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आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि कालड़ी में मोरारी बापू की रामकथा

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Digital Desk
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📍 भोपाल
आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि कालड़ी में मोरारी बापू की रामकथा

भारत स्वस्तिक यात्रा ने अपनी पावन यात्रा की प्रेरणाभूमि को किया नमन

कालड़ी, केरल, 11 अक्टूबर, 2026। भारत स्वस्तिक यात्रा आज अपनी यात्रा के एक अत्यंत महत्वपूर्ण आध्यात्मिक पड़ाव पर पहुँची, जब पूज्य मोरारी बापू केरल के कालड़ी पहुँचे। कालड़ी को आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है। यहाँ 11 अक्टूबर को पूज्य बापू ने रामकथा का आयोजन किया।

कालड़ी की यह यात्रा भारत स्वस्तिक यात्रा के लिए विशेष महत्व रखती है। यह वही पावन भूमि है, जहाँ आदि शंकराचार्य का प्रारंभिक जीवन बीता। यहीं से आगे चलकर उन्होंने संपूर्ण भारत की यात्रा की, विभिन्न दार्शनिक परंपराओं के साथ संवाद स्थापित किया और अद्वैत वेदांत को भारतीय दर्शन की प्रमुख धाराओं में प्रतिष्ठित किया।

भारत स्वस्तिक यात्रा के संदर्भ में कालड़ी में पूज्य बापू की उपस्थिति का गहरा आध्यात्मिक अर्थ है। यह यात्रा भारत के विभिन्न क्षेत्रों को साझा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत के सूत्र में जोड़ने के उद्देश्य से आगे बढ़ रही है। सदियों पूर्व आदि शंकराचार्य द्वारा देशभर में की गई यात्रा भी इसी एकात्म भाव की ऐतिहासिक मिसाल प्रस्तुत करती है।

पेरियार नदी के तट पर स्थित कालड़ी में शंकराचार्य के बाल्यकाल, उनकी माता आर्याम्बा और उनके प्रारंभिक आध्यात्मिक जीवन से जुड़ी परंपराएँ आज भी जीवंत हैं। यह स्थान उनके संन्यास और उस आध्यात्मिक यात्रा से जुड़ी मान्यताओं के लिए भी महत्वपूर्ण है, जिसने उन्हें भारत के विभिन्न क्षेत्रों तक पहुँचाया।

कालड़ी में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए पूज्य मोरारी बापू ने रामचरितमानस का संदेश उस पावन भूमि पर प्रस्तुत किया, जो लंबे समय से वेदांत के अध्ययन और आध्यात्मिक चिंतन का प्रमुख केंद्र रही है। यहाँ आयोजित रामकथा ने सनातन धर्म के गूढ़ स्वरूप को समझने और ज्ञान की खोज करने की कालड़ी की प्राचीन परंपरा को समकालीन संदर्भ में अभिव्यक्त किया।

कथा के दौरान पूज्य मोरारी बापू ने कहा,
“कालड़ी मूल पुरुष आदि शंकराचार्य की भूमि है। आज मेरे मन में बार-बार ‘मूल’ शब्द का विचार आता रहा। फूल और काँटे कहाँ होते हैं? शाखाओं पर। शाखाएँ कहाँ से निकलती हैं? तने से। तने को शक्ति जड़ों से मिलती है, जड़ें पृथ्वी में स्थित हैं, पृथ्वी शेषनाग पर टिकी है और शेषनाग महादेव पर। इस प्रकार, समस्त सृष्टि के मूल में महादेव हैं। हमें अपने मूल, अपने स्रोत को कभी नहीं भूलना चाहिए।

मैंने माता आर्याम्बा का भी स्मरण किया, जिनकी कोख से आदि शंकराचार्य जैसी महान आत्मा ने जन्म लिया और जिन्होंने आध्यात्मिक ज्ञान का मार्ग आलोकित किया। इस पावन भूमि पर आना और उन जड़ों का स्मरण करना, जो हम सभी को संबल देती हैं, अपने आप में एक आशीर्वाद है।

यह भी अत्यंत शुभ संयोग है कि आज द्वारकाधीश के पुजारी यहाँ पहुँचे हैं। 14 अक्टूबर को द्वारका से भारत स्वस्तिक यात्रा के अगले चरण की शुरुआत की तैयारी के बीच, मैं कालड़ी, श्रृंगेरी और इस यात्रा से जुड़े सभी पावन स्थलों, जिनमें कन्याकुमारी भी शामिल है, के लोगों को द्वारका में आयोजित होने वाली कथा में सम्मिलित होने के लिए आमंत्रित करता हूँ।”

