Bhopal 21 Jan. 2008, Bhopal, MP, ....video by www.prativad.com
अंग्रेजों ने रचा था भारतीय एकता को नष्ट करने का
दुष्चक्र : अनुराधा शंकर
भोपाल । भारत में राष्ट्रीय एकता को नष्ट करने के
लिये योजना से दुष्चक्र रचा गया है। भारतीय नहीं समझ पाये कि कब वे संकुचित
मानसिकता के परोपकार बन गये। अंग्रेजों ने देश को तोड़ने के लिये पहले यहां की
शिक्षा पद्धति को, गुरूकुल परंपरा को जड़ से उखाड़ा फिर अपनी शिक्षण संस्थाओं की
स्थापना के साथ शेष बची देश की परम्परागत शिक्षा पद्धति रूपी जड़ में मठा डालने का
काम किया है। यह दुख का विषय है कि आज भी हम उस पश्चिमी शिक्षा से वशीभूत हो सही और
गलत का आंकलन ठीक तरह से नहीं कर पा रहे हैं। यह बात साम्प्रदायिकता और मीडिया विषय
पर आयोजित राष्ट्रीय संगोष्ठी तथा वरिष्ठ पत्रकार रमेश शर्मा अभिनन्दन समारोह के
अवसर पर भोपाल रेंज डीआईजी अनुराधा शंकर ने कही। उन्होंने कहा कि भारत में मेकाले
और मेक्समूलर ने योजना से भारतीय मनीषा को नष्ट करने काम किया। इस देश में
भास्कराचार्य जैसे विद्वान कोई वैदिक काल में नहीं बल्कि 18वीं शताब्दी में हुए
हैं। यहां के विद्यालयों में 50 प्रतिशत से अधिक अभिजात्य वर्ग के बच्चे नहीं बल्कि
सामान्य, दलित और आर्थिक रूप से बहुत पिछड़े समाज के लोग एक साथ अध्ययन करते थेऔर
किसी में कोई भेदभाव नहीं था, लेकिन 1857 के बाद योजना से अंग्रेजों ने इन
विद्यालयों को बद कर दिया और मैक्समूलर ने वेदों के भारतीय ग्रन्थों के जो द्विअथÊ
शब्द गढ़े उन्होंने आगे चलकर भारत में साम्प्रदायिकता विद्वेष फैलाने मे महत्वपूर्ण
भूमिका निभाई है। अंग्रेजों ने हमारी लकीर बढ़ाई नहीं बल्कि रगड़ रगड़ कर उसे मिटाया
और अपनी लकीर बढ़ाते रहे। उन्होंने बार बार बताया कि तुम पिछड़े हो, आदि मानव हो और
विकास से कोसो दूर हो। उसका परिणाम यह हुआ कि हमारी आने वाली पीढ़ी इतनी भ्रमित हो
गई की उसे सही और गलत का ज्ञान ही नहीं रहा।
गणेश शंकर विद्याथÊ पत्रकारिता शोध एवं प्रशिक्षण संस्थान के मंच से श्रीमती शंकर
ने कहा कि साम्प्रदायिकत किसी धर्म विषय से जुड़ी चीज नहीं है जैसा की प्रचलन में
है। यह एक मानसिक वि—ति है। भारत में कभी साम्प्रदायिकता नहीं रही है। यह तो
जानबूझकर कुछ लोगों द्वारा अपना हित साधने के लिये शुरू किया गया प्रोगोजेन्डा है।
जिस पर आज भी प्राय: अधिकांश भारतीय कोई विश्वास नहीं करते हैं। सभी देशवासी
मिलजुलकर रहने में ही विश्वास करते हैं। आदमी पहली अपनी मिट्टी का होता है। फिर
मेरा और तेरा, ईश्वर को मानने के कई रूप हो सकते हैं। ईश्वर को मनने में कई रूप में
आराधना की जा सकती है। वह ईश्वर ही क्या जो एक भाषा में प्रार्थना सुनता हो। डीआईजी
अनुराधा शंकर ने पत्रकारों से अपील की कि वे हिन्दुस्तान को एक इकाई के रूप में
लाकर खबरें प्रसारित करें। जो विचार करता है और फिर उसे लिखता है उसकी जिम्मेदारी
एक आम व्यक्ति से कई गुना ज्यादा है इसलिए उसे बहुत सोच समझकर लिखना चाहिए। बिना
पढ़े लिखना भी बहुत बड़ा अपराध है। श्रीमती शंकर ने सुन्दर लाल की पुस्तक भारत में
अग्रेजी राज्य तथा धर्मपालजी का समग्र साहित्य पढ़ने की भी अपील की।
