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नई स्मार्ट तकनीक से आसान हो सकता है अल्जाइमर का पता लगाना

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Digital Desk
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📍 भोपाल
नई स्मार्ट तकनीक से आसान हो सकता है अल्जाइमर का पता लगाना

स्मार्टफोन आधारित प्लेटफॉर्म से अल्जाइमर के प्रमुख बायोमार्कर एमिलॉयड-β की पहचान संभव, कम लागत और आसान जांच की उम्मीद

25 अगस्त 2026। नई स्मार्ट तकनीक अल्जाइमर रोग की शुरुआती पहचान को आसान और अधिक सुलभ बना सकती है। जवाहरलाल नेहरू सेंटर फॉर एडवांस्ड साइंटिफिक रिसर्च (JNCASR) के वैज्ञानिकों ने एक ऐसा स्मार्टफोन-आधारित डायग्नोस्टिक प्लेटफॉर्म विकसित किया है, जो अल्जाइमर रोग के प्रमुख बायोमार्कर एमिलॉयड-β (Aβ) की पहचान कर सकता है।

इस तकनीक में TZ-48 नामक एक फ्लोरेसेंस-रिस्पॉन्सिव छोटा अणु इस्तेमाल किया गया है। Aβ के संपर्क में आने पर इसकी फ्लोरेसेंस तीव्रता में बदलाव होता है। इस बदलाव को विशेष स्मार्टफोन एप्लिकेशन की मदद से रिकॉर्ड और मात्राबद्ध किया जा सकता है। इससे जांच को तेज, पोर्टेबल और अपेक्षाकृत कम लागत वाला बनाने की संभावना है।

Aβ क्यों है महत्वपूर्ण?
अल्जाइमर एक प्रगतिशील न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारी है, जिसमें याददाश्त और सोचने-समझने की क्षमता धीरे-धीरे प्रभावित होती है। इसके विकास में एमिलॉयड-β प्रोटीन का गलत तरीके से मुड़ना और मस्तिष्क में जमा होकर प्लाक बनाना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

Aβ की मौजूदगी अल्जाइमर की शुरुआती और अपेक्षाकृत विशिष्ट पहचान में महत्वपूर्ण मानी जाती है। वर्तमान में PET और MRI जैसी तकनीकें उपयोगी हैं, लेकिन उनकी अधिक लागत, विशेष उपकरणों और प्रशिक्षित विशेषज्ञों की जरूरत के कारण इन्हें हर जगह इस्तेमाल करना आसान नहीं है। रक्त आधारित Aβ और टाऊ जांचें भी उपलब्ध हो रही हैं, लेकिन वे अभी महंगी और तकनीकी रूप से जटिल हैं।

TZ-48 से मिली नई उम्मीद
वैज्ञानिकों ने TZ-48 को इस तरह विकसित किया है कि यह Aβ फाइब्रिल्स की चयनात्मक और संवेदनशील पहचान कर सके। शोध में इस प्रोब ने मस्तिष्क की बाधा को पार करने, अल्जाइमर मॉडल वाले चूहों के मस्तिष्क में Aβ प्लाक को प्रभावी ढंग से चिन्हित करने और बीमारी के अलग-अलग चरणों में Aβ की मात्रा का आकलन करने की क्षमता दिखाई।

इस तकनीक को कॉन्फोकल लेजर स्कैनिंग माइक्रोस्कोपी (CLSM) और फ्लोरेसेंस लाइफटाइम इमेजिंग माइक्रोस्कोपी (FLIM) के साथ भी इस्तेमाल किया गया। FLIM की खासियत यह है कि फ्लोरेसेंस लाइफटाइम माप अपेक्षाकृत कम मात्रा और फोटोब्लिचिंग जैसी समस्याओं से प्रभावित होता है, जिससे बायोमार्कर की पहचान अधिक विश्वसनीय हो सकती है।

शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि TZ-48 की मदद से सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड (CSF) और रक्त सीरम में Aβ का पता लगाया जा सकता है और अल्जाइमर वाले तथा स्वस्थ चूहों के बीच अंतर किया जा सकता है।

स्मार्टफोन से होगी जांच
इस शोध को आगे बढ़ाते हुए वैज्ञानिकों की टीम ने ADxFluor नामक स्मार्टफोन-इंटीग्रेटेड प्लेटफॉर्म विकसित किया है। यह TZ-48 की फ्लोरेसेंस प्रतिक्रिया को रिकॉर्ड करके सीरम में Aβ के स्तर का तेजी से मात्रात्मक आकलन करता है।

इस प्रणाली की खासियत यह है कि इसमें स्मार्टफोन तकनीक, बायोफ्लुइड जांच और फ्लोरेसेंस-आधारित बायोमार्कर विश्लेषण को एक साथ जोड़ा गया है। इससे भविष्य में ऐसी जांच विकसित करने की संभावना बढ़ती है जिसे अस्पतालों के अलावा सीमित संसाधनों वाले क्षेत्रों में भी इस्तेमाल किया जा सके।

अभी क्लिनिकल इस्तेमाल से पहले कई चरण बाकी
यह तकनीक अल्जाइमर की जांच को सरल बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है, लेकिन इसे सीधे मानव मरीजों के लिए तैयार डायग्नोस्टिक टेस्ट मानना अभी जल्दबाजी होगी। वर्तमान शोध के प्रमुख निष्कर्ष प्रायोगिक मॉडल और जैविक नमूनों पर आधारित हैं। मानवों में इसकी सटीकता, विश्वसनीयता और सुरक्षा की पुष्टि के लिए आगे व्यापक क्लिनिकल परीक्षण जरूरी होंगे।

फिर भी, TZ-48 और ADxFluor का संयोजन भविष्य में कम लागत, पोर्टेबल और पॉइंट-ऑफ-केयर अल्जाइमर स्क्रीनिंग की दिशा में उपयोगी तकनीक साबित हो सकता है। शोध के निष्कर्ष ACS Chemical Neuroscience में प्रकाशित हुए हैं।

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