उपग्रह आधारित राज्यव्यापी अध्ययन में सामने आया कि उत्सर्जन पूरे मध्य प्रदेश में एक समान नहीं, बल्कि अलग-अलग प्रमुख स्रोतों वाले चार क्षेत्रों में बंटा है; सुझाए गए उपायों से 2047 तक सामान्य स्थिति की तुलना में SO₂ में 80%, NOx में 78% और ब्लैक कार्बन में 56% तक कमी संभव
7 सितंबर 2026। मध्य प्रदेश ने आज गैर-CO₂ प्रदूषकों पर अपनी तरह का पहला राज्यव्यापी आकलन जारी किया। इसमें यह पता लगाया गया है कि राज्य के अलग-अलग हिस्सों में उत्सर्जन के प्रमुख स्रोत क्या हैं और विभिन्न क्षेत्रों में उन्हें कम करने के लिए किस तरह के उपाय किए जा सकते हैं।
‘मध्य प्रदेश में गैर-CO₂ उत्सर्जन में कमी के मार्ग: एक बहु-क्षेत्रीय आकलन’ नामक रिपोर्ट में पाया गया है कि मध्य प्रदेश में उत्सर्जन का स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं है। उपग्रह आधारित विश्लेषण में राज्य के चार अलग-अलग प्रदूषण क्षेत्रों की पहचान की गई है। इंदौर, भोपाल, ग्वालियर और जबलपुर में उद्योग और परिवहन प्रमुख स्रोतों के रूप में सामने आए हैं; सिंगरौली में कोयला खनन से होने वाला मीथेन उत्सर्जन अधिक है; जबकि सागर, मुरैना, रीवा, खरगोन और छिंदवाड़ा सहित कई जिलों में पशुधन से होने वाला मीथेन उत्सर्जन विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
रिपोर्ट मध्य प्रदेश सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग के राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने अंतरराष्ट्रीय स्वच्छ वायु दिवस के अवसर पर जारी की। इस वर्ष इस दिवस का विषय है, ‘जलवायु कार्रवाई के लिए स्वच्छ वायु’। रिपोर्ट पर्यावरण नियोजन एवं समन्वय संगठन (ईपीसीओ), पर्यावरण विभाग, मध्य प्रदेश सरकार ने इंस्टीट्यूट फॉर गवर्नेंस एंड सस्टेनेबल डेवलपमेंट (आईजीएसडी), गेटवे रिसर्च और द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (टेरी) के साथ मिलकर तैयार की है।
अध्ययन में वर्ष 2019 को आधार मानते हुए 12 किलोमीटर × 12 किलोमीटर ग्रिड पर गतिविधि-आधारित उत्सर्जन सूची तैयार की गई और इसके साथ स्वतंत्र उपग्रह आधारित स्थानिक विश्लेषण किया गया। इसमें परिवहन, उद्योग और खनन, बिजली, कचरा, कृषि और पशुधन तथा घरों में खाना पकाने जैसे क्षेत्रों से होने वाले उत्सर्जन का आकलन किया गया है। इसके बाद 2030, 2040 और 2047 तक उत्सर्जन के संभावित स्तरों का अनुमान लगाकर उन्हें कम करने के लिए अलग-अलग नीतिगत विकल्पों का आकलन किया गया है।
मध्य प्रदेश सरकार के वन एवं पर्यावरण विभाग के राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने कहा: “इस तरह के आकलन बहुत जरूरी हैं, क्योंकि इनसे हमें स्थानीय स्तर की चुनौतियों के साथ उनसे जुड़े बड़े आर्थिक और विकास के सवालों को भी समझने में मदद मिलती है। जिला स्तर के आंकड़े हमें ठीक-ठीक बताते हैं कि प्रदूषण कहां से आ रहा है और आज हमारे सामने किस तरह के खतरे हैं।
मिसाल के तौर पर, हम देखते हैं कि खेतों में फसल अवशेषों को खुले में जलाना PM2.5 और PM10 के साथ ब्लैक कार्बन उत्सर्जन का भी एक बड़ा कारण है। रिपोर्ट ने मध्य प्रदेश में प्रदूषण के प्रमुख हॉटस्पॉट की भी पहचान की है। इससे हमें अधिक जानकारी और प्रमाण के आधार पर नीतिगत फैसले लेने में मदद मिलेगी।
इस रिपोर्ट की खास बात यह है कि यह केवल समस्याओं की पहचान तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उनके स्पष्ट और व्यावहारिक समाधान भी सुझाती है। खनन, परिवहन और उद्योग जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों के लिए समयबद्ध और क्षेत्र-विशेष रोडमैप बनाने की बात हो, या सतत, पीएमयूवाई और अमृत जैसी मौजूदा राष्ट्रीय योजनाओं का बेहतर इस्तेमाल, रिपोर्ट आगे बढ़ने के स्पष्ट रास्ते सुझाती है। कम कार्बन वाले बुनियादी ढांचे के लिए जलवायु वित्त और सीएसआर फंड का इस्तेमाल बढ़ाने पर भी जोर दिया गया है। ये सुझाव राज्य की दूरगामी नीतियों के अनुरूप हैं।
