नई तकनीक से 16 ऐसे बैक्टीरियोफेज बनाए गए जो लैब में E. coli को संक्रमित कर उसे नष्ट करने में सक्षम रहे
8 अगस्त 2026। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल टेक्स्ट, तस्वीरें या कोड बनाने तक सीमित नहीं रह गया है। वैज्ञानिकों ने AI की मदद से पहली बार ऐसे पूरे वायरल जीनोम डिजाइन किए हैं, जो प्रयोगशाला में वास्तविक और काम करने वाले वायरस में बदल सके। यह उपलब्धि चिकित्सा और सिंथेटिक बायोलॉजी के लिए महत्वपूर्ण मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ जैव-सुरक्षा को लेकर नई चिंताएं भी सामने आई हैं।
स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी और Arc Institute के शोधकर्ताओं ने Evo 1 और Evo 2 नाम के जीनोम लैंग्वेज मॉडल का इस्तेमाल कर हजारों संभावित वायरल जीनोम डिजाइन किए। इन डिजाइनों में से करीब 300 को प्रयोगशाला में संश्लेषित कर परीक्षण किया गया। इनमें 16 जीनोम काम करने वाले बैक्टीरियोफेज में बदल गए।
बैक्टीरियोफेज ऐसे वायरस होते हैं जो इंसानों को संक्रमित करने के बजाय बैक्टीरिया को निशाना बनाते हैं। इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ΦX174 नाम के एक प्रसिद्ध फेज को आधार बनाया, जो E. coli को संक्रमित करता है। AI से तैयार किए गए कुछ नए फेज प्राकृतिक वायरस की तुलना में बैक्टीरिया को खत्म करने में अधिक प्रभावी पाए गए। कुछ प्रयोगों में इनका इस्तेमाल ऐसे E. coli के खिलाफ भी किया गया जिनमें प्राकृतिक फेज के प्रति प्रतिरोध विकसित हो गया था।
एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस के खिलाफ नई उम्मीद
इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संभावित फायदा फेज थेरेपी में देखा जा रहा है। दुनिया भर में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी बैक्टीरिया एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन रहे हैं। ऐसे में AI की मदद से मरीज या संक्रमण के अनुरूप नए बैक्टीरियोफेज डिजाइन करने की क्षमता भविष्य में उपचार के नए विकल्प खोल सकती है।
शोधकर्ताओं के प्रयोगों में तैयार किए गए कुछ फेज प्राकृतिक ΦX174 से बेहतर प्रदर्शन करते पाए गए। इससे संकेत मिलता है कि AI की मदद से ऐसे वायरस डिजाइन किए जा सकते हैं जो विशिष्ट बैक्टीरिया को अधिक प्रभावी ढंग से निशाना बना सकें।
असली चिंता AI की क्षमता को लेकर
वैज्ञानिकों के लिए इस प्रयोग का महत्व केवल 16 नए फेज बनाने में नहीं है। बड़ी उपलब्धि यह है कि AI मॉडल ने पूरे वायरल जीनोम का डिजाइन तैयार किया और उन डिजाइनों में से कुछ वास्तविक जैविक प्रणाली में काम भी करने लगे।
यही क्षमता जैव-सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चिंता का कारण बन रही है। वर्तमान प्रयोग में बनाए गए वायरस बैक्टीरिया को संक्रमित करते हैं और इंसानों के लिए ज्ञात खतरा नहीं हैं। शोधकर्ताओं ने भी मानव, पशु और पौधों को संक्रमित करने वाले वायरसों को मॉडल के प्रशिक्षण से बाहर रखने जैसी सुरक्षा सावधानियां अपनाईं।
फिर भी विशेषज्ञों का कहना है कि AI की जैविक डिजाइन क्षमता तेजी से बढ़ रही है। भविष्य में यदि ऐसी तकनीकों का इस्तेमाल अधिक जटिल या खतरनाक जैविक प्रणालियों के लिए किया गया तो दुरुपयोग का जोखिम बढ़ सकता है।
अभी इंसानी वायरस बनाने की स्थिति नहीं
हालांकि इस उपलब्धि को सीधे तौर पर इंसानों के लिए खतरनाक वायरस बनाने की क्षमता के बराबर मानना सही नहीं होगा। शोध में बनाए गए वायरस बैक्टीरियोफेज हैं और उनका लक्ष्य E. coli था। विशेषज्ञों के अनुसार मानव रोगजनकों को डिजाइन करना कहीं अधिक जटिल चुनौती है।
लेकिन यह शोध एक महत्वपूर्ण सीमा जरूर पार करता है। अब यह प्रदर्शित हो चुका है कि जीनोम लैंग्वेज मॉडल केवल DNA के छोटे हिस्सों या व्यक्तिगत प्रोटीनों की भविष्यवाणी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि पूरे वायरल जीनोम के डिजाइन में भी उपयोग किए जा सकते हैं।
विज्ञान के लिए उपलब्धि, सुरक्षा के लिए चेतावनी
AI और सिंथेटिक बायोलॉजी का यह मेल भविष्य में एंटीबायोटिक-प्रतिरोधी संक्रमणों के इलाज, व्यक्तिगत फेज थेरेपी और नई जैविक तकनीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन इसके साथ यह सवाल भी तेजी से महत्वपूर्ण हो रहा है कि ऐसी शक्तिशाली तकनीकों के विकास और इस्तेमाल के लिए किस तरह की सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी जरूरी होगी।
इस शोध ने फिलहाल कोई नया मानव रोगजनक नहीं बनाया है। लेकिन इसने एक बात स्पष्ट कर दी है: AI अब जैविक प्रणालियों के डिजाइन में केवल सहायक उपकरण नहीं रहा, बल्कि नए कार्यशील जैविक जीनोम तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। यही इस उपलब्धि का सबसे बड़ा वैज्ञानिक महत्व और सबसे गंभीर जैव-सुरक्षा सवाल है।
















