मुस्लिम नेतृत्व इंसानियत की बात करना कब शुरू करेगा

Location: Bhopal                                                 👤Posted By: DD                                                                         Views: 4070

Bhopal: -- रमेश शर्मा

पिछले दिनों तीन बड़ी घटनायें हुईं । एक भारत के पश्चिमी बंगाल में, दूसरी बंगलादेश में और तीसरी पाकिस्तान में । ये तीनों देश कभी एक राष्ट्र हुआ करते थे समय के साथ दो बने और अब तीन स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में आ गये हैं । पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के नेता शेख आलम का एक वक्तव्य आया कि मुसलमान यदि एक जुट हो जायें तो चार पाकिस्तान बना लेंगे तो बंगलादेश में मुस्लिम नेताओं ने भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का विरोध करने केलिए हिन्दु बस्तियों में हमला बोला, हिन्दुओं के साथ सार्वजनिक मारपीट की और मंदिर में तोड़ फोड़ की । पाकिस्तान के करांची में एक प्राचीन मंदिर को तोड़ दिया गया और उसके आसपास के हिन्दु घरों पर हमले हुये और तोड़फोड़ की गयी । पाकिस्तान, बंगलादेश, या भारत में मुस्लिम समूहों द्वारा कट्टरता का प्रदर्शन या सार्वजनिक साम्प्रदायिक हिंसा के ये उदाहरण पहले नहीं हैं । ऐसी घटनाएं अक्सर देखने में आतीं हैं । यदि हम भारतीय उप महाद्वीप के सभी देशों के आकड़े देखें तो लगभग प्रतिदिन ऐसा कहीं न कहीं घटता है जहाँ कुछ आक्रामक कट्टरपंथी ऐसी क्रूर साम्प्रदायिक हिंसा करते हैं और फिर इस्लाम की चादर ओढ़ कर छिपने और बचने का प्रयत्न करते हैं । हालाँकि सार्वजनिक रूप से से कुछ मुस्लिम बुद्धिजीवी इन घटनाओं की निंदा करते हैं, लेकिन उन निंदाओ से कोई अंतर नहीं आता । घटनायें घटने की बजाय बढ़ ही रहीं हैं । ऐसी निंदा पिछले सौ वर्षों से सुनी जा रही है, सार्वजनिक रूप से की जाने वाली सामाजिक भाईचारे की बातें व्यवहार में नहीं दिखतीं, यदि सैद्धांतिक रूप से की जाने वाली इंसानियत, अमन और भाईचारे की बातें वास्तविक होतीं या मुस्लिम समाज के बौद्धिक वर्ग की बातों पर समाज अमल करता तो ऐसी घटनाओं में वृद्धि न होती । पाकिस्तान और बंगलादेश में गैर मुस्लिमों की आबादी में गिरावट न होती । साम्प्रदायिक आधार पर होंने वाली ऐसी हिंसक घटनाओं में वृद्धि न होती । पाकिस्तान और बंगलादेश ही क्यों कयी बार तो लगता है जैसे भारत के कश्मीर, असम और बंगाल में मानों आबादी के घनत्व और अनुपात बढ़ाने का कोई अभियान चल रहा है । कश्मीर में कश्मीरी पंडितों की बात तो जग जाहिर है लेकिन असम और बंगाल में भी ऐसी खबरें आ रहीं हैं कि अनेक बस्तियाँ में आबादी का स्वरूप एक तरफा हो रहा है और अन्य मतावलंबी अन्य स्थानों पर अपने ठिकाने तलाश में पलायन कर रहे हैं ।
भारतीय समाज और सरकार दोनों ऐसी घटनाओं के बारे में सुनने और सुनकर अनसुना करने का मानों अभ्यस्त हो गया है । वह पढ़ता है, सुनता है या झेलता है और आगे बढ़ जाता है । भारतीय समाज ऐसी घटनाओं के प्रति कितना सहनशील है इसका सबसे बड़ा उदाहरण 1993,का मुम्बई का सीरियल ब्लास्ट हो सकता है । वह कितनी बड़ी घटना थी जिसमें मरने वालों की संख्या ढाई सौ से ऊपर थी और घायलों की संख्या डेढ़ हजार के आसपास थी वह भी कुछ घंटों में । फिर भी शाम तक मुम्बई का जनजीवन सामान्य सा हो गया था, दिनचर्या पटरी पर आ गयी थी । निसंदेह भारतीय समाज और सरकार दोनों की सहनशीलता और सहृदयता की प्रशंसा की जानी चाहिए कि इतना सहकर भी चुप हैं, रोज सुन रहे हैं फिर भी ऐसे आक्रामक हिंसक और देश को खंडित करने वाले वचन बोलने वालों को संसद और विधानसभा में चुनकर भेज रहे हैं । यह भारतीय समाज और सरकार की प्रशंसात्मक शैली हो सकती है पर वहीं