29 नवंबर 2025। भोपाल गैस त्रासदी को 41 साल हो गए, लेकिन इसका ज़हर अब भी पीड़ितों के शरीर में बैठा है। ICMR की नई रिपोर्ट बताती है कि मिथाइल आइसोसाइनेट (MIC) गैस ने पीड़ितों के एंडोक्राइन सिस्टम को ऐसे नुकसान पहुँचाए हैं, जिनका असर आज भी खत्म नहीं हुआ। यही वजह है कि थायरॉइड की बीमारियाँ, मोटापा और मेटाबॉलिक डिसऑर्डर्स लगातार बढ़ते जा रहे हैं।
डॉक्टरों के मुताबिक पीड़ितों में डायबिटीज़ पाँच गुना और हाइपरटेंशन तीन गुना ज्यादा पाया जा रहा है।
◼️ भोपाल गैस त्रासदी: एक न खत्म होने वाला घाव
2–3 दिसंबर 1984 की रात को यूनियन कार्बाइड फैक्टरी से लीक हुई ज़हरीली MIC गैस ने भोपाल को मौत और भय की परछाइयों में ढकेल दिया।
कुछ घंटों के भीतर 3,000 से ज्यादा लोग दम घुटने, अंधेपन और फेफड़ों में जलन से मर गए। बाद के वर्षों में यह संख्या 20,000 से भी ऊपर मानी जाती है।
हजारों बच्चे अनाथ हुए, हजारों लोग आजीवन बीमारियों से जूझते रहे।
यह सिर्फ औद्योगिक लापरवाही नहीं थी, यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी केमिकल आपदा बन गई।
और सबसे दर्दनाक हिस्सा यह है कि 41 साल बाद भी इसके घाव भरने का नाम नहीं लेते।
MIC गैस ने
– फेफड़ों,
– आँखों,
– दिल,
– दिमाग
और
– प्रजनन प्रणाली
पर स्थायी और बहु-पीढ़ी वाला असर छोड़ा। कई विशेषज्ञ कहते हैं कि दूसरी और तीसरी पीढ़ी तक इसके प्रभाव दिख रहे हैं।
◼️ संभावना क्लिनिक की रिपोर्ट: चार दशक बाद भी ज़हर का असर जारी
भोपाल में स्थित संभावना क्लिनिक ने 41वीं बरसी पर बताया कि पीड़ितों में आज भी मल्टी-सिस्टम फेल्योर जैसे लक्षण दिखाई देते हैं।
क्लिनिक की डॉक्टर उषा आर्या कहती हैं:
“गैस ने शरीर के अलग-अलग सिस्टम को नुकसान पहुँचाया है। इसलिए ट्रीटमेंट भी एक ही लाइन से नहीं हो सकता। हम मॉडर्न मेडिसिन, आयुर्वेद और योग—तीनों को मिलाकर इलाज करते हैं। कई बार योग और आयुर्वेद मॉडर्न मेडिसिन से ज्यादा असर दिखाते हैं।”
उषा आर्या बताती हैं कि उनका कंप्यूटरीकृत डेटा सिस्टम हर मरीज के इलाज के पैटर्न को ट्रैक करता है, जिससे समझ आता है कि किस पर क्या असर हो रहा है।
◼️ आयुर्वेदिक डिटॉक्स और योग थेरेपी की मांग बढ़ी
क्लिनिक के डॉ. बी. रघुराम बताते हैं कि वे क्लिनिक में ही 65 तरह की आयुर्वेदिक दवाएँ तैयार करते हैं।
MIC जैसी केमिकल पॉइज़निंग में पंचकर्म डिटॉक्स को असरदार पाया गया है। योग के जरिए
– सांस,
– मांसपेशियों
और
– मानसिक तनाव
पर काबू पाने की ट्रेनिंग दी जाती है।
रघुराम कहते हैं, “तीन दशक से ज्यादा का अनुभव कहता है कि यह संयुक्त मॉडल सिर्फ भोपाल पीड़ितों के लिए नहीं, बल्कि प्रदूषण और टॉक्सिन से जूझ रहे आधुनिक शहरों के मरीजों के लिए भी कारगर है।”
◼️ भोपाल आज भी सवाल पूछता है
41 साल बाद भी सच यही है कि
– पर्यावरण की सफाई अधूरी है,
– कॉर्पोरेट जिम्मेदारी अधूरी है,
– और पीड़ितों को मिलने वाला न्याय भी अधूरा है।
यह आपदा सिर्फ इतिहास की तारीख नहीं है। यह याद दिलाती है कि लापरवाही कितनी महंगी पड़ सकती है, और सिस्टम की सुस्ती कैसे पीढ़ियों का भविष्य बदल सकती है।