यह रिपोर्ट वैज्ञानिक शोध और सरकारी कार्रवाई के बीच की दूरी को कम करने का सराहनीय काम करती है। इससे ऐसी नीतियां बनाने में मदद मिलेगी जो आर्थिक विकास को बनाए रखते हुए लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण की रक्षा करें।”
मध्य प्रदेश में बढ़ते तापमान और वायु प्रदूषण, दोनों का असर बढ़ रहा है। 1981-2010 के औसत स्तर की तुलना में सदी के मध्य तक राज्य में औसत अधिकतम तापमान 1.3 से 1.6 डिग्री सेल्सियस और न्यूनतम तापमान 1.4 से 1.8 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ने का अनुमान है। राज्य के पूर्वी हिस्से में तापमान सबसे तेजी से बढ़ने की आशंका है, जबकि डिंडोरी, भिंड और सीधी जैसे जिले अपनी कम अनुकूलन क्षमता के कारण विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्बन डाइऑक्साइड में कमी लाना जरूरी है, लेकिन इसके साथ मीथेन और ब्लैक कार्बन जैसे कम समय तक वातावरण में रहने वाले जलवायु प्रदूषकों पर तेजी से कार्रवाई की भी जरूरत है। इन प्रदूषकों में कमी लाने से लंबे समय तक चलने वाले कार्बन उत्सर्जन घटाने के प्रयासों को मजबूती मिलेगी। साथ ही निकट भविष्य में तापमान वृद्धि की रफ्तार धीमी करने, हवा की गुणवत्ता सुधारने और लोगों के स्वास्थ्य को बेहतर बनाने में मदद मिल सकती है।
मीथेन उत्सर्जन में पशुधन की बड़ी हिस्सेदारी
रिपोर्ट के सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्षों में से एक मीथेन से जुड़ा है। अध्ययन के अनुसार, CO₂ के बाद मीथेन मध्य प्रदेश में सबसे अधिक मात्रा में उत्सर्जित होने वाला प्रदूषक है। वर्ष 2019 में राज्य के कुल मीथेन उत्सर्जन में पशुधन की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत यानी 843 किलोटन प्रतिवर्ष थी।
अध्ययन के अनुसार, प्राकृतिक खेती के तरीकों से धान की खेती से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में 65 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। बेहतर चारा प्रबंधन और संतुलित पशु आहार से पशुधन के मीथेन उत्सर्जन में अपेक्षाकृत कम समय और कम लागत में 10 से 15 प्रतिशत तक कमी संभव है।
बिजली और परिवहन में भी बड़ी संभावनाएं
अध्ययन में बिजली और परिवहन क्षेत्रों में उत्सर्जन कम करने की बड़ी संभावनाएं सामने आई हैं। वर्ष 2019 में दोनों क्षेत्रों की मिलाकर मध्य प्रदेश के कुल NOx उत्सर्जन में 92 प्रतिशत हिस्सेदारी थी।
यदि मौजूदा रुझान जारी रहते हैं, तो 2047 तक बिजली क्षेत्र से होने वाला NOx उत्सर्जन लगभग चार गुना हो सकता है। अध्ययन के अनुसार, नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और आंशिक रूप से गैस के इस्तेमाल से इस संभावित वृद्धि की तुलना में बिजली क्षेत्र का NOx उत्सर्जन 91 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है।
सभी क्षेत्रों में स्थानीय जरूरतों के मुताबिक सबसे प्रभावी उपाय लागू किए जाएं, तो रिपोर्ट के सुझाए गए मार्ग के अनुसार 2047 तक सामान्य स्थिति की तुलना में SO₂ उत्सर्जन में लगभग 80 प्रतिशत, NOx में 78 प्रतिशत, एनएमवीओसी में 61 प्रतिशत और ब्लैक कार्बन में 56 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है। इसमें बिजली क्षेत्र में नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार और गैस का इस्तेमाल, उद्योगों में स्वच्छ ईंधन तथा परिवहन में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देने और पुराने वाहनों को हटाने जैसे कदमों की अहम भूमिका होगी।
ईपीसीओ के कार्यकारी निदेशक हर्षल पंचोली, आईएएस ने कहा: “किसी भी नीति की प्रभावशीलता उसके पीछे मौजूद प्रमाणों पर निर्भर करती है। इस अध्ययन की खासियत यह है कि इसमें विस्तृत उत्सर्जन सूची को स्थानिक विश्लेषण के साथ जोड़ा गया है और फिर यह भी देखा गया है कि अलग-अलग नीतिगत विकल्पों से क्या हासिल किया जा सकता है। यह हमारे लिए फैसले लेने का एक व्यावहारिक आधार देता है। इससे पता चलता है कि उत्सर्जन कहां अधिक है, किन क्षेत्रों को प्राथमिकता देने की जरूरत है और मौजूदा नीतियों को कहां मजबूत किया जा सकता है। इससे विभागों के बीच बेहतर तालमेल बनाने और मध्य प्रदेश में जलवायु तथा स्वच्छ वायु से जुड़ी योजनाओं के अगले चरण को अधिक प्रभावी बनाने में मदद मिलेगी।”
