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युद्ध की तैयारी: ऑनलाइन विज्ञापनों के जरिए वैश्विक निगरानी अभियान चलाने का आरोप, जांच में इजरायली कंपनी का नाम

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Digital Desk
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📍 भोपाल
युद्ध की तैयारी: ऑनलाइन विज्ञापनों के जरिए वैश्विक निगरानी अभियान चलाने का आरोप, जांच में इजरायली कंपनी का नाम

बिना किसी लिंक पर क्लिक किए मोबाइल और अन्य डिवाइस में पहुंचाया गया स्पाइवेयर, अल जज़ीरा के कर्मचारियों को भी बनाया गया निशाना

18 अक्टूबर 2026। ऑनलाइन विज्ञापन दिखाने वाली तकनीक का इस्तेमाल अब साइबर जासूसी और निगरानी के लिए भी किए जाने का गंभीर मामला सामने आया है। कनाडा की साइबर सुरक्षा अनुसंधान संस्था सिटीजन लैब और न्यूयॉर्क स्थित विज्ञापन सुरक्षा कंपनी कॉन्फिएंट की जांच में आरोप लगाया गया है कि इजरायली विज्ञापन तकनीक कंपनी डिस्कवर-टेक ने डिजिटल विज्ञापन नेटवर्क का दुरुपयोग कर दुनियाभर में लक्षित लोगों की गतिविधियों पर नजर रखी और उनके उपकरणों तक स्पाइवेयर पहुंचाने में मदद की।

शोधकर्ताओं के मुताबिक, इस अभियान में अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क अल जज़ीरा के कर्मचारियों समेत कई संस्थाओं से जुड़े लोगों के उपकरणों को निशाना बनाया गया। हमले की खास बात यह थी कि दुर्भावनापूर्ण विज्ञापन सामान्य विज्ञापनों की तरह दिखाई देते थे। उपयोगकर्ताओं को न तो किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने की जरूरत थी और न ही स्क्रीन पर कोई पॉप-अप दिखाई देता था।

विज्ञापन नेटवर्क को बनाया निगरानी का हथियार

कॉन्फिएंट की जांच के अनुसार, डिस्कवर-टेक ने ऑनलाइन विज्ञापन नेटवर्क का इस्तेमाल संभावित लक्ष्यों की पहचान करने, उनकी गतिविधियों पर नजर रखने और उनके उपकरणों तक हानिकारक कोड पहुंचाने के लिए किया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि इस अभियान में शुरुआती लक्ष्य चयन, हमले की तैयारी और स्पाइवेयर पहुंचाने के लिए विज्ञापन तकनीक का योजनाबद्ध तरीके से इस्तेमाल किया गया। इसमें पहचान से बचने के उन्नत उपाय और बेहद सटीक तरीके से चुनिंदा लोगों को निशाना बनाने की क्षमता शामिल थी।

इस मामले ने डिजिटल विज्ञापन उद्योग की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। आमतौर पर विज्ञापन नेटवर्क का इस्तेमाल उत्पादों और सेवाओं के प्रचार के लिए किया जाता है, लेकिन जांच के निष्कर्षों के मुताबिक, इसी व्यवस्था को निगरानी और साइबर हमलों के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया गया।

अल जज़ीरा के कर्मचारियों के उपकरण भी निशाने पर

कतर स्थित अंतरराष्ट्रीय समाचार नेटवर्क अल जज़ीरा के कर्मचारियों के उपकरणों को भी कथित तौर पर दुर्भावनापूर्ण विज्ञापनों के जरिए निशाना बनाया गया।

अल जज़ीरा ने अपने कर्मचारियों के खिलाफ स्पाइवेयर हमलों की निंदा करते हुए इन्हें प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया और जिम्मेदार लोगों को जवाबदेह ठहराने की मांग की।

पत्रकारों और मीडिया संस्थानों को निशाना बनाने के आरोपों ने इस मामले को और गंभीर बना दिया है। यदि विज्ञापनों के माध्यम से किसी उपकरण में स्पाइवेयर पहुंचाया जा सकता है, तो पत्रकारों के स्रोतों, गोपनीय बातचीत और संवेदनशील दस्तावेजों की सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है।

