भोपाल 12 जून 2026। कला, साहित्य और संस्कृति के संरक्षण एवं संवर्धन के उद्देश्य से कार्यरत कलाव्योम फाउंडेशन द्वारा अक्षदा सोशल वेलफेयर सोसाइटी के सहयोग से आयोजित मासिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों की श्रृंखला के अंतर्गत इस माह भव्य कवि सम्मेलन का आयोजन कुबेर बैंक्वेट, बाग मुगलिया में सम्पन्न हुआ। साहित्यिक गरिमा और सांस्कृतिक चेतना से परिपूर्ण इस आयोजन में शहर के साहित्यप्रेमियों, कवियों, शायरों, कलाकारों, शिक्षाविदों तथा विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े गणमान्य नागरिकों ने उत्साहपूर्वक सहभागिता की। कार्यक्रम ने काव्य, शायरी और मानवीय संवेदनाओं के माध्यम से समाज में प्रेम, सौहार्द और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रसार का संदेश दिया।
कार्यक्रम का शुभारंभ अतिथियों के स्वागत एवं परिचय के साथ हुआ। इस अवसर पर प्रसिद्ध शायरा एवं मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी, वरिष्ठ श्रृंगार कवि डॉ. अरुण अज्ञानी, प्रसिद्ध लेखक एवं मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. जीवन रजक तथा युवा शायर श्री चित्रांश खरे ने अपनी सशक्त एवं भावपूर्ण प्रस्तुतियों से श्रोताओं को मंत्रमुग्ध कर दिया।
सम्मेलन में डॉ. नुसरत मेहदी ने अपनी संवेदनशील शायरी के माध्यम से प्रेम, इंसानियत और सामाजिक समरसता का संदेश दिया। उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं के हृदय को गहराई से स्पर्श किया। उन्होंने कहा-
वो एक चेहरा है क्यों उसको आईना कह दूँ
वो आदमी है तो कैसे उसे ख़ुदा कह दूँ
कोई ज़रूरी नहीं है कि मैं हर इक युग में
कहा हुआ ही सुनूं और सुना हुआ कह दूँ"
इन पंक्तियों ने सभागार में उपस्थित सभी लोगों को मानवीय मूल्यों और सामाजिक सौहार्द की महत्ता का स्मरण कराया। उनकी शायरी में जीवन के अनुभव, संवेदनशीलता और समाज के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण का सुंदर समन्वय दिखाई दिया।
वरिष्ठ श्रृंगार कवि डॉ. अरुण अज्ञानी ने अपने विशिष्ट अंदाज़ में प्रेम, आत्मीयता और मानवीय संबंधों की भावनाओं को स्वर दिया। उनकी रचनाओं में भावनात्मक गहराई और सहज अभिव्यक्ति का सुंदर संगम दिखाई दिया। उनकी पंक्तियाँ- "भावना को मेरी जो नहीं जानता,
मैं भी उसको अपना नहीं मानता।"
ने श्रोताओं की खूब वाहवाही प्राप्त की। उनकी प्रस्तुति ने यह संदेश दिया कि संबंधों की वास्तविक नींव संवेदनाओं और आपसी समझ पर आधारित होती है।
प्रसिद्ध लेखक एवं मध्यप्रदेश प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. जीवन रजक ने अपनी विचारोत्तेजक कविता के माध्यम से वर्तमान सामाजिक परिस्थितियों पर सार्थक टिप्पणी की। उनकी कविता मानवता, सहिष्णुता और नैतिक मूल्यों की स्थापना का संदेश देती हुई प्रतीत हुई। उन्होंने अपनी चर्चित कविता की पंक्तियाँ सुनाईं-
"मैं उन जैसा नहीं बनना चाहता,
जो रक्त को मजहब कहते हैं,
हिंसा को गौरव,
दूसरे के दुख को उत्सव समझते हैं।
मैं मनुष्य होना चाहता हूँ।"
उनकी प्रस्तुति ने श्रोताओं को आत्ममंथन के लिए प्रेरित किया तथा समाज में बढ़ती असहिष्णुता और विभाजनकारी प्रवृत्तियों के बीच मानवता के महत्व को रेखांकित किया। उनकी कविता पर सभागार देर तक तालियों से गूँजता रहा।
युवा शायर श्री चित्रांश खरे ने अपनी ग़ज़लों और शेरों से प्रेम, विरह और जीवन की अनुभूतियों को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया। उनकी प्रस्तुति में भावनाओं की सच्चाई और अभिव्यक्ति की परिपक्वता स्पष्ट दिखाई दी। उन्होंने पढ़ा-
"वो शख़्स जो अज़ीज़ था मंज़िल न हो सका,
ग़म ये है कुछ भी प्यार में हासिल न हो सका।
मैंने तमाम खूबियाँ ख़ुद में समेट लीं,
फिर भी मैं तेरे प्यार के क़ाबिल न हो सका।"
इन पंक्तियों ने श्रोताओं के मन में गहरी भावनात्मक अनुभूति जगाई और सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूँज उठा।
कार्यक्रम के दौरान कलाव्योम फाउंडेशन के प्रतिनिधियों ने संस्था की गतिविधियों और उद्देश्यों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि फाउंडेशन नियमित रूप से साहित्य, संगीत, रंगमंच, लोककलाओं एवं भारतीय सांस्कृतिक परंपराओं के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए कार्य कर रहा है। संस्था द्वारा आयोजित मासिक सांस्कृतिक कार्यक्रमों का उद्देश्य कलाकारों और साहित्यकारों को एक साझा मंच प्रदान करना है, जहाँ वे अपनी रचनात्मक अभिव्यक्तियों के माध्यम से समाज को सकारात्मक दिशा दे सकें।
इस अवसर पर सभी आमंत्रित कवियों और शायरों को “कलाव्योम कवि श्री सम्मान” से सम्मानित किया गया। सम्मान समारोह ने कार्यक्रम की गरिमा को और अधिक बढ़ाया। उपस्थित साहित्यप्रेमियों ने कवियों की प्रस्तुतियों का भरपूर आनंद लिया तथा ऐसे आयोजनों को समाज की सांस्कृतिक चेतना के लिए अत्यंत आवश्यक बताया।
कार्यक्रम में डॉ. अमोघ गुप्ता, श्री मोहित सिंह, श्री शैलेन्द्र सिसौदिया (गन्नी भाई), श्रीमती निहारिका धोलपुरिया, श्री रितेश धोलपुरिया, श्री आलोक शर्मा सहित अनेक साहित्य प्रेमी, कलाकार और गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। सभी ने कार्यक्रम की सराहना करते हुए इसे साहित्य और संस्कृति के क्षेत्र में एक सार्थक पहल बताया।
अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, कवियों, साहित्यकारों, सहयोगी संस्थाओं एवं उपस्थित कला-प्रेमियों का आभार व्यक्त किया। यह कवि सम्मेलन केवल एक साहित्यिक आयोजन नहीं रहा, बल्कि समाज में प्रेम, संवेदना, भाईचारे और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने का एक सशक्त माध्यम बनकर उभरा। उपस्थित जनों ने आशा व्यक्त की कि कलाव्योम फाउंडेशन भविष्य में भी इसी प्रकार के उच्चस्तरीय सांस्कृतिक आयोजनों के माध्यम से समाज में साहित्य और संस्कृति की अलख जगाता रहेगा।