फसल अवशेष और घरेलू ईंधन में तेजी से सुधार की गुंजाइश
रिपोर्ट ने ऐसे क्षेत्रों की भी पहचान की है जहां अपेक्षाकृत कम समय में असर दिख सकता है। आकलन के अनुसार, वर्ष 2019 में कृषि अवशेषों को खुले में जलाने से राज्य के 47 प्रतिशत ब्लैक कार्बन उत्सर्जन हुए। अध्ययन में माना गया है कि 2030 तक खुले में कृषि अवशेष जलाने पर मौजूदा प्रतिबंध को पूरी तरह लागू किया जाए तो इस स्रोत से होने वाले उत्सर्जन को खत्म किया जा सकता है।
घरों में बायोमास से खाना पकाने के कारण आवासीय क्षेत्र एनएमवीओसी का सबसे बड़ा स्रोत है। रिपोर्ट के अनुसार, सौर चूल्हों, बायोगैस और एलपीजी का इस्तेमाल बढ़ाकर 2047 तक घरेलू क्षेत्र से होने वाले एनएमवीओसी उत्सर्जन में करीब 80 प्रतिशत और ब्लैक कार्बन उत्सर्जन में लगभग 100 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है।
गेटवे रिसर्च की अध्यक्ष और आईजीएसडी इंडिया की निदेशक ज़ेरिन ओशो ने कहा: “ये आंकड़े बताते हैं कि इन प्रदूषकों पर कार्रवाई को कार्बन उत्सर्जन घटाने की लंबी प्रक्रिया पूरी होने तक टाला नहीं जा सकता। 2019 में मध्य प्रदेश के मीथेन उत्सर्जन में अकेले पशुधन क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 60 प्रतिशत थी, जबकि कृषि अवशेष जलाने से ब्लैक कार्बन उत्सर्जन का लगभग आधा हिस्सा आया। अच्छी बात यह है कि इन दोनों क्षेत्रों में समाधान हमारे पास पहले से मौजूद हैं। प्राकृतिक खेती से धान की खेती से होने वाले मीथेन उत्सर्जन में 65 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है और बेहतर पशु आहार से पशुधन से होने वाले मीथेन उत्सर्जन को भी अपेक्षाकृत तेजी से कम किया जा सकता है। CO₂ में कमी वह मैराथन है जिसे हमें लगातार दौड़ना है, लेकिन मीथेन, ब्लैक कार्बन और दूसरे अल्पकालिक प्रदूषकों में कमी वह तेज दौड़ है जो निकट भविष्य में हमें साफ हवा देने और तापमान बढ़ने की रफ्तार धीमी करने में मदद कर सकती है। मध्य प्रदेश के पास अब दोनों मोर्चों पर आगे बढ़ने के लिए जरूरी प्रमाण मौजूद हैं।”
मध्य प्रदेश के पास पहले से मजबूत आधार
मध्य प्रदेश देश में जैविक खेती के क्षेत्र में अग्रणी है। राज्य में 0.76 मिलियन हेक्टेयर, यानी देश के कुल जैविक खेती क्षेत्र का करीब 27 प्रतिशत, जैविक खेती के अंतर्गत है।
वर्ष 2023 तक मध्य प्रदेश में 3,022 मेगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन क्षमता विकसित हो चुकी थी। इंदौर देश का पहला ऐसा नगरीय निकाय भी बना जिसने कार्बन क्रेडिट के कारोबार से राजस्व अर्जित किया। मध्य प्रदेश राज्य जलवायु परिवर्तन कार्ययोजना, मध्य प्रदेश इलेक्ट्रिक वाहन नीति 2025 और नवीकरणीय ऊर्जा नीति 2025 आगे की कार्रवाई के लिए राज्य को संस्थागत आधार प्रदान करती हैं।
रिपोर्ट में खास तौर पर खनन, परिवहन और उद्योग के लिए समयबद्ध, क्षेत्रवार रोडमैप तैयार करने की सिफारिश की गई है। पशुधन, कृषि और कोयला खनन में भी लक्षित कार्रवाई पर जोर दिया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इन क्षेत्रों में मध्य प्रदेश के गैर-CO₂ उत्सर्जन को कम करने की बड़ी संभावनाएं अभी पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हुई हैं।
स्वच्छ बुनियादी ढांचे के विस्तार के लिए मौजूदा राष्ट्रीय कार्यक्रमों के साथ जलवायु वित्त और सीएसआर फंड का अधिक उपयोग करने की भी सिफारिश की गई है। इसके अलावा, वास्तविक समय में उत्सर्जन की निगरानी और दूरसंवेदी तकनीक के जरिए निगरानी व्यवस्था को मजबूत करने पर जोर दिया गया है।