कैंडिरू और अन्य निगरानी कंपनियों से कथित संबंध

जांच में इस गतिविधि के संबंध इजरायली स्पाइवेयर डेवलपर कैंडिरू से भी जोड़े गए हैं। कैंडिरू का नाम अमेरिकी प्रतिबंध सूची में शामिल किए जाने की बात रिपोर्ट में कही गई है। कंपनी अब इंटीग्रिटी लैब्स नाम से जानी जाती है।

इसके अलावा, इजरायली निगरानी तकनीक प्रदाता इंटेलोस से भी कथित संबंध सामने आए हैं। जांचकर्ताओं के आरोपों के अनुसार, विज्ञापन नेटवर्क के जरिए उपयोगकर्ताओं को ट्रैक करने और उनके उपकरणों तक पहुंच बनाने के लिए प्रमुख डिजिटल विज्ञापन प्लेटफॉर्मों की विज्ञापन इन्वेंट्री का दुरुपयोग किया गया।

इनमें गूगल, रूस का यांडेक्स और अमेरिकी विज्ञापन तकनीक प्लेटफॉर्म बीजवैक्स शामिल हैं। हालांकि, किसी विज्ञापन प्लेटफॉर्म का नाम जांच में सामने आने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि उस प्लेटफॉर्म ने जानबूझकर इस गतिविधि में सहयोग किया।

चार महीने में 2 लाख वेबसाइटों तक पहुंच

कॉन्फिएंट के अनुसार, डिस्कवर-टेक ने कंट्रोलियम नामक सिस्टम के माध्यम से सामान्य विज्ञापन नीलामी प्रक्रिया का इस्तेमाल कथित निगरानी अभियान के लिए किया।

जांच में सामने आए आंकड़ों के मुताबिक, चार महीनों के दौरान इस गतिविधि का दायरा दर्जनों देशों की लगभग 2 लाख वेबसाइटों और एंड्रॉयड तथा आईओएस उपकरणों पर उपलब्ध मोबाइल ऐप तक पहुंच गया।

रिपोर्ट के अनुसार, कंपनी प्रतिदिन लगभग एक करोड़ विज्ञापन इंप्रेशन उत्पन्न कर रही थी। इस प्रक्रिया में डिवाइस फिंगरप्रिंट, आईपी एड्रेस, प्रमाणीकरण टोकन, कुकीज और अन्य व्यक्तिगत जानकारी एकत्र किए जाने के आरोप हैं।

डिवाइस फिंगरप्रिंट ऐसी तकनीक है, जिसके जरिए किसी डिवाइस की विशिष्ट विशेषताओं के आधार पर उसकी पहचान करने या उसे दूसरी गतिविधियों से जोड़ने की कोशिश की जा सकती है। आईपी एड्रेस और अन्य डिजिटल संकेतों के साथ मिलाकर इस्तेमाल किए जाने पर इस तरह की जानकारी किसी व्यक्ति की ऑनलाइन गतिविधियों का पता लगाने में मदद कर सकती है।

शोधकर्ताओं ने यह भी आरोप लगाया कि कुछ मामलों में यूरोपीय संघ के डेटा संरक्षण नियमों के तहत आवश्यक सहमति के बिना व्यक्तिगत जानकारी एकत्र की गई।

मोबाइल विज्ञापन आईडी को फोन नंबरों से जोड़ने का आरोप

सिटीजन लैब ने डिस्कवर-टेक से जुड़े एक समूह की पहचान की, जिसे शोधकर्ताओं ने 'डार्क कार्टोग्राफर' नाम दिया।

जांच के मुताबिक, इस समूह पर मोबाइल नेटवर्क ऑपरेटरों की कमजोरियों का फायदा उठाकर विज्ञापन आईडी को फोन नंबरों से जोड़ने का आरोप है। ऐसा होने पर किसी मोबाइल डिवाइस की विज्ञापन पहचान को उसके उपयोगकर्ता की वास्तविक पहचान से जोड़ना आसान हो सकता है।

