भाजपा में वेंकैया ही क्यों ?

Location: Bhopal                                                 👤Posted By: प्रतिवाद                                                                         Views: 824

Bhopal: 18 जुलाई 2017। यह प्रश्न सहज और सरलतम रूप से संव्याप्त है कि भारतीय जनता पार्टी ने उपराष्ट्रपति चुनाव में अपने इतने वरिष्ठ एवं अनुभवी नेता जिनको कि देश के शहरों की कायाकल्प करने की जिम्मेवारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मंत्रीमण्डल में शामिल कर बतौर शहरी विकास मंत्री सौंपी, उन्हें आखिर क्यों इस महत्वपूर्ण पद के लिए चुना गया है ? क्या भाजपा के पास देश का उपराष्ट्रपति चुना जाने वाला आवश्यक अन्य सदस्य नहीं था या उसे ऐन मौके पर कोई पद के लिए तैयार होता नहीं दिखा। इस प्रकार के अनेक प्रश्न कई लोगों के मनो-मतिष्क में इस समय चल रहे हैं। जिसमें कि सबसे अधिक भाजपा के कार्यकर्ताओं के दिमाग में हैं। किंतु जिस तरह का यह निर्णय पार्टी के शीर्ष नेतृत्व ने लिया है, उसके लिए वह अवश्य ही सराहना का पात्र है।

यदि विपक्ष चाहता तो हो सकता है कि यह निर्णय नहीं होता, आपसी सहमति बनती तो कांग्रेस समेत 18 विपक्षी दलों के गठबंधन से चुनाव में इस पद के लिए खड़े किए गए गोपालकृष्ण गांधी के नाम पर सर्वसम्मति से मुहर लग जाती। सभी जानते हैं कि गोपाल गांधी महात्मा गांधी के पौत्र हैं। वह पश्चिम बंगाल के राज्यपाल और राजनयिक रहे हैं और सिविल सोसायटी की नामी शख्सियत हैं। परन्तु इसे विपक्ष का अहंकार ही कहिए कि उसने सत्तापक्ष से इस विषय पर विमर्श करना भी उचित नहीं समझा और एक तरफा अपना उम्मीदवार तय कर दिया।

इसका नकारात्मक परिणाम यही माना जाए कि विपक्ष ने गोपालकृष्ण गांधी जैसे एक श्रेष्ठतनाम को आगे करने के बाद भी उन्हें हारने के लिए चुनाव के मैदान में छोड़ दिया है, क्योंकि वोट का गणित तो एनडीए नीत भाजपा के साथ है, जो यह साफ बता रहा है कि वेंकैया ही देश के अगले उपराष्ट्रपति होंगे।

वस्तुत: संसद में राजग का संख्या बल देखते हुए चुनाव को महज औपचारिकता माना जा सकता है। पांच अगस्त को होने वाले इस चुनाव में वेंकैया की ही जीत होगी, बशर्ते कि कोई अप्रत्याशित घटना न घटे। आंकड़े स्वत: स्पष्ट कर रहे हैं कि उपराष्ट्रपति चुनाव में लोकसभा के 545 और राज्यसभा के 245 सांसद वोट डालते हैं। अभी लोकसभा और राज्यसभा में दो-दो सीटें खाली हैं यानी स्पीकर को मिला कर कुल निर्वाचन मंडल 786 सांसदों का मौजूद है। यह संख्या बल एनडीएनीत भाजपा के पक्ष में जा रहा है। एनडीए के पास 425 सांसद सदस्यों की संख्या है, जबकि उसे एआईएडीएमके के 50, बीजेडी के 27, टीआरएस के 14, वाईएसआर कांग्रेस के 8, पीएमके और एआईएनआर कांग्रेस के एक-एक सांसद का समर्थन मिला हुआ है। क्योंकि इन्होंने पहले ही भाजपा का साथ देने का भरोसा जताया था। इस तरह यदि कुल एनडीए की वोट संख्या का आंकड़ा देखें तो यह 526 तक पहुंच जाता है, जो जीत के लिए जरूरी वोटों से बहुत आगे है। अत: इन आंकड़े को देख और समझ कर कोई भी पहली नजर में कह देगा कि वेंकैया नायडू की जीत पक्की है और वे देश के अगले उपराष्ट्रपति होने जा रहे हैं।

नायडू का राजनीतिक जीवन देखने पर भी लगता है कि उपराष्ट्रपति की उम्मीदवारी के हिसाब से भाजपा ने बहुत उत्तम नाम पर विचार किया है। मुप्पवरपु वेंकैया नायडू आंध्र प्रदेश से भारतीय राजनीति में आने वाले एक ऐसे राजनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने सन् 1974 से आंध्र विश्वविद्यालय में छात्र संघ के अध्यक्ष के रूप में अपनी राजनीतिक लोकसेवक की यात्रा आरंभ की है। वे सबसे पहले 1972 में जय आंध्र आंदोलन के दौरान पहली बार सुर्खियों में आए थे। छात्र जीवन में उन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण की विचारधारा से प्रभावित होकर आपातकालीन संघर्ष में हिस्सा लिया। वे आपातकाल के बाद सन् 1977 से 1980 तक जनता पार्टी के युवा शाखा के अध्यक्ष रहे। वर्ष 2002 से 2004 तक उन्होंने भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का उतरदायित्व निभाया। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री रहे और वर्तमान में वे भारत सरकार के अंतर्गत शहरी विकास, आवास तथा शहरी गरीबी उन्मूलन तथा संसदीय कार्य मंत्री के पद पर रहते हुए लोकसेवा के कार्य में जुटे हुए हैं।

इस सब के बीच भाजपा का वेंकैया को उपराष्ट्रपति जैसे गैर राजनीतिक पद के लिए चुनाव मैदान में उतारने का उद्देश्य समझ आता है, वह यही है कि वे रणनीतिक रूप से अब तक सभी के बीच सबसे ज्यादा सामंजस्य बनाने में महारत रखते आए हैं । उपराष्ट्रपति राज्यसभा के पदेन सभापति होते हैं। पिछले तीन सालों में उच्च सदन में विपक्ष के असहयोग के कारण परेशानी झेल रही केंद्र की भाजपानीत एडीए सरकार को ऐसे कुशल प्रशासक की जरूरत थी जो सदन चला सके। विशेषकर उस समय जबकि संसद के उच्चसदन में विपक्ष का संख्याबल ज्यादा हो। नायडू वर्तमान में चौथी बार राज्यसभा सदस्य हैं। अत: अनुभव और विपक्ष से साथ उनके सौहार्द्रपूर्ण संबंधों के आधार पर माना जा रहा है कि वह सामंजस्य बिठाने में कामयाब रहेंगे।


- डॉ. मयंक चतुर्वेदी
लेखक, न्यूज एजेंसी हिन्दुस्थान समाचार के राज्य ब्यूरो होने के साथ सेंसर बोर्ड एडवाइजरी कमेटी के सदस्य हैं।

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