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भारत स्वस्तिक यात्रा की ओंकारेश्वर में रामकथा ने आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक विरासत को किया रेखांकित

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Digital Desk
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📍 भोपाल
भारत स्वस्तिक यात्रा की ओंकारेश्वर में रामकथा ने आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक विरासत को किया रेखांकित

पूज्य मोरारी बापू की पावन यात्रा में भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक और आदि शंकराचार्य की आध्यात्मिक यात्रा से जुड़े महत्वपूर्ण केंद्र ओंकारेश्वर की महिमा का स्मरण

ओंकारेश्वर, 15 अक्टूबर, 2026। भारत स्वस्तिक यात्रा के अंतर्गत मध्य प्रदेश के ओंकारेश्वर में पूज्य मोरारी बापू की रामकथा का आयोजन किया गया। ओंकारेश्वर भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। पवित्र नर्मदा नदी में स्थित मांधाता द्वीप पर बसा ओंकारेश्वर, शिव उपासना की प्राचीन परंपराओं और आदि शंकराचार्य से जुड़े अपने आध्यात्मिक संबंध के कारण भारत की आध्यात्मिक विरासत में विशिष्ट स्थान रखता है।

परंपरागत मान्यता के अनुसार, बाल्यावस्था में आदि शंकराचार्य की भेंट नर्मदा तट पर स्थित एक गुफा में उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद से हुई थी, जहां उन्होंने उनसे आध्यात्मिक शिक्षा प्राप्त की। इस कारण ओंकारेश्वर केवल एक ज्योतिर्लिंग क्षेत्र ही नहीं, बल्कि अद्वैत वेदांत की गुरु-शिष्य परंपरा का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां ओंकारेश्वर और ममलेश्वर मंदिर, नर्मदा के घाट तथा पारंपरिक मांधाता परिक्रमा इस पवित्र क्षेत्र की आध्यात्मिक महत्ता को दर्शाते हैं।

पूज्य मोरारी बापू ने कहा, “साधु की पहचान उसके स्वभाव से होती है। ये नवरात्रि के दिन हैं, जो शक्ति उपासना अर्थात् जगदंबा की आराधना के लिए समर्पित हैं। यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज भी हमारे देश के अनेक हिस्सों और कई मंदिरों में बलि प्रथा अर्थात् पशु बलि की परंपरा जारी है। मैंने इस प्रथा को बंद करने की अपील की। शक्ति की उपासना में समस्त जीवों के प्रति करुणा और श्रद्धा का भाव होना चाहिए।

कथा में मैंने अभिमान के विभिन्न रूपों पर भी चर्चा की। इन सभी में सबसे श्रेष्ठ अवस्था निरभिमान है, अर्थात् अहंकार से मुक्त होना। किसी व्यक्ति के पास कोई योग्यता, ज्ञान या संपत्ति हो और उसके कारण उसमें अभिमान आ जाए, तो यह भी उचित नहीं है, हालांकि यह समझा जा सकता है कि ऐसा अभिमान कहां से उत्पन्न हुआ। लेकिन किसी व्यक्ति के पास कुछ भी न हो और फिर भी वह अभिमान करे, तो यह और भी दुर्भाग्यपूर्ण है। सच्ची महानता विनम्रता में निहित है।

ओंकार का स्वस्तिक से गहरा संबंध है और यह आदि नाद का प्रतीक है। सनातन धर्म में ओंकारेश्वर की भूमि का अत्यंत विशिष्ट महत्व है, क्योंकि इसका संबंध आदि शंकराचार्य और उनके गुरु गोविंद भगवत्पाद की भेंट से है। शंकराचार्य की आध्यात्मिक यात्रा को दिशा देने वाली गुरु-शिष्य परंपरा की एक महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति इसी पवित्र भूमि में दिखाई देती है। इस पावन भूमि पर आकर हमें अपनी आध्यात्मिक विरासत की गहराई और उसके शाश्वत मूल्यों को संरक्षित रखने के महत्व का स्मरण होता है।”

आदि शंकराचार्य की जन्मस्थली से जुड़े कालड़ी और उनके द्वारा स्थापित चार पीठों में से एक शृंगेरी की यात्रा के बाद, ओंकारेश्वर में भारत स्वस्तिक यात्रा का पड़ाव उनकी आध्यात्मिक विरासत से जुड़ाव का एक और महत्वपूर्ण अध्याय है।

भारत स्वस्तिक यात्रा का आयोजन पूज्य मोरारी बापू के मार्गदर्शन में संतकृपा सनातन संस्थान द्वारा किया जा रहा है।

मिराज समूह के चेयरमैन एवं संतकृपा सनातन संस्थान के प्रबंध न्यासी मदन पालीवाल ने कहा, “ओंकारेश्वर भारत की आध्यात्मिक विरासत में एक विशिष्ट स्थान रखता है। यहां भगवान शिव के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक के साथ-साथ आदि शंकराचार्य की पवित्र विरासत भी जुड़ी हुई है। भारत स्वस्तिक यात्रा के माध्यम से हमारा प्रयास है कि इन परस्पर जुड़ी आध्यात्मिक परंपराओं को सामने लाया जाए और उनकी शाश्वत प्रासंगिकता को पुनः स्थापित किया जाए।”

मंगल और कल्याण का चिरस्थायी प्रतीक स्वस्तिक परस्पर जुड़ाव और सामूहिक कल्याण का प्रतिनिधित्व करता है। इस यात्रा के माध्यम से पूज्य मोरारी बापू सनातन धर्म के शाश्वत मूल्यों—सत्य, प्रेम और करुणा—का संदेश जन-जन तक पहुंचाना चाहते हैं। साथ ही, इस यात्रा का उद्देश्य भारत की राष्ट्रीय एकता, अखंडता और देशवासियों के बीच अपनत्व की साझा भावना को सुदृढ़ करना है।

9,000 किलोमीटर लंबी भारत स्वस्तिक यात्रा में लगभग 900 श्रद्धालु पूज्य मोरारी बापू के साथ दो विशेष ट्रेनों—22 कोच वाली कैलाश भारत गौरव और 16 कोच वाली चित्रकूट भारत गौरव—में यात्रा कर रहे हैं। यात्रा के प्रथम चरण का शुभारंभ 10 अक्टूबर को कन्याकुमारी से हुआ था, जिसका समापन 23 अक्टूबर को केदारनाथ में होगा। इस दौरान देश के विभिन्न महत्वपूर्ण आध्यात्मिक एवं सांस्कृतिक केंद्रों से होकर यात्रा आगे बढ़ रही है।

यात्रा के अंतर्गत आयोजित रामकथा और अन्य कार्यक्रम सभी के लिए खुले हैं। समावेशिता और सेवा की अपनी परंपरा के अनुरूप, पूज्य बापू की प्रेरणा से प्रत्येक पड़ाव पर भंडारे का आयोजन किया जाएगा, जहां प्रतिदिन निःशुल्क शाकाहारी भोजन प्रसाद के रूप में वितरित किया जाएगा।

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