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महुआ बीनने वाले हाथों में अब आत्मनिर्भरता की चाबी: हसदेव की आदिवासी महिलाओं ने उद्यमिता से बदली अपनी तकदीर

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Digital Desk
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📍 बिलासपुर
महुआ बीनने वाले हाथों में अब आत्मनिर्भरता की चाबी: हसदेव की आदिवासी महिलाओं ने उद्यमिता से बदली अपनी तकदीर

कल तक सिर्फ जंगल पर निर्भर रहने वाली सरगुजा की बहनों ने सहकारी समिति से खड़ा किया ₹3 करोड़ का व्यवसाय; प्रबंधन संस्थानों को दिया इस सफल मॉडल पर 'केस स्टडी' बनाने का न्योता।

2 सितंबर 2026। छत्तीसगढ़ के सुदूर और दुर्गम हसदेव अंचल से महिला सशक्तिकरण की एक ऐसी सुखद तस्वीर सामने आई है, जो देश के बड़े-बड़े प्रबंधन गुरुओं और समाजशास्त्रियों को अचंभित कर सकती है। यह कहानी सरगुजा जिले के सुदूर आदिवासी क्षेत्र में काम कर रही 'महिला उद्यमी बहुउद्देशीय सहकारी समिति (मर्यादित)' यानी MUBSS की है। कल तक जो हाथ सिर्फ महुआ और सूखी लकड़ियां बीनने तक सीमित थे, आज वे हाथ ₹3 करोड़ के सालाना टर्नओवर वाले व्यावसायिक साम्राज्य का कुशलता से संचालन कर रहे हैं।
इस सहकारी समिति की आदिवासी बहनों ने अब देश भर के प्रतिष्ठित प्रबंधन संस्थानों (Management Institutions) को खुला न्योता दिया है कि वे सरगुजा आएं और महिला उद्यमिता के इस अनूठे मॉडल पर एक गहरी 'केस स्टडी' तैयार करें।
खेत से थाली तक: आत्मनिर्भरता का 'सर्कुलर मॉडल'
MUBSS की बहनों ने केवल व्यवसाय ही नहीं खड़ा किया, बल्कि एक बेहद अनूठा और आत्मनिर्भर चक्र (Circular Economy) भी तैयार किया है। इस मॉडल की सबसे खूबसूरत कड़ियों में शामिल हैं:
•    जैविक फल और सब्जी उत्पादन: समिति से जुड़े महिला स्वयं सहायता समूहों (SHGs) द्वारा क्षेत्र में ही बड़े पैमाने पर ताजी और जैविक सब्जियों व फलों की खेती की जा रही है।
•    मध्यान्ह भोजन में सीधा उपयोग: इन खेतों में महिलाओं द्वारा खुद उगाई गई शुद्ध और पोषक सब्जियों का सीधा उपयोग स्थानीय सीबीएसई (CBSE) अंग्रेजी माध्यम स्कूल के 1000 से अधिक बच्चों के मध्यान्ह भोजन (Mid-Day-Meal) को तैयार करने में किया जा रहा है। इससे बच्चों को पूरी तरह केमिकल-मुक्त और ताजा भोजन मिल पा रहा है।
•    बच्चों के लिए पोषण युक्त A2 दूध: इसके साथ ही, महिलाओं का एक समूह एक छोटी डेयरी का भी संचालन कर रहा है। इस डेयरी से विशेष रूप से उत्पादित शुद्ध A2 दूध को स्कूल में पढ़ने वाले आदिवासी बच्चों को उनके सुबह के नाश्ते (Breakfast) में दिया जाता है, जिससे क्षेत्र के बच्चों को कुपोषण से मुक्ति मिल रही है।
कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (CSR) से आत्मनिर्भरता का सफर
MUBSS की शुरुआत साल 2017 में हुई थी। राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम लिमिटेड (RRVUNL) ने अपने निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत इस दुर्गम क्षेत्र की महिलाओं को संगठित कर इस बहुउद्देशीय सहकारी समिति की नींव रखी थी। बीते 9 वर्षों में इस समिति ने जो प्रगति की है, उसने ग्रामीण आजीविका के मायने बदल दिए हैं। आज यह समिति पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो चुकी है और इसके जरिए क्षेत्र की सैकड़ों आदिवासी बहनें अपने परिवारों को आर्थिक रूप से सुदृढ़ बना रही हैं।
विविध उत्पाद श्रृंखला और कारोबार
स्कूल कैंटीन, डेयरी और सब्जी उत्पादन के अलावा यह समिति व्यावसायिक स्तर पर कई अन्य इकाइयां भी चला रही है:
•    समिति के द्वारा मसाला उद्योग, सेनेटरी पैड निर्माण, फिनाइल, हैंडवॉश साबुन, मशरूम उत्पादन, जैविक केंचुआ खाद और चावल की सफाई के लिए मिनी राइस मिल का सफलतापूर्वक संचालन किया जा रहा है।
इस बहुआयामी मॉडल की सराहना कई सरकारी और गैर-सरकारी संगठन भी कर चुके हैं।

