प्रो. आशा शुक्ला का अभिनव प्रयोग- लिखित उपन्यास से निकाले 21 मुद्दे - डॉ बीना सिन्हा
12 मई 2026। आशा पारस फॉर पीस एंड हारमनी फाउंडेशन, भारत द्वारा वरिष्ठ साहित्यकार डॉ. वीणा सिन्हा के चर्चित उपन्यास “अग्निगर्भ में जलती पंखुरियाँ” में उभरे स्त्री विमर्श से जुड़े सामाजिक और ऐतिहासिक 21 मुद्दों पर लिखे गये आलेखों पर केंद्रित पुस्तक चर्चा एवं लोकार्पण समारोह का सफल एवं गरिमामयी आयोजन 12 मई 2026 को दुष्यंत कुमार पाण्डुलिपि संग्रहालय, शिवाजी नगर, भोपाल में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में साहित्य, संस्कृति, शिक्षा एवं समाजसेवा से जुड़े अनेक प्रतिष्ठित विद्वानों, साहित्यकारों, शोधार्थियों एवं साहित्य प्रेमियों की सक्रिय सहभागिता रही।
कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्वलन के साथ हुआ। इसके पश्चात उपन्यास पर केंद्रित विस्तृत साहित्यिक चर्चा आयोजित की गई, जिसमें वक्ताओं ने कृति के साहित्यिक, सामाजिक, मनोवैज्ञानिक एवं मानवीय पक्षों पर अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रो आशा शुक्ला ने की और विशिष्ट अतिथि थे डॉ प्रभुदयाल मिश्र , सारस्वत अतिथि के रूप में उपस्थित थीं श्रीमती साधना बलबते ।
स्वागत एवं प्रस्तावना वक्तव्य में प्रो. आर. के. शुक्ला ने संस्था के उद्देश्यों तथा साहित्यिक आयोजनों की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि साहित्य समाज में संवेदनशीलता और मानवीय मूल्यों को सुदृढ़ करने का महत्वपूर्ण माध्यम है।
उपन्यासकार डॉ. वीणा सिन्हा ने अपने वक्तव्य में पुस्तक की रचना-प्रक्रिया, कथ्य और पात्रों के भावबोध पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि यह उपन्यास समाज में स्त्री जीवन, संवेदनाओं और संघर्षों की अनेक अनकही परतों को सामने लाने का प्रयास है।
प्रख्यात लेखिका अपर्णा पात्रीकर ने कहा कि उपन्यास की भाषा, शैली और भावभूमि पाठकों को गहराई से प्रभावित करती है। करुणा राजुरकर ने साहित्य और समाज के संबंधों को रेखांकित करते हुए पुस्तक को समकालीन विमर्श की महत्वपूर्ण कृति बताया।
वरिष्ठ साहित्यकार कुमार सुरेश ने उपन्यास की वैचारिक संरचना और संवेदनात्मक प्रभाव की सराहना करते हुए कहा कि यह रचना पाठकों को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है। वरिष्ठ साहित्यकार एवं आलोचक रामाश्रय रत्नेश ने कृति को समकालीन हिंदी साहित्य की उल्लेखनीय उपलब्धि बताया।
कुमकुम गुप्ता ने अपने वक्तव्य में कहा कि यह उपन्यास स्त्री संवेदना, सामाजिक यथार्थ और मानवीय संघर्षों का अत्यंत प्रभावशाली दस्तावेज है, जो पाठकों को गहन चिंतन के लिए प्रेरित करता है।
डॉ. साधना बलवटे ने अपने सारस्वत वक्तव्य में कहा कि साहित्य समाज की चेतना को दिशा देता है और डॉ. वीणा सिन्हा की यह कृति संवेदनात्मक साहित्य की सशक्त अभिव्यक्ति है। मध्य प्रदेश साहित्य अकादमी के निदेशक डॉ. विकास दवे ने कहा कि ऐसे आयोजन साहित्यिक संस्कृति को नई ऊर्जा प्रदान करते हैं।
डॉ. प्रभुदयाल मिश्र ने भारतीय साहित्यिक परंपरा और मानवीय मूल्यों की चर्चा करते हुए उपन्यास की सामाजिक प्रासंगिकता को रेखांकित किया।
अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. आशा शुक्ला ने कहा कि साहित्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने वाली शक्ति है। उन्होंने डॉ. वीणा सिन्हा की रचनात्मक प्रतिबद्धता की सराहना की।
कार्यक्रम में विशेष रूप से पुस्तक से जुड़े 21 Contributors (योगदानकर्ताओं) का उल्लेख किया गया तथा उनके साहित्यिक एवं बौद्धिक सहयोग की सराहना की गई। सभी Contributors के सामूहिक योगदान को इस कृति एवं आयोजन की महत्वपूर्ण उपलब्धि बताया गया।
समारोह के अंत में संस्था की ओर से डॉ. वीणा सिन्हा का सम्मान किया गया। कार्यक्रम का संचालन विशाखा राजुरकर ने किया, अंत में धन्यवाद ज्ञापन लव चावडीकर द्वारा प्रस्तुत किया गया।
यह आयोजन साहित्य, संवेदना और सामाजिक सरोकारों का सशक्त संगम सिद्ध हुआ, जिसकी उपस्थित जनों ने मुक्त कंठ से प्रशंसा की।















