शिशु वाटिका: जहां संस्कारी और स्वावलंबी बनाया जाता है बच्चों को

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Bhopal: खेल खेल में दी जाती है शिक्षा
भोपाल में आदर्श बैग लेस स्कूल ले रहा आकार...

16 दिसंबर 2017। बच्चों की ज्ञानेंद्रियों और कर्मेंद्रियों का विकास संस्कारित तरीके से करने और उन्हें स्वावलंबी बनाने के उद्देश्य से विद्या भारती ने शिशु वाटिका का एक नया प्रकल्प तैयार किया है। जहां 3 वर्ष के उपरांत बच्चों को वेदों पर आधारित षोडस संस्कार सिखाये जाते है।यज्ञ -हवन, कुश्ती, वाद्ययंत्रों और कठपुतली के खेल से कठिन शिक्षा की राह आसान बनाई जाती हैं ।ऐसी शिक्षा जो लव कुश, ध्रुव और प्रहलाद जैसे बालकों का निर्माण करते हैं।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विद्या भारती गांधीनगर (गुजरात प्रान्त) में 12 वर्ष पूर्व एक परिकल्पना को नरेंद्र मोदी ने साकार रुप दिया, अब इसे मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल मे पुष्पित-पल्लवित किया जा रहा है। सरस्वती शिशु मंदिर हर्षवर्धन नगर में शिशु वाटिका का प्रकल्प विस्तार ले रहा हैं।जहां विज्ञान प्रयोगशाला, वस्तु संग्रहालय, चित्र पुस्तकालय, चिड़ियाघर, रंगमंच कार्यशाला, कला शाला, तरणताल, बागवानी और प्रदर्शनी के जरिए बच्चों में शिक्षा का संचार किया जाता है। बालकों में बुद्धि का विकास हो इसलिए परिवेश सुसंगत वैज्ञानिक घटनाओं के आधार पर दिया जाता है। उद्योग के बिना बालक का जीवन अधूरा है इसलिए पहली से आठवीं कक्षा तक बढ़ते क्रम में उद्योग आधारित शिक्षण व्यवस्था शिशु वाटिका का एक हिस्सा है। भारतीय संस्कारों से ओतप्रोत एवं गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा देने का संकल्प लिया गया है इस वाटिका में। शिक्षाविदों खासकर भारत के पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम के "बेग लेस" एजुकेशन को अपनाया गया है।

शिशु वाटिका के मध्य भारत प्रान्त सह प्रमुख दीदी नम्रता तिवारी और रेखा तिवारी ने वर्ष 2015 में गुजरात के गांधीनगर से इस पाठ्यक्रम का प्रशिक्षण लेकर वर्तमान में 56 बच्चों को शिक्षा दे रही है। वाटिका के प्रधानाचार्य रतन सिंह मालवीय के अनुसार 12 शैक्षणिक व्यवस्था स्कूल में तैयार की गई है, जिसके आधार पर बच्चों की नींव मजबूत कराई जाती है, ताकि वह भविष्य में शिक्षण और प्रशिक्षण में अव्वल रहे। यहां विद्या अध्ययन में छोटे बच्चों को दबाव और तनाव नहीं देते बल्कि उन्हें खेल-खेल में जीवन की सच्चाइयों में अवगत कराया जाता है।

देश का भविष्य रट्टू तोता नहीं बल्कि सम्पूर्ण व्यक्ति बने, वह मॉम और डेड नही सिखाते हैं वेदों की शोभा यात्रा निकालकर बच्चों को महापुरुष बनने का संकल्प दिलाया जाता है। क्रिया आधारित शिक्षा में अ से अनार का चित्र नहीं दिखाते बल्कि अ से अनार का साक्षात्कार करवाते हैं बच्चों में आभा तेज हो वे संस्कारवान हो इसलिए 20-20 मिनट के कालांश में अलग अलग माध्यमों से उन्हें सीख दी जाती है। गुजरात के विद्या भारती में तो नवदंपतियों के पंजीयन और गर्भवति मां का प्रशिक्षण भी दिया जाता है। भोपाल में इसकी शुरुआत इसी वर्ष हुई हैं यहां की सफलता के बाद इसे पूरे राज्य में अपनाया जायेगा।इस संकल्पना के सूत्रधार हैं भागीरथ कुमरावत। दिन रात एक करते हुवे एक अनथक योद्धा की तरह ईसाई मिशनरी और लार्ड मैकाले की शिक्षा पद्धति के चंगुल से वैदिक ज्ञान को सहेजने में लगे हैं।


- डॉ. नवीन जोशी

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