यूरोप से रूस के बिगड़ते संबंधों के बीच एशिया की ओर बढ़ रहा मॉस्को का झुकाव, भारत ने मजबूत रणनीतिक साझेदारी को बताया दोनों देशों और वैश्विक स्थिरता के हित में
14 अक्टूबर 2026। भारतीय विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा है कि रूस के लिए भारत एक ‘स्वाभाविक साझेदार’ बना हुआ है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बदलती वैश्विक परिस्थितियों और यूरोपीय देशों के साथ रूस के तनावपूर्ण संबंधों के बीच मॉस्को के साथ भारत की मजबूत साझेदारी बनाए रखना दोनों देशों के साथ-साथ पूरी दुनिया के हित में है।
मंगलवार को नई दिल्ली में आयोजित ब्लूमबर्ग न्यू इकोनॉमी फोरम में बोलते हुए जयशंकर ने कहा कि यूरोप के साथ रूस के संबंध काफी हद तक टूट चुके हैं और उनमें कड़वाहट बढ़ी है। ऐसे में मॉस्को को एशियाई देशों के साथ अपने संबंध मजबूत करने की जरूरत महसूस हो रही है। इस प्रक्रिया में चीन की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो गई है।
यूरोप से दूरी, एशिया की ओर रूस का बढ़ता रुझान
जयशंकर के मुताबिक, रूस ऐतिहासिक रूप से खुद को यूरोप का हिस्सा मानता रहा है। वह यूरोपीय देशों के साथ-साथ अमेरिका के साथ भी संबंधों को महत्व देता था। हालांकि, यूक्रेन संघर्ष के बाद पश्चिमी देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों ने रूस की रणनीतिक प्राथमिकताओं को प्रभावित किया है और उसे एशिया की ओर अधिक ध्यान देने के लिए प्रेरित किया है।
इसी बीच, यूरोपीय संघ ने सोमवार को रूस की 826 कंपनियों और 743 अधिकारियों पर नए प्रतिबंध लगाए। यूरोपीय संघ के अनुसार, इन प्रतिबंधों का उद्देश्य यूक्रेन संघर्ष को लेकर मॉस्को पर दबाव बढ़ाना है। पश्चिमी देशों और रूस के बीच बढ़ते तनाव ने वैश्विक कूटनीति में एशियाई देशों की भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया है।
भारत को बताया रूस का स्वाभाविक विकल्प
विदेश मंत्री ने कहा कि रूस के पास विभिन्न विकल्प बने रहना और वह एशिया की अन्य प्रमुख शक्तियों के साथ मजबूत साझेदारी विकसित कर सके, यह भारत और अंतरराष्ट्रीय समुदाय दोनों के हित में है।
भारत और रूस के बीच दशकों से चले आ रहे संबंधों का उल्लेख करते हुए जयशंकर ने कहा कि दोनों देशों के बीच लंबे समय से भरोसे और सहयोग पर आधारित साझेदारी रही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि वैश्विक व्यवस्था में बदलाव और रूस की रणनीतिक जरूरतों के बावजूद भारत के साथ उसके संबंधों की अहमियत बनी हुई है।
जयशंकर के अनुसार, भारत ने लगातार यह भरोसा बनाए रखा है कि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां चाहे जितनी बदलें, दोनों देशों की पुरानी साझेदारी कायम रहेगी। उन्होंने यह भी कहा कि इस रिश्ते से भारत और रूस दोनों को लाभ हुआ है तथा एशिया में शक्ति संतुलन बनाए रखने में भी मदद मिली है।
रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष सहयोग रिश्तों की मजबूत नींव
भारत और रूस के संबंध केवल कूटनीतिक संपर्क तक सीमित नहीं हैं। रक्षा, ऊर्जा और अंतरिक्ष जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में दोनों देशों का लंबे समय से सहयोग रहा है।
वर्ष 2000 में दोनों देशों ने रणनीतिक साझेदारी को औपचारिक रूप दिया था। इसके बाद 2010 में इस संबंध को ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा दिया गया। यह दर्जा दोनों देशों के बीच व्यापक सहयोग और आपसी विश्वास को दर्शाता है।
रक्षा क्षेत्र में रूस भारत का एक महत्वपूर्ण सहयोगी रहा है, जबकि ऊर्जा क्षेत्र में रूसी तेल की आपूर्ति ने द्विपक्षीय व्यापार को नई गति दी है। अमेरिका के दबाव के बावजूद भारत ने अपनी ऊर्जा जरूरतों और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए रूस से तेल आयात जारी रखा है।
2030 तक 100 अरब डॉलर के व्यापार का लक्ष्य
भारत और रूस ने वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 100 अरब डॉलर तक पहुंचाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। वित्त वर्ष 2024-25 में दोनों देशों के बीच व्यापार का आंकड़ा 68.7 अरब डॉलर रहा था।
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए दोनों देशों को व्यापार में असंतुलन कम करने, नए क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने और आर्थिक संबंधों को अधिक व्यापक बनाने की जरूरत होगी। ऊर्जा और रक्षा के अलावा अन्य क्षेत्रों में व्यापार बढ़ाना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण हो सकता है।
यूक्रेन संघर्ष पर बातचीत और कूटनीति का समर्थन
भारत ने यूक्रेन संघर्ष के समाधान के लिए लगातार बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है। नई दिल्ली का मानना है कि युद्ध समाप्त करने और स्थायी शांति स्थापित करने के लिए संवाद ही सबसे प्रभावी रास्ता है।
भारत ने पश्चिमी देशों और रूस के साथ अपने संबंधों में संतुलन बनाए रखने की कोशिश की है। एक ओर वह यूरोप और अमेरिका के साथ आर्थिक, तकनीकी तथा रणनीतिक सहयोग बढ़ा रहा है, वहीं दूसरी ओर रूस के साथ अपने पारंपरिक संबंधों को भी महत्व देता है।
जयशंकर के बयान से स्पष्ट है कि भारत रूस के साथ अपने संबंधों को केवल ऐतिहासिक विरासत के रूप में नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में रणनीतिक महत्व रखने वाली साझेदारी के रूप में देखता है। भारत के लिए चुनौती यह है कि वह अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए प्रमुख वैश्विक शक्तियों के साथ संतुलित संबंध बनाए रखे।