कार्यक्रम में दूसरे वक्ता सय्यैद शरफत अली नदवी ने कहा कि साम्प्रदायिक की कोई
परिभाषा ही नहीं हो सकती है। यह खुद वाहियात चीज है जो लोग सम्प्रदाय और साम्प्रदाय
के चôर में पड़कर मानवता नष्ट कर रहे हैंवे नहीं जानते कि उनके द्वारा कितना बड़ा
गुनाह किया जा रहा है। अच्छी बात है कि अब भारतीय मुसलमानों को लोग पाकिस्तानी
जुमले से नहीं नवाजते। भारतीय पत्रकारिता तीन चीजों से सबसे अधिक प्रभावित है।
पश्चिमी सभ्यता, सभ्यता, उत्तेजना और राजनीतिक इन तीनों के हावी होने से ही मीडिया
का सत्यानाश हुआ है। पत्रकार भले ही अपनी पार्टी, प्रबंधन व दबावों से प्रभावित
हों, लेकिन उन्हें नहीं भूलना चाहिये की वे पत्रकारिता के नाते एक जिम्मेदारान
कार्य को कर रहे हैं। हर पत्रकार को अपने जमीर की आवाज सुनकर कार्य करना चाहिए।
मीडिया जिस तरह सामाजिक बुराईयों को बार-बार पर्दे पर दिखाकर समाज में औरबुराईयां
पैदा कर रहा है अब इसे रोकना और उनके स्थान पर ऐसे समाचारों को तरजीह देना होगी जो
सामाजिक बुराईयों से कोसों दूर हों। श्री नदवी ने इस बात के लिये खुशी व्यक्त कि की
मध्यप्रदेश में साम्प्रदायिकता को दूर करने के लिये लगातार प्रयास किये जा रहे हैं।
कार्यक्रम में दैनिक राष्ट्रीय सहारा, मध्यप्रदेश के ब्यूरो प्रमुख व राष्ट्रीय
एकता परिषद के उपाध्यक्ष रमेश शर्मा का अभिनन्दन समारोह भी संपé हुआ। जिसमें ओपी
हयारण ने श्री शर्मा के सम्मान में प्रशस्ति पत्र का वाचन किया। इस अवसर पर वरिष्ठ
पत्रकार रमेश शर्मा ने कहा कि भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में
साम्प्रदायिकता की समस्या किसी जाति विशेष के होने अथवा हिन्दु मुसलमान के नाते
पैदा नहीं होती बल्कि यह उन लोगों के द्वारा फैलाई गई है जो असल में हिन्दु और
मुसलमान न होकर भेषभूषा से मुसलमान और हिन्दु बने हुये हैं। रमेश शर्मा ने कहा कि
हिन्दुस्तान में यदि साम्प्रदायिक स˜ाव लाना है तो दोनों तरफ से ही पहल करनी होगी।
मुसलमानों को गीता और रामचरित मानस के पाठ की जरूरत है वहीं हिन्दुओं को भी कुरान
की एक-एक आयद पर साधिकार रखने की आवश्यकता है। तब और अच्छा होगा जब कोई मुसलमान
अपनी जेब में रामचरित मानस निकले और हिन्दु कुरान। समाज में उसे दिखे कि व्यक्ति
धर्म का अनुसरण न करते हुए अच्छाईयों का पालन न करते हुये बुराई की ओर अग्रसर है तो
वह शिक्षक की तरह हरी संटी से ठीक करने की मानसिकता से एक संटी लेकर लोगों सुधारने
का काम करे। श्री शर्मा ने कहा कि दुनिया में तीन तरह की नस्ले हैं। भारत ही नहीं
एशिया के अधिकांश लोग एक ही नस्ल के हैं। फिर यह आपस में साम्प्रदायिकता का जहर
कैसार्षोर्षो हर हिन्दू को अपने मुसलमान मित्रों से पूछना चाहिए कि जब कुरान शान्ति
की शिक्षा देता है तब वे कश्मीर में पूवा±चल में, ट्रेनों में और जगह-जहग बम फोड़कर
मजहबी आतंक क्यों मचा रहे हैं। आखिर इससे किसका भला होगा।
कार्यक्रम में डा. डीके सत्यपति ने भी अपने विचार व्यक्त किये। जिसमें उन्होंने
परिवार की एकता से राष्ट्र एकता पर विस्तार से प्रकाश डाला। संगोष्ठी का संचालन
वरिष्ठ पत्रकार दिनेशचन्द्र वर्मा ने किया।
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