बालाघाट की ये तस्वीरें सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट की कहानी नहीं हैं, बल्कि यह बताती हैं कि किसी क्षेत्र का दशकों तक विकास से कट जाना कितना भयावह परिणाम दे सकता है।
मध्य प्रदेश के नक्सल प्रभावित रहे इस क्षेत्र में हाल ही में 25 से अधिक बच्चों की मौत और बीमारी फैलने की गंभीर स्थिति सामने आई। यह वही क्षेत्र है, जहां लंबे समय तक सामान्य स्वास्थ्यकर्मियों तक का पहुंचना बेहद कठिन था। जब सड़क, अस्पताल, डॉक्टर, स्कूल और प्रशासन नियमित रूप से किसी क्षेत्र तक नहीं पहुंच पाते, तो सबसे ज्यादा नुकसान बच्चों और गरीब परिवारों को उठाना पड़ता है। लेकिन अब तस्वीर बदल रही है। मध्य प्रदेश सरकार, छत्तीसगढ़ सरकार और केंद्र सरकार के संयुक्त प्रयासों से क्षेत्र नक्सलवाद से मुक्त हुआ है। पिछले सप्ताह मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव स्वयं वहां पहुंचे और क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा में लाने की बात कही। *जिला प्रशासन और प्रशासन की सक्रियता से करीब 300 बच्चों तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने और उनकी जान बचाने का प्रयास किया गया।*
लेकिन दशकों बाद जब कोई नक्सल प्रभावित क्षेत्र मुख्यधारा में आता है, तो वहां से सामने आने वाली तस्वीरें कई दूसरी चुनौतियां भी दिखाती हैं। स्वास्थ्य के साथ-साथ जागरूकता, शिक्षा, सरकारी योजनाओं की जानकारी और बुनियादी सुविधाओं की कमी भी दिखाई देती है। कुछ क्षेत्र नक्सल प्रभाव और लंबे समय तक विकास से कटे रहने के कारण दूसरे क्षेत्रों की तुलना में कई वर्ष पीछे रह गए हैं।
इसे बदलना अब सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती है। ऐसे क्षेत्रों को जल्द से जल्द सामान्य क्षेत्रों के बराबर लाना होगा—सड़क, अस्पताल, स्कूल, रोजगार, इंटरनेट, प्रशासनिक सेवाएं और सरकारी योजनाओं की पहुंच हर परिवार तक सुनिश्चित करनी होगी।
यही अंतर समझना जरूरी है।
नक्सलवाद क्या देता है?
डर, बंदूक, अलगाव, सरकारी व्यवस्था से दूरी और विकास के रास्ते में बाधा।
सरकार क्या देती है?
अस्पताल, डॉक्टर, स्कूल, सड़क, राशन, रोजगार, प्रशासन और नागरिकों को उनके अधिकारों तक पहुंच।
मान लीजिए किसी गांव में बच्चा बीमार है। नक्सलवाद के प्रभाव वाले दौर में अगर डॉक्टर गांव तक नहीं पहुंच सकता और परिवार अस्पताल तक नहीं जा सकता, तो बीमारी जानलेवा बन सकती है। लेकिन जब वही क्षेत्र सुरक्षित होता है, प्रशासन पहुंचता है और स्वास्थ्य व्यवस्था जुड़ती है, तो उसी बच्चे को समय पर इलाज मिल सकता है।
यानी बंदूक किसी समस्या का समाधान नहीं करती; सड़क और अस्पताल करते हैं।
इस समय इस क्षेत्र को सबसे ज्यादा जरूरत है सरकारी मदद, स्वास्थ्य सेवाओं, शिक्षा, रोजगार और दोबारा मुख्यधारा से जुड़ने की। सरकार इस दिशा में काम कर रही है, लेकिन चुनौती सिर्फ विकास की नहीं, भरोसा और जागरूकता वापस बनाने की भी है। दुर्भाग्य से ऐसे संवेदनशील इलाकों में आज भी अफवाहें फैलाने और लोगों को सरकारी व्यवस्था के खिलाफ भड़काने की कोशिशें सामने आती हैं। ऐसे प्रयासों से वर्षों तक अलगाव झेल चुके लोगों में फिर से डर और अविश्वास पैदा हो सकता है।
इसलिए यहां सरकार की जिम्मेदारी जितनी बड़ी है, उतनी ही महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वहां के रहवासियों की भी है।
सरकार के काम में कमी है तो सवाल पूछिए। पैकेज का हिसाब मांगिए। जहां काम नहीं हुआ, वहां आवाज उठाइए। *लेकिन अफवाहों पर भरोसा मत कीजिए और ऐसे लोगों या संगठनों से दूरी रखिए, जो आपको फिर से मुख्यधारा से दूर करने या सरकारी सुविधाओं से डराने का काम करते हैं।* क्योंकि मुख्यधारा में लौटना केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। वहां के लोगों को भी यह तय करना होगा कि उनके बच्चों का भविष्य शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास में है अलगाव और हिंसा में नहीं।
जब लोग सरकार की योजनाओं से जुड़ेंगे, अपने अधिकारों को समझेंगे और गलत सूचना से बचेंगे, तभी वे अपने अधिकारों की बेहतर तरीके से रक्षा कर पाएंगे और अपने क्षेत्र के विकास में भागीदार बन पाएंगे।
36 साल के अलगाव के बाद अब समय है उन्हें मुख्यधारा से जोड़ने का
सरकार विकास का रास्ता तैयार करे और समाज उस रास्ते पर आगे बढ़े तभी बालाघाट की यह नई शुरुआत वास्तव में स्थायी बदलाव में बदलेगी।
नक्सलवाद से नहीं, सरकार और समाज के साथ मिलकर ही इस क्षेत्र का भविष्य बदलेगा।