19 अक्टूबर 2026। विवादित मतदाता सूची को लेकर देश में जारी राजनीतिक विरोध के बीच भारत सरकार ने सोशल मीडिया कंपनी मेटा से फेसबुक और इंस्टाग्राम पर सामग्री दिखाने और उसकी सिफारिश करने वाले एल्गोरिदम की समीक्षा करने को कहा है। सरकार की चिंता है कि इन प्लेटफॉर्म पर भ्रामक, अधूरी या संदर्भ से हटाकर पेश की गई सामग्री को जरूरत से ज्यादा बढ़ावा मिल सकता है।
समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के मुताबिक, इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की ओर से 10 अक्टूबर को जारी एक एडवाइजरी में कंटेंट रैंकिंग सिस्टम में बदलाव करने की मांग की गई है। इसका उद्देश्य ऐसी सामग्री के बार-बार सामने आने पर रोक लगाना है, जो गलत जानकारी फैलाती है या किसी घटना की वास्तविक परिस्थितियों को छिपाकर प्रस्तुत करती है।
सरकार ने मेटा से इस मामले में तत्काल कदम उठाने और की गई कार्रवाई का विवरण मंत्रालय को उपलब्ध कराने को कहा है।
मतदाता सूची के विवाद के बीच आई एडवाइजरी
यह कदम ऐसे समय उठाया गया है, जब देशभर में मतदाता सूची के पुनरीक्षण को लेकर राजनीतिक विवाद जारी है। इस प्रक्रिया के विरोध में युवा नेतृत्व वाली कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) और विपक्षी दलों के प्रदर्शन की खबरें सामने आई हैं। प्रदर्शनकारियों की ओर से मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग भी की गई है।
विपक्षी दलों और कुछ समूहों का आरोप है कि मतदाता सूची के पुनरीक्षण के कारण पात्र मतदाताओं के नाम हटाए जा रहे हैं और इस प्रक्रिया से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को राजनीतिक लाभ मिल सकता है।
हालांकि, चुनाव आयोग और भाजपा ने मतदाता सूची में हेरफेर के आरोपों को खारिज किया है। मंत्रालय की एडवाइजरी में भी इस विरोध प्रदर्शन को कार्रवाई का प्रत्यक्ष कारण नहीं बताया गया है।
एल्गोरिदम पर सरकार की क्या है आपत्ति?
सरकार की ओर से जारी दस्तावेज में कहा गया है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर उपयोगकर्ताओं को किसी एक या सीमित संख्या में विचारों और कथाओं से बार-बार प्रभावित नहीं होना चाहिए। इसके बजाय, उन्हें विश्वसनीय जानकारी के विभिन्न स्रोतों तक पहुंच मिलनी चाहिए।
पीटीआई ने मंत्रालय के सूत्रों के हवाले से बताया कि सरकारी एजेंसियों से ऐसी रिपोर्ट मिली थीं, जिनमें आरोप लगाया गया था कि मेटा के एल्गोरिदम कुछ खास तरह की सामग्री को दूसरों की तुलना में अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं।
मंत्रालय ने विशेष रूप से सार्वजनिक घटनाओं से संबंधित वीडियो, तस्वीरों और ग्राफिक्स पर चिंता जताई है। इनमें पुलिस की कार्रवाई, प्रतिबंधों और प्रशासनिक कदमों से जुड़ी सामग्री शामिल है, जिसे पर्याप्त पृष्ठभूमि या संदर्भ के बिना प्रसारित किया जा सकता है।
एडवाइजरी में पुराने वीडियो और तस्वीरों को मौजूदा घटनाओं के रूप में पेश किए जाने तथा चुनिंदा हिस्सों को संपादित करके भ्रामक संदेश फैलाने के मामलों की कड़ी जांच करने की बात कही गई है। सरकारी कार्रवाई से जुड़े अपुष्ट दावों पर भी निगरानी बढ़ाने का अनुरोध किया गया है।
संभावित नुकसान पहुंचाने वाली सामग्री पर तेज कार्रवाई
सरकार ने मेटा से ऐसी सामग्री की पहचान तेजी से करने को कहा है, जो कम समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच रही हो और संभावित रूप से नुकसान पहुंचा सकती हो। इसके साथ ही कंपनी को भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी कानूनों के तहत अधिकृत कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ सहयोग करने के लिए भी कहा गया है।
यह निर्देश 8 अक्टूबर को सोशल मीडिया कंपनियों के लिए जारी व्यापक एडवाइजरी के बाद आया है। उस एडवाइजरी में सरकारी एजेंसियों की शिकायतों को प्राथमिकता देने और सार्वजनिक घटनाओं से जुड़ी भ्रामक या छेड़छाड़ की गई सामग्री पर उचित लेबल लगाने की बात कही गई थी।
इससे सोशल मीडिया कंपनियों पर सामग्री की निगरानी और शिकायतों के निपटारे को लेकर सरकारी अपेक्षाएं बढ़ती दिखाई दे रही हैं।
इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन ने उठाए सवाल
सरकार की इस पहल पर डिजिटल अधिकारों से जुड़े संगठनों ने चिंता जताई है। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक-निदेशक अपार गुप्ता ने कहा कि भले ही एडवाइजरी कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है, लेकिन इसका प्रभाव सामग्री पर सेंसरशिप जारी रखने के निर्देश जैसा हो सकता है।
उन्होंने सरकार से एडवाइजरी वापस लेने और मेटा से यह सार्वजनिक करने का आग्रह किया कि इसके प्रावधानों के तहत कितनी सामग्री हटाई गई या उसकी पहुंच कम की गई।
इस आपत्ति के पीछे मुख्य चिंता यह है कि भ्रामक जानकारी पर रोक लगाने के नाम पर कहीं वैध राजनीतिक आलोचना, पत्रकारिता और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रभावित न हो जाए।
सरकार का तर्क: सार्वजनिक व्यवस्था की सुरक्षा
इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का कहना है कि इन उपायों का उद्देश्य सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना है, साथ ही वैध अभिव्यक्ति के अधिकार का सम्मान भी सुनिश्चित करना है।
हालांकि, इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि सोशल मीडिया पर गलत और भ्रामक जानकारी को रोकने के प्रयासों तथा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाएगा। फेसबुक और इंस्टाग्राम जैसे प्लेटफॉर्म पर एल्गोरिदम किस सामग्री को कितने लोगों तक पहुंचाते हैं, यह अब केवल तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है। चुनावी माहौल में इसका राजनीतिक और लोकतांत्रिक प्रभाव भी महत्वपूर्ण हो सकता है।