन भोपाल समेत प्रदेश के तमाम हिस्सों में व्यापार पर 15 से 20 फीसदी असर पड़ा। वही उद्योगों में लोगो के हाथों से रोजगार भी गए साथ हो नोटबंदी का नुकसान छोटे उद्योगों पर भी पड़ा।

आम आदमी को इस दौरान संकट का सामना करना पड़ा। रोजमर्रा के खर्चे के लिए पैसा निकालने के लिए घंटो बैंकों और एटीएम की लाइनों में लगना पड़ा। जिन घरों में शादी विवाह था उन्हें परेशानी का सामना करना पड़ा।हालांकि जनता द्वारा खरीद इस दौरान केवल अति आवश्यक वस्तुओं की ही रही नतीजतन इस दौरान इलेक्ट्रॉनिक्स वाहन ओर कपड़ा बाजार सूने ही रहे।

कहते है किसी भी निर्णय के फायदे या नुकसान का आंकलन लंबे समय बाद ही किया जा सकता है।नोटबंदी के चार महीने के दौरन देश की आम जनता हो या व्यापारी वर्ग या फिर उद्योग जगत सभी जगह परेशानी का सामना करना पड़ा।समय के साथ अब हालात में कुछ बदलाव देखा जा रहा है। लेकिन नोटबन्दी देश की ओर देश की जनता की प्रगति के लिए कितनी साबित हुई है ये अगले कुछ सालों बाद ही मालूम चलेगा।

- डॉ. नवीन जोशी

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