इस तकनीक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर मोबाइल उपयोगकर्ताओं की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए किया जा सकता है। इससे विज्ञापन और निगरानी के बीच की सीमा धुंधली होने के साथ-साथ व्यक्तिगत गोपनीयता को भी गंभीर खतरा पैदा होता है।

फिलिस्तीन सबसे अधिक लक्षित क्षेत्रों में शामिल

भौगोलिक आंकड़ों के विश्लेषण में कुछ क्षेत्रों में विज्ञापन ट्रैफिक में असामान्य वृद्धि दर्ज की गई। शोधकर्ताओं का मानना है कि इन पैटर्न से सामान्य व्यावसायिक विज्ञापन के बजाय लक्षित खुफिया जानकारी जुटाने की गतिविधियों की आशंका मजबूत होती है।

रिपोर्ट के अनुसार, फिलिस्तीन इस अभियान के सबसे अधिक लक्षित क्षेत्रों में शामिल था। वहां डिस्कवर-टेक के विज्ञापन इंप्रेशन में उसका हिस्सा सामान्य अवधि में लगभग 2 प्रतिशत था, जो 7 अप्रैल को बढ़कर करीब 10 प्रतिशत हो गया।

जांच में आर्मेनिया के प्रधानमंत्री कार्यालय, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, अदालतों, विश्वविद्यालयों और रक्षा संस्थानों से जुड़े संवेदनशील नेटवर्कों तक गतिविधि पहुंचने के संकेत भी मिले।

शोधकर्ताओं ने नौ देशों में कैंडिरू के सर्वरों से जुड़े लक्षित कनेक्शनों का पता लगाने का दावा किया। रिपोर्ट में दर्ज गतिविधि में बेल्जियम की हिस्सेदारी 56 प्रतिशत बताई गई। इसके बाद संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब, बहरीन, मैक्सिको और स्पेन का उल्लेख किया गया।

'एडफेक्शन' से बढ़ा साइबर सुरक्षा का खतरा

सिटीजन लैब के अनुसार, इस जांच ने सार्वजनिक रूप से तकनीकी सबूत प्रस्तुत किए कि ऑनलाइन विज्ञापनों का इस्तेमाल उपयोगकर्ता के किसी लिंक पर क्लिक किए बिना भी स्पाइवेयर पहुंचाने के लिए किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इस तरीके को 'एडफेक्शन' नाम दिया है।

यह तकनीक पारंपरिक साइबर हमलों से अलग है, क्योंकि इसमें उपयोगकर्ता की गलती या संदिग्ध लिंक खोलने पर निर्भर रहने के बजाय विज्ञापन दिखाने की प्रक्रिया को ही हमले का माध्यम बनाया जा सकता है।

यदि ऐसे हमले बड़े पैमाने पर किए जाएं, तो पत्रकारों, सरकारी अधिकारियों, शोधकर्ताओं, कारोबारी संगठनों और आम नागरिकों के लिए खतरा बढ़ सकता है। साथ ही, डिजिटल विज्ञापन कंपनियों और मोबाइल ऐप प्लेटफॉर्मों के लिए विज्ञापन आपूर्ति श्रृंखला की निगरानी और सुरक्षा जांच अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है।

इस मामले से एक बुनियादी सवाल उठता है: क्या ऑनलाइन विज्ञापन देखने भर से किसी व्यक्ति का उपकरण साइबर जासूसी का शिकार बन सकता है? सिटीजन लैब और कॉन्फिएंट की जांच के निष्कर्ष बताते हैं कि कुछ परिस्थितियों में ऐसा संभव हो सकता है। हालांकि, इन निष्कर्षों के आधार पर प्रत्येक विज्ञापन या विज्ञापन प्लेटफॉर्म को असुरक्षित मानना उचित नहीं होगा।

यह मामला डिजिटल विज्ञापन तकनीक के दुरुपयोग, साइबर निगरानी और प्रेस की स्वतंत्रता के बीच बढ़ते टकराव को उजागर करता है। जांच में लगाए गए आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित कंपनियों की प्रतिक्रियाएं इस पूरे मामले को समझने के लिए महत्वपूर्ण होंगी।

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