मध्य प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत को मिली राष्ट्रीय पहचान, यूनेस्को की विश्व विरासत में शामिल होने का दावा हुआ मजबूत
1 जुलाई 2026। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की गहरी सांस्कृतिक अभिरुचि और प्रदेश की अनमोल धरोहरों को वैश्विक पटल पर स्थापित करने के दृढ़ संकल्प के फलस्वरूप मध्य प्रदेश की समृद्ध लोक संस्कृति और पारंपरिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक और बड़ी सफलता मिली है। प्रदेश के प्रसिद्ध मैहर बैंड, अगरिया लोह और निमाड़ी जायका को भारत सरकार के संगीत नाटक अकादमी द्वारा राष्ट्रीय अमूर्त सांस्कृतिक विरासत (ICH) की सूची में सम्मिलित कर लिया गया है। अमूर्त सांस्कृतिक विरासत से तात्पर्य उन जीवित परंपराओं, लोकगीतों, शिल्पों, अनुष्ठानों, ज्ञान प्रणालियों और भोजन परंपराओं से है जो किसी समुदाय की पहचान बनती हैं और पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होती रहती हैं।
सांस्कृतिक विविधता का अनूठा उदाहरण
मध्यप्रदेश को मिली इस गौरवमयी उपलब्धि पर सचिव,पर्यटन एवं मध्यप्रदेश पर्यटन बोर्ड के प्रबंध संचालक डॉ. इलैयाराजा टी.ने कहा कि ये तीनों धरोहरे मध्य प्रदेश की जीवंत विरासत की अद्भुत विविधता को दर्शाती हैं। राष्ट्रीय सूची में जगह मिलना बडें गर्व की बात है। मध्य प्रदेश लगातार वैश्विक मंच पर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है और आशा है कि साल 2028 में यूनेस्को की स्थायी सूची में शामिल होने की एक मजबूत दावेदारी होगी।
यह उपलब्धि मप्र को वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर करेगी सशक्त
मध्य प्रदेश पर्यटन बोर्ड के अपर प्रबंध संचालक श्री अभय अरविंद बेडेकर ने कहा कि प्रदेश की ये तीनों जीवंत परंपराएं राज्य की समृद्ध सांस्कृतिक विविधता, पारंपरिक ज्ञान और लोक विरासत का सशक्त प्रतिनिधित्व करती हैं। राष्ट्रीय सूची में इनका शामिल होना पीढ़ियों से संरक्षित हमारी अमूल्य सांस्कृतिक धरोहर को राष्ट्रीय स्तर पर मिली महत्वपूर्ण पहचान है। यह उपलब्धि मध्य प्रदेश को वैश्विक सांस्कृतिक मानचित्र पर और अधिक सशक्त करेगी।
अगरिया समुदाय की प्राचीन लौह धातुकर्म तकनीक
मध्य प्रदेश का अगरिया समुदाय सदियों पुरानी स्वदेशी लौह धातुकर्म तकनीक को आज भी जीवंत बनाए हुए है। आधुनिक औद्योगिक तकनीकों के दौर में भी यह समुदाय पारंपरिक भट्टियों, लकड़ी के कोयले (चारकोल) और स्थानीय लौह अयस्क का उपयोग कर बिना किसी आधुनिक मशीनरी के लोहा तैयार करता है। यह प्रक्रिया केवल धातु निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि प्रकृति, स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान के संतुलित उपयोग का उत्कृष्ट उदाहरण भी प्रस्तुत करती है।इस प्राचीन तकनीक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका संपूर्ण ज्ञान पुस्तकों में नहीं, बल्कि गुरु-शिष्य परंपरा और पारिवारिक विरासत के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरित होता आया है। समुदाय के बुजुर्ग युवाओं को लौह अयस्क की पहचान, भट्ठी निर्माण, तापमान नियंत्रण और धातु शोधन की पारंपरिक विधियां सिखाते हैं। यह तकनीक न केवल भारत की प्राचीन धातुकर्म परंपरा की समृद्धि को दर्शाती है, बल्कि जनजातीय समुदायों के वैज्ञानिक ज्ञान, कौशल और सांस्कृतिक विरासत का भी सशक्त प्रतीक है। यही कारण है कि यह परंपरा आज देश की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत के रूप में विशेष महत्व रखती है
'मैहर बैंड' का गौरवशाली इतिहास
