रायपुर 12 सितंबर 2026। भारत में सड़क निर्माण को अधिक किफायती और टिकाऊ बनाने की दिशा में स्टील स्लैग रोड तकनीक एक बड़ी उपलब्धि के रूप में सामने आई है। केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्टील स्लैग से सड़क निर्माण की लागत करीब 40 प्रतिशत तक कम हो सकती है, जबकि ऐसी सड़कें पारंपरिक सड़कों की तुलना में चार गुना अधिक मजबूत हो सकती हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इस तकनीक से बनी सड़कों में बड़े रखरखाव की जरूरत लगभग 15 वर्षों बाद पड़ सकती है। उन्होंने राज्यों, केंद्र सरकार के विभिन्न विभागों और निजी क्षेत्र से इस स्वदेशी तकनीक को बड़े पैमाने पर अपनाने की अपील की।
रायगढ़ में बना विश्व रिकॉर्ड
छत्तीसगढ़ के रायगढ़ में 1.85 किलोमीटर लंबी स्टील स्लैग सड़क ने 'प्रसंस्कृत स्टील स्लैग एग्रीगेट्स से बनी विश्व की सबसे लंबी सड़क' का गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया है।
इस परियोजना को सीएसआईआर-केंद्रीय सड़क अनुसंधान संस्थान (CSIR-CRRI) और जिंदल स्टील ने मिलकर विकसित किया है। इसमें इस्पात उत्पादन से निकलने वाले स्टील स्लैग को वैज्ञानिक तरीके से प्रोसेस कर सड़क निर्माण में इस्तेमाल होने वाले एग्रीगेट्स में बदला गया है।
कार्यक्रम में सड़क का वर्चुअल उद्घाटन, वैज्ञानिक डॉक्यूमेंट्री का विमोचन और CSIR-CRRI तथा जिंदल स्टील के बीच तकनीक हस्तांतरण समझौता भी हुआ। इस दौरान 'स्टील ग्रिट' ब्रांड लॉन्च किया गया और परियोजना से जुड़े वैज्ञानिकों एवं इंजीनियरों को सम्मानित किया गया।
वेस्ट टू वेल्थ की दिशा में बड़ा कदम
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि स्टील स्लैग रोड तकनीक सरकार की 'वेस्ट टू वेल्थ' और सर्कुलर इकोनॉमी की सोच को आगे बढ़ाती है। इसके जरिए औद्योगिक उप-उत्पाद को सड़क निर्माण जैसी उपयोगी इंफ्रास्ट्रक्चर संपदा में बदला जा सकता है और प्राकृतिक संसाधनों से मिलने वाले एग्रीगेट्स पर निर्भरता कम की जा सकती है।
भारत में तेजी से बढ़ रहे हाईवे, एक्सप्रेसवे, औद्योगिक कॉरिडोर, पोर्ट और शहरी इंफ्रास्ट्रक्चर के बीच टिकाऊ निर्माण सामग्री की मांग भी बढ़ रही है। ऐसे में स्टील स्लैग का उपयोग दोहरी चुनौती का समाधान दे सकता है, यानी औद्योगिक कचरे का उपयोग और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण।
भारी बारिश और ज्यादा ट्रैफिक वाले इलाकों में भी उपयोगी
मंत्री ने कहा कि भारत के भौगोलिक रूप से विविध क्षेत्रों में इस तकनीक की उपयोगिता काफी अधिक हो सकती है। खासकर अत्यधिक बारिश और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों वाले क्षेत्रों में पारंपरिक सड़कें जल्दी खराब हो जाती हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में भी ट्रैफिक पैटर्न बदल रहा है। कई ऐसी सड़कें जो पहले केवल गांवों और हल्के वाहनों के लिए बनाई गई थीं, अब औद्योगिक विकास के कारण भारी ट्रकों और व्यावसायिक वाहनों का भार उठा रही हैं। ऐसे में ज्यादा मजबूत और टिकाऊ सड़क तकनीक की जरूरत बढ़ गई है।
हजीरा से अरुणाचल तक पहुंची तकनीक
स्टील स्लैग एग्रीगेट तकनीक का इस्तेमाल पहले गुजरात के हजीरा में प्रदर्शन परियोजना के रूप में किया गया। इसके बाद इसे NH-66 मुंबई-गोवा राजमार्ग पर भी इस्तेमाल किया गया, जहां करीब 80,000 टन स्टील स्लैग को प्रोसेस कर एक किलोमीटर लंबे चार-लेन सड़क खंड का निर्माण किया गया।
अरुणाचल प्रदेश के रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण सीमावर्ती क्षेत्रों में हेवी-ड्यूटी सड़क निर्माण में भी इस तकनीक का इस्तेमाल किया गया है। हजीरा पोर्ट के भीतर 1.1 किलोमीटर लंबी स्टील स्लैग सड़क भी इसका उदाहरण है।
ओडिशा में बनेगी 40 किलोमीटर लंबी सड़क
रायगढ़ का 1.85 किलोमीटर का विश्व रिकॉर्ड अब ज्यादा बड़े प्रोजेक्ट की ओर बढ़ रहा है। CSIR की महानिदेशक डॉ. एन. कलाईसेल्वी ने बताया कि CSIR-CRRI को जिंदल स्टील के अंगुल प्लांट से ओडिशा में 40 किलोमीटर लंबी सड़क बनाने का वर्क ऑर्डर मिल चुका है।
इस परियोजना के जरिए तकनीक को मौजूदा 1.85 किलोमीटर के गिनीज रिकॉर्ड से आगे बढ़ाकर बड़े पैमाने पर लागू किया जाएगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि गिनीज वर्ल्ड रिकॉर्ड को मंजिल नहीं बल्कि शुरुआत माना जाना चाहिए। असली सफलता तब होगी जब तकनीकी और आर्थिक रूप से उपयुक्त स्थानों पर देशभर में स्टील स्लैग रोड तकनीक को अपनाया जाएगा।
सरकार का लक्ष्य अब 'एक परियोजना से कई परियोजनाओं तक और एक राज्य से कई राज्यों तक' इस स्वदेशी तकनीक का विस्तार करना है।