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नवरात्रि 2026: प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते भक्त? जानिए धार्मिक मान्यताएं और खान-पान से जुड़े कारण

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Digital Desk
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📍 भोपाल
नवरात्रि 2026: प्याज और लहसुन क्यों नहीं खाते भक्त? जानिए धार्मिक मान्यताएं और खान-पान से जुड़े कारण

12 अक्टूबर 2026। नवरात्रि में सात्विक भोजन का विशेष महत्व है। धार्मिक परंपराओं में प्याज और लहसुन को राजसिक या तामसिक माना जाता है। जानिए नौ दिनों के व्रत में इनसे परहेज करने के पीछे की मान्यताएं और खान-पान की परंपराएं।

भोपाल। शारदीय नवरात्रि हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। नौ दिनों तक चलने वाला यह पर्व मां दुर्गा के नौ स्वरूपों की पूजा और आराधना को समर्पित है। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु व्रत रखते हैं, मंदिरों में पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी दिनचर्या में संयम तथा सात्विकता को महत्व देते हैं।

नवरात्रि के दौरान कई भक्त मांसाहार, शराब और अन्य नशीले पदार्थों से दूरी बनाते हैं। इसके साथ ही, अनेक परिवारों में प्याज और लहसुन का सेवन भी नहीं किया जाता। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आम भारतीय भोजन का हिस्सा होने के बावजूद इन दोनों चीजों से नवरात्रि में परहेज क्यों किया जाता है? इसके पीछे धार्मिक मान्यताओं, आध्यात्मिक अनुशासन और पारंपरिक खान-पान से जुड़े कई कारण हैं।

सात्विक, राजसिक और तामसिक भोजन की अवधारणा

हिंदू धार्मिक और योग परंपराओं में भोजन को अक्सर तीन श्रेणियों में समझाया जाता है: सात्विक, राजसिक और तामसिक। इन श्रेणियों का संबंध केवल खाने की वस्तुओं से नहीं, बल्कि व्यक्ति के मन, व्यवहार और जीवनशैली पर उनके माने जाने वाले प्रभावों से भी है।

1. सात्विक भोजन: ताजे फल, दूध, दही, मेवे और परंपरा के अनुसार तैयार किया गया हल्का भोजन सात्विक आहार के उदाहरण माने जाते हैं। धार्मिक मान्यता है कि ऐसा भोजन मन में शांति, विचारों में स्पष्टता और आध्यात्मिक साधना के लिए अनुकूल वातावरण बनाने में मदद करता है।

2. राजसिक भोजन: पारंपरिक मान्यताओं में राजसिक भोजन को ऊर्जा, सक्रियता, इच्छाओं और उत्तेजना से जोड़ा जाता है। कुछ धार्मिक और योग परंपराएं मानती हैं कि इस प्रकार का भोजन ध्यान और मानसिक स्थिरता में बाधा डाल सकता है।

3. तामसिक भोजन: तामसिक भोजन को पारंपरिक रूप से सुस्ती, भारीपन और मानसिक जड़ता से जोड़ा जाता है। हालांकि, अलग-अलग धार्मिक परंपराओं में इस श्रेणी के अंतर्गत आने वाले खाद्य पदार्थों को लेकर मतभेद भी मिलते हैं।

इन मान्यताओं के अनुसार, नवरात्रि में सात्विक भोजन अपनाने का उद्देश्य शरीर के साथ-साथ मन को भी पूजा, ध्यान और आत्मसंयम के लिए तैयार करना है।

प्याज और लहसुन से क्यों किया जाता है परहेज?

प्याज और लहसुन भारतीय रसोई में व्यापक रूप से इस्तेमाल होते हैं। इसके बावजूद, सात्विक भोजन पर जोर देने वाली कई हिंदू धार्मिक और योग परंपराओं में इन्हें राजसिक या तामसिक श्रेणी से जोड़ा जाता है।

मान्यता है कि इनका सेवन मन में उत्तेजना या बेचैनी बढ़ा सकता है और आध्यात्मिक एकाग्रता को प्रभावित कर सकता है। इसी कारण कई श्रद्धालु नवरात्रि के नौ दिनों में प्याज और लहसुन के बिना भोजन तैयार करते हैं।

यह परंपरा सभी हिंदू परिवारों में समान रूप से लागू नहीं होती। कुछ लोग नवरात्रि में कठोर सात्विक आहार अपनाते हैं, जबकि अन्य अपनी पारिवारिक परंपराओं और व्रत के नियमों के अनुसार खान-पान तय करते हैं।

इसलिए प्याज और लहसुन का सेवन न करना मुख्य रूप से धार्मिक आस्था, व्यक्तिगत अनुशासन और प्रचलित परंपराओं से जुड़ा विषय है।

धार्मिक ग्रंथों और योग परंपराओं का क्या है संबंध?

भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में भोजन को शरीर की जरूरत पूरी करने के साथ-साथ मानसिक और आध्यात्मिक जीवन से भी जोड़कर देखा गया है। योग और आयुर्वेद से जुड़ी कुछ पारंपरिक आहार पद्धतियां भोजन की प्रकृति, मात्रा और उसे ग्रहण करने के तरीके पर विशेष जोर देती हैं।

इसी दृष्टिकोण के तहत साधना करने वाले कुछ लोग ऐसा भोजन चुनते हैं, जिसे वे ध्यान और आत्मसंयम के लिए अनुकूल मानते हैं। प्याज और लहसुन से परहेज भी कई समुदायों में इसी आहार परंपरा का हिस्सा है।

हालांकि, सभी हिंदू धार्मिक ग्रंथों या संप्रदायों में प्याज और लहसुन को लेकर एक समान नियम नहीं है। इसलिए इसे हर श्रद्धालु के लिए अनिवार्य धार्मिक प्रतिबंध मानना सही नहीं होगा।

क्या मौसम में बदलाव भी है इसकी वजह?

शारदीय नवरात्रि आमतौर पर सितंबर-अक्टूबर या अक्टूबर के आसपास आती है। भारत के कई हिस्सों में इस समय मौसम में बदलाव होने लगता है। तापमान, आर्द्रता और खान-पान की दिनचर्या में परिवर्तन के कारण कुछ लोगों को पाचन संबंधी परेशानी महसूस हो सकती है।

नवरात्रि के दौरान हल्का भोजन करना, पर्याप्त पानी पीना और भोजन की मात्रा पर ध्यान देना कई लोगों के लिए उपयोगी हो सकता है। हालांकि, प्याज और लहसुन छोड़ने से मौसम के कारण होने वाली बीमारियों से बचाव होता है या इससे प्रतिरक्षा प्रणाली मजबूत होती है, इस दावे के लिए पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं।

प्याज और लहसुन में कुछ उपयोगी पोषक तत्व और जैव सक्रिय यौगिक पाए जाते हैं। इसलिए इन्हें सामान्य रूप से अस्वास्थ्यकर मानना भी उचित नहीं है। नवरात्रि में इनसे परहेज करने का प्रमुख कारण कई परिवारों में धार्मिक और पारंपरिक आहार नियम हैं।

नवरात्रि में क्या खा सकते हैं?

व्रत रखने वाले श्रद्धालु अपनी परंपरा और व्रत के नियमों के अनुसार अलग-अलग खाद्य पदार्थों का सेवन करते हैं। आमतौर पर निम्नलिखित चीजें नवरात्रि के व्रत में खाई जाती हैं:

फल: सेब, केला, पपीता, अनार और मौसमी फल।

डेयरी उत्पाद: दूध, दही और पनीर, यदि व्यक्ति के व्रत के नियमों में अनुमति हो।

मेवे: बादाम, अखरोट, काजू और अन्य सूखे मेवे।

व्रत में इस्तेमाल होने वाले अनाज और आटे: कुट्टू का आटा, सिंघाड़े का आटा और कुछ परंपराओं में राजगीरा।

अन्य खाद्य पदार्थ: साबूदाना, आलू और शकरकंद।

नमक: कई श्रद्धालु साधारण नमक की जगह सेंधा नमक इस्तेमाल करते हैं।

व्रत के दौरान भोजन की गुणवत्ता और संतुलन का भी ध्यान रखना चाहिए। बहुत अधिक तला हुआ भोजन खाने के बजाय फल, दही, मेवे और अन्य अनुमत खाद्य पदार्थों को संतुलित मात्रा में लेना बेहतर हो सकता है। जिन लोगों को मधुमेह या दूसरी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं हैं, उन्हें अपने खान-पान में बड़े बदलाव करने से पहले चिकित्सकीय सलाह लेनी चाहिए।

आस्था, अनुशासन और सात्विकता का पर्व है नवरात्रि

नवरात्रि केवल पूजा-पाठ और व्रत तक सीमित नहीं है। यह आत्मसंयम, सकारात्मक सोच, सेवा और अपनी दिनचर्या को अनुशासित करने का अवसर भी है। प्याज और लहसुन से परहेज करने वाले श्रद्धालुओं के लिए यह उनकी धार्मिक आस्था और पारिवारिक परंपरा का हिस्सा है।

अंततः, नवरात्रि में खान-पान के नियम व्यक्ति की धार्मिक मान्यताओं, व्रत की परंपरा और स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं। सात्विक भोजन अपनाने का उद्देश्य श्रद्धालुओं के लिए पूजा और साधना के दौरान संयम तथा एकाग्रता को महत्व देना है।

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