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स्ट्रोक के बाद की जंग: इलाज है, पर बीमा नहीं

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📍 भोपाल
स्ट्रोक के बाद की जंग: इलाज है, पर बीमा नहीं
स्ट्रोक से उबरना महंगा सौदा, बीमा कवरेज की दरकार
स्ट्रोक के बाद की असली लड़ाई: इलाज है, लेकिन बीमा नहीं


मुंबई 11 अप्रैल 2026। भारत में स्ट्रोक अब सिर्फ एक अचानक आने वाली मेडिकल इमरजेंसी नहीं रह गया है, बल्कि यह एक लंबी और चुनौतीपूर्ण बीमारी के रूप में सामने आ रहा है। समय पर इलाज से जहां मरीजों की जान बच रही है, वहीं असली संघर्ष अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद शुरू होता है—जब लंबा और महंगा न्यूरो-रिहैबिलिटेशन जरूरी हो जाता है। विडंबना यह है कि यह अहम इलाज अब भी ज्यादातर बीमा पॉलिसियों से बाहर है, जिससे लाखों परिवार आर्थिक और मानसिक दबाव में आ जाते हैं।

मुंबई समेत पूरे देश में स्ट्रोक के बढ़ते मामलों ने स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब फोकस केवल मरीज को बचाने तक सीमित नहीं रह सकता, बल्कि उसे पूरी तरह से सामान्य जीवन में लौटाना भी उतना ही जरूरी है। इंडियन फेडरेशन ऑफ न्यूरोरेहैबिलिटेशन के अध्यक्ष डॉ. निर्मल सुर्या कहते हैं, “भारत में हर साल 12.5 लाख से अधिक नए स्ट्रोक केस सामने आते हैं। हालांकि मृत्यु दर में कमी आई है, लेकिन रिहैबिलिटेशन की कमी मरीजों की जिंदगी को अधूरा छोड़ देती है।”
वहीं, मुंबई के कोकिलाबेन अस्पताल के न्यूरो-रिहैबिलिटेशन विशेषज्ञ डॉ. अभिषेक श्रीवास्तव के अनुसार, “स्ट्रोक के बाद की रिकवरी एक लंबी प्रक्रिया है, जिसमें लगातार थेरेपी, देखभाल और विशेषज्ञों की निगरानी जरूरी होती है। लेकिन जब यह इलाज बीमा में शामिल नहीं होता, तो परिवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है।”

नई तकनीकों जैसे टेली-न्यूरोरेहैबिलिटेशन, रोबोटिक्स और एआई आधारित इलाज उम्मीद जरूर जगा रहे हैं, लेकिन इनकी पहुंच अभी सीमित है। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर पोस्ट-स्ट्रोक केयर को बीमा में शामिल किया जाए और सुविधाएं सुलभ बनाई जाएं, तो लाखों मरीज न सिर्फ जीवित रहेंगे, बल्कि एक सम्मानजनक और आत्मनिर्भर जीवन भी जी सकेंगे।

(अनिल बेदाग)
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