कालड़ी और भारत स्वस्तिक यात्रा का संबंध आदि शंकराचार्य से जुड़ी अखिल भारतीय आध्यात्मिक परंपरा के कारण भी महत्वपूर्ण हो जाता है। परंपरागत मान्यताओं के अनुसार, आदि शंकराचार्य ने भारत की चारों दिशाओं में चार प्रमुख मठों की स्थापना से जुड़ी परंपरा को प्रतिष्ठित किया—दक्षिण में श्रृंगेरी, पश्चिम में द्वारका, पूर्व में पुरी और उत्तर में ज्योतिर्मठ। उनकी यात्राओं और शिक्षाओं ने देश के दूर-दराज के क्षेत्रों को एक साझा दार्शनिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वस्तिक का स्वरूप भी चारों दिशाओं को जोड़ने के इसी भाव को अभिव्यक्त करता है। इसकी चार भुजाएँ केंद्र से निकलकर चारों ओर विस्तारित होती हैं, लेकिन एक-दूसरे से जुड़ी रहती हैं। यह मंगल, कल्याण और शुभता का चिरस्थायी प्रतीक है। भारत स्वस्तिक यात्रा के संदर्भ में यह भारत की परस्पर जुड़ी आध्यात्मिक परंपराओं का भी सशक्त प्रतीक बनता है।

भारत स्वस्तिक यात्रा के प्रथम चरण में पूज्य मोरारी बापू के साथ लगभग 900 श्रद्धालु दो विशेष ट्रेनों—कैलाश भारत गौरव और चित्रकूट भारत गौरव—से यात्रा कर रहे हैं। इन ट्रेनों में क्रमशः 22 और 16 डिब्बे हैं।

भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है। इस यात्रा में भारत के विभिन्न क्षेत्रों और जीवन के विविध वर्गों से जुड़े श्रद्धालु एवं लोग सहभागी बन रहे हैं।

मिराज समूह के चेयरमैन एवं संतकृपा सनातन संस्थान के प्रबंध न्यासी मदन पालीवाल ने कहा, “आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि कालड़ी पहुँचना इस यात्रा के लिए अत्यंत अर्थपूर्ण क्षण है। भारतभर में उनकी यात्रा और सनातन धर्म में उनके अमूल्य योगदान के कारण यह पड़ाव हमारे लिए विशेष महत्व रखता है। यहाँ बापू की रामकथा उस शाश्वत आध्यात्मिक विरासत को वर्तमान समय के साथ जीवंत संवाद में जोड़ती है।”

इस प्रकार, कन्याकुमारी से केदारनाथ की ओर बढ़ रही भारत स्वस्तिक यात्रा के लिए कालड़ी का पड़ाव विशेष महत्व रखता है। भारत के दक्षिणी छोर से प्रारंभ हुई यह यात्रा अब देश के सर्वाधिक प्रभावशाली आचार्यों में से एक, आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि से जुड़ी पावन भूमि तक पहुँची है। यहाँ से यात्रा आगे उत्तर की ओर हिमालय की दिशा में बढ़ेगी।

कालड़ी में आयोजित रामकथा भारत स्वस्तिक यात्रा के प्रथम चरण का हिस्सा है। यह चरण 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से प्रारंभ हुआ और 23 अक्टूबर को केदारनाथ में संपन्न होगा। इस दौरान यात्रा अनेक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों से होकर गुजरेगी।

पूज्य मोरारी बापू के लिए यह यात्रा रामकथा के माध्यम से देश के विभिन्न क्षेत्रों तक सत्य, प्रेम और करुणा के मूल्यों को पहुँचाने का अवसर है। साथ ही, यह भारत की उन विविध आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ने का प्रयास भी है, जिन्होंने सदियों से देश की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक चेतना को आकार दिया है।

इस प्रकार, कालड़ी का दिन भारत स्वस्तिक यात्रा के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनकर सामने आया। आदि शंकराचार्य की जन्मभूमि से जुड़ी इस पावन भूमि पर यात्रा का साक्षात्कार ज्ञान, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की उस जीवंत परंपरा से हुआ, जो आज भी संपूर्ण भारत में सनातन धर्म को निरंतर प्रेरित कर रही है।

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