28 अगस्त 2026। पितृसत्तात्मक माहौल और सामाजिक अपेक्षाओं के बीच अपनी पहचान तलाशती एक महिला पुलिस अधिकारी की कहानी कहती है 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग'। निमिषा सजायन इस फिल्म में बबीता उर्फ 'बेबी' सिंह की भूमिका में हैं, जो आत्मविश्वास की कमी से जूझती एक पुलिस अधिकारी हैं। छुट्टी लेकर घर जाने के दौरान वह अनजाने में एक मर्डर केस की जांच में फंस जाती हैं। हालांकि कहानी सतह पर एक क्राइम मिस्ट्री है, लेकिन इसकी असली परत एक ऐसी महिला के सफर को दिखाती है, जो धीरे-धीरे दूसरों को खुश करने की आदत से बाहर निकलकर अपनी अहमियत समझना सीखती है।
क्या आपने कभी किसी पुलिस शो को देखते हुए सोचा है कि इस किरदार को आखिर थोड़ी राहत कब मिलेगी? 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' की बबीता 'बेबी' सिंह कुछ ऐसी ही पुलिस अधिकारी हैं। काम से छुट्टी लेने के बावजूद मुश्किलें उनका पीछा नहीं छोड़तीं।
बेबी कोई टिपिकल स्क्रीन पुलिस ऑफिसर नहीं हैं। न उनका अंदाज दबंग है और न ही वह बड़े-बड़े डायलॉग बोलती नजर आती हैं। अपनी ही कहानी में वह एक ऐसी शख्सियत हैं, जिसे अक्सर कम आंका जाता है। वह कम आत्मविश्वास वाली हैं, हर किसी को खुश रखने की कोशिश करती हैं और उनकी निजी जिंदगी और पेशेवर जिम्मेदारियों के बीच संतुलन भी बुरी तरह बिगड़ा हुआ है।
परिवार के साथ कुछ समय बिताने की उम्मीद लेकर घर पहुंचीं बेबी की जिंदगी तब बदल जाती है, जब उन्हें अपने बचपन के करीबी दोस्त बंसी, जिसका किरदार बरुण सोबती ने निभाया है, के मर्डर की जांच से जुड़ना पड़ता है।
लेकिन फिल्म की दिलचस्पी केवल पुलिस और अपराधी के बीच की पारंपरिक दौड़ में नहीं है। मर्डर केस कहानी का अहम हिस्सा जरूर है, मगर असली सवाल यह है कि बेबी के साथ क्या होता है, जब वह पहली बार उस इंसान की तरह जीना बंद करने लगती हैं, जैसा दूसरे लोग उन्हें देखना चाहते हैं।
निमिषा सजायन का शानदार अभिनय
फिल्म की सबसे बड़ी ताकत निमिषा सजायन का अभिनय है। बेबी का किरदार आसानी से उस पुराने ढर्रे पर जा सकता था, जहां एक कमजोर समझी जाने वाली महिला अचानक बीच फिल्म में पूरी तरह बदल जाती है और फिर आत्मविश्वास से भरी हीरो की तरह उभरती है। राहत की बात यह है कि फिल्म ऐसा आसान रास्ता नहीं चुनती।
बेबी का बदलाव धीरे-धीरे होता है। वह असहज होती हैं, हिचकिचाती हैं, खुद पर शक करती हैं और कई बार अपने फैसलों को लेकर उलझी रहती हैं। जब वह आखिरकार अपनी बात कहना और अपने लिए खड़ा होना सीखती हैं, तो वह बदलाव बनावटी नहीं लगता। फिल्म पहले ही यह दिखा चुकी होती है कि लोगों को खुश करने की आदत उनके व्यक्तित्व में कितनी गहराई तक बसी हुई है।
जांच के साथ आगे बढ़ता है बेबी का निजी सफर
फिल्म की एक और खासियत यह है कि मर्डर की जांच और बेबी का निजी सफर साथ-साथ आगे बढ़ते हैं। जैसे-जैसे वह अपराध की परतों को समझने लगती हैं, वैसे-वैसे वह खुद को भी बेहतर ढंग से पहचानने लगती हैं।
एक महिला के आत्मसम्मान और आत्म-पहचान की कहानी कहने के लिए क्राइम मिस्ट्री का इस्तेमाल यहां प्रभावी ढंग से किया गया है। फिल्म हर बात को दर्शकों के सामने स्पष्ट शब्दों में नहीं रखती। वह छोटी-छोटी बातों और संकेतों को समझने की जिम्मेदारी दर्शक पर छोड़ती है, और यही इसकी खूबसूरती भी है।
'पाताल लोक' या 'कोहरा' बनने की कोशिश नहीं
सुदीप शर्मा के एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर होने के कारण स्वाभाविक रूप से इस फिल्म की तुलना 'पाताल लोक' और 'कोहरा' जैसी क्राइम कहानियों से की जा सकती है। हालांकि अच्छी बात यह है कि 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' उन जैसी बनने की कोशिश नहीं करती।
जांच की रफ्तार धीमी है, माहौल वास्तविकता के करीब रखने की कोशिश की गई है और रहस्य भी बिना जल्दबाजी के खुलता है। यहां हर कुछ मिनट में नए संदिग्धों की सूची या चौंकाने वाले ट्विस्ट नहीं मिलते। फिल्म बड़े खुलासों से ज्यादा अपने किरदारों और उनके भीतर चल रहे संघर्षों पर ध्यान देती है, और ज्यादातर मौकों पर यह तरीका असरदार साबित होता है।
धीमी रफ्तार, लेकिन कहानी बनाए रखती है पकड़
फिल्म की गति कुछ दर्शकों को धीमी लग सकती है, लेकिन कहानी पूरी तरह से पकड़ नहीं छोड़ती। जांच से जुड़े सवाल उत्सुकता बनाए रखते हैं, जबकि बेबी का निजी संघर्ष कहानी को भावनात्मक गहराई देता है।
असल में, 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' उस महिला की कहानी है, जिसने दूसरों की उम्मीदों के मुताबिक खुद को ढालते-ढालते शायद यह महसूस करना ही छोड़ दिया था कि अपनी जिंदगी की बागडोर अपने हाथ में लेने का अनुभव कैसा होता है।
अपराध की घटना उसे कहानी के केंद्र में ले आती है, लेकिन उस जगह अपनी पहचान बनाकर टिके रहना उसे खुद सीखना पड़ता है।
फिल्म में एक अच्छी मर्डर मिस्ट्री के जरूरी तत्व मौजूद हैं, लेकिन इसकी सबसे बड़ी सफलता यह है कि यह दर्शक को उस महिला की चिंता करने पर मजबूर करती है, जो इस केस की जांच कर रही है।
शुरुआत में आप शायद यह जानने के लिए फिल्म देखें कि आखिर हत्या किसने की और क्यों की। लेकिन कहानी आगे बढ़ते-बढ़ते आप यह चाहने लगते हैं कि बेबी अपनी जगह लेने, अपनी बात कहने और अपनी पहचान के लिए हर बार माफी मांगना बंद कर दे। शायद यही 'बबीता सिंह रिपोर्टिंग' की सबसे बड़ी जीत है।