मुख्यमंत्री डॉ. यादव की लोक-संस्कृति और कलाओं को अक्षुण्ण रखने की नीति के अंतर्गत संस्कृति विभाग द्वारा उठाए गए प्रभावी कदमों का ही यह सुखद परिणाम है। स्वर और साधना के अद्भुत संगम 'मैहर बैंड' का इतिहास बेहद गौरवशाली और अनूठा है। इसकी स्थापना वर्ष 1918 में महान संगीत मनीषी उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब ने मैहर रियासत के तत्कालीन महाराजा बृजनाथ सिंह जूदेव की प्रेरणा से की थी। भारतीय शास्त्रीय संगीत के इतिहास में यह विश्व का पहला ऐसा शास्त्रीय वाद्यवृंद (ऑर्केस्ट्रा) है, जिसने संगीत प्रेमियों को एक नए वितान से परिचित कराया। बीते 108 वर्षों के अपने सुदीर्घ और यशस्वी सफर में इस बैंड ने अपनी मौलिकता और शास्त्रीय गरिमा को जीवंत रखा है। धरोहर के रूप में इसके कलाकारों ने पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस अनमोल वाद्यवृंद की परंपरा को पूरी निष्ठा के साथ संजोकर रखा है। मैहर बैंड की सबसे बड़ी विशेषता इसके दुर्लभ वाद्ययंत्र और उस्ताद अलाउद्दीन खाँ साहब द्वारा तैयार की गई विशेष शास्त्रीय बंदिशें हैं। इस वाद्यवृंद में सितार, सरोद, इसराज, वायलिन, चेलो, सितार-बैंजो, हारमोनियम और तबला जैसे पारंपरिक एवं पाश्चात्य वाद्यों का अनूठा मेल है। इनमें सबसे अनोखा और मुख्य आकर्षण 'नलतरंग' है। खाँ साहब ने बंदूक की नालियों (बैरल) को काटकर, उन्हें कलात्मक ढंग से स्वरबद्ध कर 'नलतरंग' जैसे अद्भुत और मधुर शास्त्रीय वाद्य का आविष्कार किया था। पूरी दुनिया में मैहर बैंड के अलावा यह वाद्य कहीं और नहीं पाया जाता, जो वैश्विक संगीत जगत में कौतूहल और आकर्षण का केंद्र है।मैहर वाद्यवृंद की राष्ट्रीय ख्याति का शंखनाद वर्ष 1924 में लखनऊ के केसर बाग में आयोजित प्रतिष्ठित 'भातखंडे समारोह' से हुआ था, जहाँ इसकी अद्वितीय प्रस्तुति ने समूचे भारतवर्ष को चमत्कृत कर दिया था। तब से लेकर आज तक इस बैंड ने देश के लगभग सभी प्रतिष्ठित संगीत मंचों पर अपनी अमिट छाप छोड़ी है। संगीत और कला के प्रति इसके अमूल्य योगदान को देखते हुए मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग द्वारा वर्ष 2016 में इसे सर्वोच्च 'शिखर सम्मान' से भी विभूषित किया जा चुका है। वर्तमान में संस्कृति विभाग के संरक्षण में यह वाद्यवृंद भारतीय शास्त्रीय संगीत की अनवरत बहती रसधारा के रूप में विश्व पटल पर मध्यप्रदेश का मस्तक ऊंचा कर रहा है।
निमाड़ी पारंपरिक व्यंजन
निमाड़ अंचल की सांस्कृतिक पहचान केवल उसकी लोककला और परंपराओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां का पारंपरिक खान-पान भी इसकी समृद्ध विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है। बड़वानी, खरगोन और बुरहानपुर जिलों में पीढ़ियों से तैयार किए जा रहे दाल-पानी, धुली कढ़ी, पूरण की कचौरी, पारंपरिक कबाब, बिरयानी सहित अनेक स्थानीय व्यंजन अपनी विशिष्ट स्वाद, पारंपरिक विधियों और स्थानीय मसालों के कारण अलग पहचान रखते हैं। इन व्यंजनों में स्थानीय कृषि उत्पादों, मोटे अनाज और मौसमी सामग्री का उपयोग निमाड़ की जीवनशैली और प्रकृति से उसके गहरे जुड़ाव को दर्शाता है। पारिवारिक उत्सवों, धार्मिक आयोजनों और सामाजिक समारोहों में परोसे जाने वाले ये व्यंजन केवल भोजन नहीं, बल्कि निमाड़ की सांस्कृतिक विरासत, आत्मीयता और अतिथि सत्कार की जीवंत परंपरा का प्रतीक हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण निमाड़ी व्यंजन आज प्रदेश की समृद्ध पाक विरासत के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर अपनी विशिष्ट पहचान बना रहे हैं।