इस बात का विचार तो आवश्यक है कि मुस्लिम समाज में इस आक्रामकता का कारण क्या है, क्या भारतीय मुस्लिम समाज को सरकार और हिन्दु समाज के प्रति आभार का भाव नहीं होना चाहिए ? बंगलादेश को भारत के प्रति आभारी नहीं रहना चाहिए ? मुस्लिम समाज एक बड़ा समूह कबीले जैसी सीमित सोच से बाहर क्यों नहीं आ पा रहा । इतना ईर्ष्या और द्वेष कि किसी अन्य समाज को स्वीकार ही नहीं करते । असहमतियां और अस्वीकृतियां भी होती हैं फिर भी सामाजिक स्तर पर जीने के रास्ते बनाये जाते हैं । लेकिन आक्रामकता, बल और हिंसा किसी के अस्तित्व को मिटाना उसके स्वरूप को बदलने सतत अभियान चलाना विचारणीय है । मुस्लिम समाज की यह तंग सोच दुनियाँ के कबीलाई दौर में तो मानी जा सकती है लेकिन आज जब दुनियाँ एक गाँव बन गयी हैं । चाँद और मंगल पर बस्तियाँ बसाने की तैयारी हो रही तब केवल और केवल अपने ही स्वरूप की दुनियाँ बनाना क्या उचित होगा । बारत में हिन्दु समाज ने विभाजन की भीषण त्रासदी झेली है । हिंसा, लूट, महिलाओं के अपहरण और बलात्कारों की हजारों घटनायें झेली हैं इसके बाद भी मुस्लिम समाज को स्नेह और सम्मान के साथ भारत में विकास के अवसर दिये । हिन्दु और मुस्लिम दोनों समाज की मानसिकता समझने केलिये पाकिस्तान और बंगलादेश में घटती हिन्दुओं की आबादी, सिमटती बस्तियाँ और टूटते मंदिर की गणना कर सकते हैं तो भारत में मुस्लिम आबादी का विकास और बढ़ती मस्जिदों की संख्या से समझ सकते हैं । भारतीय समाज किसी को पराया नहीं मानता, और मुस्लिम समाज को तो वह अपने ही रक्त का एक हिस्सा मानता है । इसका कारण यह है कि हिन्दु समाज में इस विचार की बाहुल्यता है कि पूजा उपासना पद्धति बदलने से कोई पराया नहीं हो जाता, खून के रिश्ते नहीं बदलते । कौन सा क्षेत्र किस परिस्थिति में कब पृथक हुआ, कौन से कुल कुटुम्ब ने कब पूजा उपासना पद्धति बदली इन घटनाओं से इतिहास भरा पड़ा है इसलिए हिन्दु समाज में यह धारणा है कि समूचे भारतीय उपमहाद्वीप में आज भले किसी ने कोई पंथ अपनाया हो, कोई पूजा उपासना पद्धति अपनाई हो पर सबका मूल एक है, सब अपने हैं । लेकिन यह भाव संभवतः उन मुस्लिम नायकों का नहीं है जिनके आव्हान पर कुछ मुस्लिम समूह हाथ हथियार लेकर निकल पड़ते हैं और अपनी हिंसा को इस्लामियत या मुसलमानियत की आड़ में बचने का बचने का प्रयत्न करते हैं । क्या इस एकतरफा हिंसा को इंसानियत के दायरे में माना जा सकता है ? क्या इस्लाम का मूल संदेश ऐसा ही है ? पाकिस्तान, बंगलादेश की इस हिंसा और शेख आलम के ब्यान क्या वही संदेश है जो दुनियाँ में आकर नबी हुजूर ने दिया था । उन्होंने कदम कदम पर इंसानियत की बात की थी । क्या मुस्लिम धर्म गुरु और नेतृत्व कर्ता समाज को इंसानियत का संदेश दे रहे हैं ? लेकिन लगता है मुस्लिम समाज को इंसानियत की नहीं मुसलमानियत की शिक्षा मिल रही है मुसलमानियत भी भाई चारे और अमन की नहीं हिंसक तरीके से प्रसार की शिक्षा दी जा रही है । हो सकता है ऐसे शिक्षक और उस आधार पर चलने वाले कम हों पर लगता है निर्णायक संघर्ष में यही समूह भीड़ को संचालित करता है । यह वो समूह है जो उपासना पद्धति बदलने को पंथ की सीमा तक नहीं देखता, भाई चारे में नहीं देखता बल्कि एक पृथक राष्ट्र के स्वरूप में देखता है । धर्मांतरण कर लेने से राष्ट्रातांरण होने को आवश्यक मानता है । यदि ऐसा नहीं है तो क्यों शेख आलम मुसलमानों की एक जुटता के आधार पर चार पाकिस्तान बनाने की बात क्यों कहते और क्यों अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैय्यद अहमद अलग राष्ट्र के व्याख्यान देते और मोहम्मद अली जिन्ना अलग पाकिस्तान की मुहिम छेड़ते । पाकिस्तान के रूप में पृथक राष्ट्र साधारण मार्ग से नहीं बना वह खून के दरिया में तैर कर निकला है । पाकिस्तान के लिये कितना खून बहाया गया ? 