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जर्मनी युद्ध में AI का सहारा लेने की तैयारी में, यूक्रेन के अनुभव से बनेगा नया सिस्टम

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📍 भोपाल
जर्मनी युद्ध में AI का सहारा लेने की तैयारी में, यूक्रेन के अनुभव से बनेगा नया सिस्टम
26 मार्च 2026। जर्मनी अब युद्ध के मैदान में तेज और सटीक फैसले लेने के लिए आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का सहारा लेने जा रहा है। जर्मन सेना के वरिष्ठ अधिकारी लेफ्टिनेंट जनरल क्रिश्चियन फ्रूडिंग के मुताबिक, बर्लिन एक ऐसा AI-आधारित टूल विकसित कर रहा है जो युद्ध से जुड़े डेटा का विश्लेषण कर सैन्य रणनीति तय करने में मदद करेगा। खास बात यह है कि इस सिस्टम को तैयार करने में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जुटाए गए अनुभव और डेटा का इस्तेमाल किया जाएगा।

फ्रूडिंग ने बताया कि यूक्रेन ने पिछले चार साल में युद्ध के दौरान बड़े पैमाने पर डेटा इकट्ठा किया है। इस डेटा के आधार पर AI यह अनुमान लगा सकेगा कि समान परिस्थितियों में दुश्मन का व्यवहार कैसा रहा है और उसके अनुसार जवाबी रणनीति सुझा सकेगा। हालांकि उन्होंने साफ किया कि अंतिम निर्णय इंसानों के हाथ में ही रहेगा।

यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब जर्मनी अपनी सैन्य ताकत को तेजी से बढ़ाने की दिशा में काम कर रहा है। चांसलर फ्रेडरिक मर्ज़ का लक्ष्य जर्मनी को “यूरोप की सबसे मजबूत पारंपरिक सेना” बनाना है। इसी के तहत 2029 तक सेना को पूरी तरह “युद्ध के लिए तैयार” करने का लक्ष्य रखा गया है। जर्मनी इस तैयारी के पीछे रूस से संभावित खतरे का हवाला दे रहा है, जबकि मॉस्को इन आरोपों को खारिज करते हुए इन्हें सैन्य खर्च बढ़ाने का बहाना बता चुका है।

फ्रूडिंग, जो पहले यूक्रेन को जर्मन हथियारों की आपूर्ति की निगरानी कर चुके हैं, बर्लिन और कीव के बीच मजबूत सैन्य सहयोग के समर्थक माने जाते हैं। अब वे उसी अनुभव को AI सिस्टम में शामिल करना चाहते हैं ताकि भविष्य के संघर्षों में जर्मन सेना को बढ़त मिल सके।

जर्मनी अपनी रक्षा रणनीति के तहत नई तकनीकों में बड़े पैमाने पर निवेश भी कर रहा है। इसमें जासूसी करने वाले कीट जैसे रोबोट और अंतरिक्ष आधारित लेजर सिस्टम जैसी परियोजनाएं शामिल हैं। हालांकि, कुछ फैसलों पर सवाल भी उठे हैं, जैसे कि खराब परीक्षण परिणामों के बावजूद कामिकाज़े ड्रोन के लिए बड़े अनुबंधों को मंजूरी देना।

इस बीच, रूस ने जर्मनी की सैन्य तैयारियों पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। रूसी विदेश मंत्री सर्गेई लावरोव ने आरोप लगाया कि जर्मनी और यूरोप “खतरनाक दिशा” में बढ़ रहे हैं और इतिहास की गलतियों को दोहराने का जोखिम उठा रहे हैं।
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