9 अक्टूबर 2026। रिसर्च में खुलासा, AI असिस्टेंट का जेंडर और दिखने का तरीका इंसानों के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है। समान तकनीक से संचालित होने के बावजूद महिला AI एजेंट को कम पैसे मिले।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को अक्सर ऐसी तकनीक माना जाता है, जो इंसानों की तरह सामाजिक भेदभाव नहीं करती। लेकिन यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक के शोधकर्ताओं की एक स्टडी ने इस धारणा पर सवाल खड़े किए हैं। शोध में पाया गया कि एक ही काम करने के बावजूद महिला के रूप में दिखने वाले AI एजेंट को उसके पुरुष समकक्ष की तुलना में 10.25 प्रतिशत कम भुगतान मिला।
यह अध्ययन इस बात की ओर इशारा करता है कि AI के साथ इंसानों का व्यवहार भी समाज में मौजूद लैंगिक पूर्वाग्रहों से प्रभावित हो सकता है। खास बात यह है कि दोनों AI एजेंट के पीछे एक जैसी तकनीक थी। उनके बीच अंतर केवल उनके वर्चुअल अवतार के जेंडर का था।
189 लोगों पर किया गया प्रयोग
शोधकर्ताओं ने इस अध्ययन के लिए 189 प्रतिभागियों को वर्चुअल रियलिटी (VR) आधारित ऑफिस सिमुलेशन में शामिल किया। इसका उद्देश्य यह समझना था कि लोग AI असिस्टेंट के साथ काम करते समय उसके रूप-रंग और जेंडर के आधार पर अलग-अलग व्यवहार करते हैं या नहीं।
प्रतिभागियों को अलग-अलग वर्चुअल AI असिस्टेंट के साथ काम करने का अवसर दिया गया। इनमें पुरुष और महिला जैसे दिखने वाले अवतार शामिल थे, जबकि उन्हें संचालित करने वाली AI तकनीक समान थी।
अध्ययन का उद्देश्य वास्तविक दुनिया में होने वाले लेन-देन जैसी परिस्थितियां तैयार करना और यह पता लगाना था कि लोग AI से कराए गए काम के लिए कितना भुगतान करने को तैयार होते हैं।
काम पूरा होने के बाद प्रतिभागियों को अपने लिए और AI एजेंट के लिए वास्तविक धनराशि दी गई। इस प्रक्रिया के दौरान शोधकर्ताओं ने दोनों तरह के अवतारों के साथ लोगों के व्यवहार का आकलन किया।
जोहान को जोहाना से मिला ज्यादा भुगतान
प्रयोग में पुरुष अवतार वाले AI असिस्टेंट का नाम जोहान और महिला अवतार वाली असिस्टेंट का नाम जोहाना रखा गया था।
शोध के अनुसार, समान काम पूरा करने के बावजूद जोहान को जोहाना की तुलना में 10.25 प्रतिशत अधिक भुगतान मिला। यह अंतर बताता है कि केवल AI असिस्टेंट के जेंडर-आधारित दृश्य रूप में बदलाव भी लोगों के आर्थिक फैसलों को प्रभावित कर सकता है।
शोधकर्ताओं ने यह भी पाया कि प्रतिभागियों को जोहान, जोहाना की तुलना में अधिक इंसान जैसा लगा। यह निष्कर्ष महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी डिजिटल असिस्टेंट को कितना भरोसेमंद, सक्षम या मानवीय माना जाता है, उसका असर उसके साथ होने वाले व्यवहार पर पड़ सकता है।
हालांकि, अध्ययन के नतीजों को सभी AI सिस्टम या वास्तविक कार्यस्थलों पर लागू मानना उचित नहीं होगा। यह प्रयोग एक विशेष वर्चुअल वातावरण में किया गया था। इसके निष्कर्ष व्यापक परिस्थितियों में कितने लागू होते हैं, इसे समझने के लिए आगे और शोध की आवश्यकता है।
क्या AI अपना रहा है कार्यस्थलों के पुराने पूर्वाग्रह?
यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक की शोधकर्ता डॉ. मैरी हॉसफेल्ड के अनुसार, AI को लेकर आम धारणा है कि यह जेंडर-न्यूट्रल तकनीक है। लेकिन प्रयोग में प्रतिभागियों ने पुरुष और महिला अवतारों के साथ एक जैसा व्यवहार नहीं किया।
यह अंतर इस बात की ओर संकेत करता है कि AI मॉडल के भीतर भले ही कोई जेंडर-आधारित अंतर न हो, लेकिन उसके सामने प्रस्तुत किए जाने वाले अवतार का रूप लोगों की प्रतिक्रिया बदल सकता है।
समाज में लंबे समय से चली आ रही धारणाएं अक्सर इस बात को प्रभावित करती हैं कि किसी व्यक्ति की क्षमता, विश्वसनीयता और काम के मूल्य को कैसे देखा जाता है। शोध के निष्कर्ष बताते हैं कि ऐसी धारणाएं डिजिटल दुनिया में भी दिखाई दे सकती हैं।
उदाहरण के लिए, यदि किसी कंपनी में कर्मचारियों को काम सौंपने, उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन करने या भुगतान तय करने के लिए AI असिस्टेंट का इस्तेमाल किया जाता है, तो उसके अवतार का जेंडर भी उपयोगकर्ताओं की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इस अध्ययन से यह साबित नहीं होता कि हर कार्यस्थल या हर AI प्रणाली में ऐसा ही होगा।
AI अवतार केवल सजावट नहीं हैं
डॉ. हॉसफेल्ड ने AI असिस्टेंट के अवतार और व्यक्तित्व को केवल डिजाइन या सजावट का हिस्सा मानने के प्रति सावधान किया है।
जब किसी AI एजेंट को काम सौंपा जाता है, तो उसका वास्तविक प्रदर्शन उसे संचालित करने वाले मॉडल और सिस्टम पर निर्भर करता है। लेकिन उपयोगकर्ता उसकी क्षमताओं का आकलन करते समय उसके बाहरी रूप से प्रभावित हो सकते हैं।
इसका मतलब है कि AI उत्पाद तैयार करने वाली कंपनियों को केवल एल्गोरिदम की निष्पक्षता पर ही ध्यान नहीं देना चाहिए, बल्कि यह भी देखना चाहिए कि उनके डिजिटल अवतार लोगों के फैसलों को किस तरह प्रभावित करते हैं।
AI के दौर में समानता की नई चुनौती
AI का इस्तेमाल भर्ती, ग्राहक सेवा, शिक्षा, वित्तीय सेवाओं और कार्यालयों में तेजी से बढ़ रहा है। ऐसे में तकनीक की निष्पक्षता का सवाल केवल इस बात तक सीमित नहीं रह जाता कि AI मॉडल सभी लोगों के साथ समान व्यवहार करता है या नहीं। यह भी महत्वपूर्ण है कि इंसान AI के साथ किस तरह व्यवहार करते हैं और उसके आधार पर क्या निर्णय लेते हैं।
यूनिवर्सिटी ऑफ लिमरिक का यह अध्ययन एक महत्वपूर्ण पहलू सामने लाता है: तकनीक अपने आप में जेंडर-न्यूट्रल हो सकती है, लेकिन उसे इस्तेमाल करने वाले लोगों की सामाजिक धारणाएं उसके परिणामों को प्रभावित कर सकती हैं।
इसलिए AI सिस्टम डिजाइन करते समय अवतारों, आवाज, व्यक्तित्व और उपयोगकर्ता के व्यवहार के बीच संबंधों को समझना जरूरी है। भविष्य में AI की निष्पक्षता का आकलन करते समय केवल तकनीकी प्रदर्शन नहीं, बल्कि उससे जुड़े मानवीय पूर्वाग्रहों पर भी ध्यान देना होगा।