"केवल महुआ के भरोसे कब तक कटेगी जिंदगी?"
"हम सरगुजा की बहनों ने राजस्थान सरकार के विद्युत निगम के सहयोग से जो सफल उद्यम स्थापित किए हैं, उसे दुनिया को देखना चाहिए। हम देश के बड़े प्रबंधन संस्थानों और विशेषज्ञों को आमंत्रित करते हैं कि वे यहाँ आएं, हमारे काम को समझें और इस पर केस स्टडी बनाएं। ताकि लोग सोशल मीडिया पर फैलाए जा रहे भ्रामक और नकारात्मक दुष्प्रचार के बजाय ज़मीनी सच को देख सकें।
हसदेव के इस दुर्गम क्षेत्र में खदान और संबंधित गतिविधियों के अलावा रोज़ी-रोटी का कोई बड़ा साधन नहीं है। अब हम केवल महुआ बीनकर और वनोपज पर आश्रित रहकर अपनी आने वाली पीढ़ियों का भविष्य नहीं सुधार सकते। हमें भी पक्के मकानों में रहने, बेहतर भोजन करने और आधुनिक जीवन जीने का पूरा अधिकार है।"
— महिला उद्यमी बहुउद्देशीय सहकारी समिति (MUBSS) की सदस्य बहनें
संवर रहा है पीढ़ियों का भविष्य: मुफ़्त आधुनिक शिक्षा
यह बदलाव सिर्फ महिलाओं के रोज़गार तक सीमित नहीं है, बल्कि उनकी आने वाली पीढ़ियों की बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य को भी मजबूत कर रहा है। राजस्थान विद्युत निगम द्वारा संचालित सीबीएसई अंग्रेजी माध्यम स्कूल में यहाँ के आदिवासी बच्चों को पूरी तरह से मुफ्त शिक्षा दी जा रही है। इसके साथ ही:
•    मुफ्त किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और स्कूल बस (परिवहन) की सुविधा।
•    कमजोर बच्चों के लिए अतिरिक्त कक्षाएं ।
•    प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए विशेषज्ञों द्वारा कोचिंग और ऑनलाइन शिक्षा के लिए निःशुल्क 'टैब' (Tablets) का वितरण।
•    स्थानीय परिवारों के लिए मुफ्त चिकित्सालय (Dispensary) और आधुनिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए 'किसान क्लब' का संचालन।
वनीकरण और नीतिगत समर्थन
ऐतिहासिक रूप से देखें तो तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के कार्यकाल में भारत सरकार ने राजस्थान सरकार को सरगुजा की पीईकेबी (PEKB) खदान आवंटित की थी, जिसे बाद के वर्षों में सरकारों के बदलने के बाद भी लगातार समर्थन मिलता रहा। इसका मुख्य कारण यह है कि इस परियोजना से राजस्थान के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के साथ-साथ सरगुजा के हजारों स्थानीय परिवारों के हित सीधे जुड़े हुए हैं। इसके साथ ही, राजस्थान के विद्युत निगम ने इस क्षेत्र में आक्रामक वनीकरण (Afforestation) अभियान चलाकर लाखों नए पेड़ लगाए हैं, जिससे हसदेव के पर्यावरण में हरियाली और अधिक समृद्ध हुई है।

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