1921 के खिलाफत आन्दोलन के बाद भारत पाकिस्तान बटवारे तक लाखों निर्दोष लोगों के प्राण गये, लाखों स्त्रियों के अपहरण हुये, करोड़ों बेघर हुये । क्या इसका लाभ किसी सामान्य मुसलमान को मिला । जिस तरह कबीलाई दौर में मालिक और सैनिक मालामाल होते थे लगभग वैसा ही पृथक पाकिस्तान का लाभ कुछ लोगों को ही मिला । कुछ लोगों को राज सत्ता और ऐश्वर्य का जीवन अवश्य मिला पर सामान्य मुसलमान समाज वहीं का वहीं है । यदि अलग पाकिस्तान बनने से वह लाभान्वित हो जाता तो भारत लौटकर क्यों आता । घुसपैठिये के रूप में या शरणार्थी के रूप में वह लौटकर आ रहे है फिर भी वह अपनी आँखो से सत्य को नहीं देख पा रहा वह आज भी उन्ही आँखो से देखता है जो इंसानियत की नहीं मुसलमानियत की बात करते हैं । पाकिस्तान या बंगलादेश से भारत में आकर बसने वाले मुसलमानों की संख्या लगभग ढाई करोड़ के आसपास मानी जाती है । 1951 से अब तक एक करोड़ घुसपैठ की बात तो सरकार भी स्वीकार करती है । ये लोग इसीलिए तो आये कि भारत में जीने के अवसर मुस्लिम राष्ट्र पाकिस्तान या बंगलादेश की तुलना में बेहतर हैं । यह सत्य भी सामने आ चुका है कि पाकिस्तान या बंगलादेश में रहने वाले मुसलमानों को चैन नहीं, सुकून नहीं, आर्थिक मानसिक और शैक्षणिक विकास के अवसर कम हैं तो क्यों अलग पाकिस्तान की बात होती है ? वह भी एक नहीं चार चार पाकिस्तान । आखिर क्यों भारत में भाईचारे के साथ निभने निभाने की बात नहीं होती ? क्यों होता है नरेंद्र मोदी के विरुद्ध साम्प्रदायिक प्रदर्शन । कोई विपक्षी राजनैतिक दल किसी निर्णय का विरोध करे, या किसी विदेशी अतिथि का विरोध करे वहां तक तो ठीक है, मोदी जी को काले झंडे दिखाए जाते, वापस जाओ के नारे लगाये जाते तो यह बात भी समझ आने वाली है लेकिन बंगलादेश में मोदी जी के विरोध के नाम पर हिन्दु बस्तियों पर हमले, मंदिरों को तोड़ना किस मानसिकता का प्रदर्शन करता है । निसंदेह यह मन के भीतर भरी गयी नफरत का ही प्रकटीकरण है । पैगम्बर मोहम्मद साहब का संदेश तो ऐसा नहीं था उनके अधिकांश संदेश इंसानियत पर जोर देने वाले हैं उन्होंने इंसानियत से ऊपर मुसलमानियत को कभी नहीं माना । बदर की जंग और मदीना में सल्तनत की कायमी के बक्त उन्होंने जो मुसलमानों को जो हिदायतें दी थीं वे सहज उपलब्ध हैं लेकिन इस्लाम के नाम पर हमलावर इन मुस्लिम समूहों का आचरण, नारे या आक्रामकता उन हिदायतों से बिल्कुल मेल नहीं खातीं फिर भी इन हमलावर समूहों को लगता है कि वे इस्लाम की सेवा कर रहे हैं या इस्लाम के लिये अपनी जिन्दगी दांव पर लगा रहे हैं तो यह अपने आप में आश्चर्यजनक है । मुसलमानों को अपने साथ भलाई करने वाले समाज का आभारी रहना चाहिए, अहसान मंद होना चाहिए लेकिन अहसानमंदी के बजाय उन्हे जान माल का नुकसान पहुंचाया जा रहा है । पाकिस्तान और बंगलादेश इस्लामिक राष्ट्र हैं । इस्लामिक देशों में रह रहे गैर मुस्लिमों की हिफाजत की जिम्मेदारी मुसलमानों की है । लेकिन उन दोनों देशों में मुसलमान हिफाजत करने की बजाय हमला कर रहे हैं । मुसलमानों के जो समूह हमलावर हैं उनके पीछे शेख आलम जैसे नेता होते हैं । इसी मानसिकता के वे धर्म गुरू होते हैं जो धर्म के मर्म को समझने की बजाय हिदायतों की मनमानी व्याख्या करके समाज को एक कबीलाई सोच में बाँध कर रखना चाहते हैं, हमलावर बनाये रखना चाहते हैं । आज आवश्यकता इस बात की है कि इस्लामिक बुद्धिजीवियों को सामने आना चाहिए और इस्लाम की जो शिक्षा इंसानियत को जोर देने वाली है उसकी वास्तविकता से समाज को अवगत कराया जाना चाहिए । यही समाज के हित में है और देश के हित में भी ।

Related News

Latest Tweets

Latest Posts