4 अगस्त 2026। भारत के पारंपरिक और क्षेत्रीय उत्पाद अब भौगोलिक संकेतक (Geographical Indication-GI) टैग की बदौलत वैश्विक बाजार में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। जीआई टैग न केवल इन उत्पादों की विशिष्टता को कानूनी संरक्षण देता है, बल्कि स्थानीय कारीगरों, किसानों और उत्पादकों की आय बढ़ाने के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान कर रहा है।
जीआई टैग ऐसे उत्पादों को दिया जाता है जिनकी गुणवत्ता, प्रतिष्ठा या विशेष पहचान किसी खास भौगोलिक क्षेत्र से जुड़ी होती है। इससे नकली उत्पादों पर रोक लगाने में मदद मिलती है और उपभोक्ताओं को असली उत्पाद की पहचान सुनिश्चित होती है। साथ ही, स्थानीय समुदायों को उनके पारंपरिक ज्ञान और कौशल का आर्थिक लाभ भी मिलता है।
भारत में दार्जिलिंग चाय, कांचीपुरम सिल्क, बनारसी साड़ी, नागपुर संतरा, बासमती चावल, कश्मीर केसर, पोचमपल्ली इकट, मैसूर सिल्क और कई अन्य उत्पाद जीआई टैग प्राप्त कर चुके हैं। इन उत्पादों की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ने से निर्यात को भी नई गति मिली है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जीआई टैग केवल बौद्धिक संपदा अधिकार का माध्यम नहीं है, बल्कि यह स्थानीय संस्कृति, पारंपरिक विरासत और हस्तशिल्प को संरक्षित रखने का प्रभावी साधन भी बन गया है। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं और छोटे उत्पादकों को वैश्विक बाजार तक पहुंच बनाने में सहायता मिल रही है।
सरकार भी जीआई उत्पादों के प्रचार-प्रसार, ब्रांडिंग और निर्यात को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न योजनाओं के माध्यम से सहयोग कर रही है। इसका उद्देश्य भारत के पारंपरिक उत्पादों को वैश्विक ब्रांड के रूप में स्थापित करना और "वोकल फॉर लोकल" तथा "लोकल टू ग्लोबल" अभियान को नई गति देना है।















