22 जनवरी 2026। बसंत पंचमी भारतीय संस्कृति का वह पावन पर्व है, जब प्रकृति, कला और ज्ञान साधना का अलौकिक संगम होता है। शीत ऋतु की विदाई और बसंत के आगमन के साथ यह दिन कला साधकों और विद्वानों द्वारा माँ शारदा की देवीय शक्तियों को नमन करने का अवसर बनता है। पीले पुष्प, कोमल हवाएँ और उल्लास से भरा वातावरण जीवन में सृजन, साधना और ज्ञान जीवन की निरंतर धारा का प्रवाहित करता है।
भारतीय ज्ञान परंपरा में कला केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि साधना का मार्ग रही है। संगीतकार, नर्तक, चित्रकार, शिल्पकार और साहित्यकार वर्षों की तपस्या, अनुशासन और एकाग्रता से अपनी कला को निखारते हैं। बसंत पंचमी का दिन उनकी उसी मौन साधना का सार्वजनिक उत्सव है, जहाँ कला को ईश्वर के समकक्ष मानकर पूजा की जाती है। भारतीय ज्ञान परंपरा के अंतर्गत कथक विद्या भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में विशेष स्थान रखती है। इसकी जड़ें सनातन संस्कृति और कथावाचन की परंपरा से जुड़ी हैं। घुंघरुओं की लय, पैरों की थाप और भावों की अभिव्यक्ति यह सब कला साधना की ही देन हैं। बसंत पंचमी पर अनेक गुरु-शिष्य परंपराओं में कथक की प्रस्तुतियाँ होती हैं, जो यह दर्शाती हैं कि कला अनुशासन और भक्ति से ही पूर्ण होती है।
माँ शारदे की देवीय शक्ति व साधना और नटराज रूप में शिव का तांडव नृत्य सृष्टि के संतुलन का प्रतीक हैं। तांडव नृत्य केवल गति नहीं, बल्कि जीवन चक्र के सृजन, संरक्षण और संहार का दर्शन कराता है। कला साधकों के लिए नटराज प्रेरणा हैं तो माँ शारदा शक्ति और साधना का आशीर्वाद देने वाली हैं। बसंत पंचमी पर मॉ शारदा और नटराज की आराधना कर कलाकार अपनी साधना को नई दिशा देते हैं। बसंत पंचमी को माँ शारदा (सरस्वती) की पूजा का विशेष महत्व है। वे ज्ञान, वाणी, संगीत और कला की अधिष्ठात्री देवी हैं। विद्वान, विद्यार्थी और कलाकार इस दिन पुस्तकों, वाद्य यंत्रों और कलाकृतियों की पूजा करते हैं। हमारी यह परंपरा बताती है कि ज्ञान और कला अहंकार नहीं, विनम्रता और समर्पण से फलती हैं। बसंत पंचमी के दिन पीले वस्त्र धारण कर पीले पुष्प और मिष्ठान माँ शारदा के चरणों में अर्पित किए जाते हैं, क्योंकि पीला रंग ऊर्जा, आशा और सृजन का प्रतीक है। कई स्थानों पर बच्चों की शिक्षा का शुभारंभ भी इसी दिन किया जाता है। यह महापर्व संदेश देता है कि जीवन में ज्ञान और कला का प्रवेश शुभ और मंगलकारी है, जिसके बिना जीवन अर्थहीन और नीरस है।
भारत की पहचान उसकी विविध कलाओं से है, जिनमें हिंदुस्तानी व कर्नाटक संगीत, नृत्यों में भरतनाट्यम, कथकली, ओडिसी, कुचिपुड़ी, मणिपुरी, लोकनृत्य, लोकसंगीत और चित्रकला, मूर्तिकला, हस्तशिल्प साहित्य शामिल है। बसंत पंचमी इन सभी कलाओं को एक सूत्र में पिरोती है और कला साधकों को अपनी जड़ों से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है। संपूर्ण भारत में बसंतोत्वत को एक दृष्टि में देखें तो उत्तर भारत में सरस्वती पूजा और शैक्षणिक गतिविधियाँ प्रमुख रहती हैं। पश्चिम बंगाल में यह पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है, जहाँ शिक्षण संस्थानों में विशेष आयोजन होते हैं। बिहार और झारखंड में भी माँ शारदा की भव्य पूजा होती है। पंजाब में इसे पतंगोत्सव के रूप में मनाया जाता है, जबकि राजस्थान और मध्यप्रदेश में लोकगीतों और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है। दक्षिण भारत में विद्या और संगीत से जुड़े अनुष्ठान किए जाते हैं, वहीं पूर्वोत्तर राज्यों में बसंत के स्वागत के साथ लोक परंपराएँ जीवंत हो उठती हैं।
हमारी संस्कृति में बसंत पंचमी केवल एक तिथि नहीं, बल्कि कला, ज्ञान और साधना का उत्सव है। यह दिन हमें स्मरण कराता है कि भारतीय ज्ञान परंपरा में कला साधकों की तपस्या समाज की आत्मा को समृद्ध करती है। जब वीणा की मधुर ध्वनि, पुस्तक का मौन ज्ञान और साधक का निःस्वार्थ समर्पण एक साथ जुड़ते हैं, तभी समाज की आत्मा पुष्पित-पल्लवित होती है। हम सभी अपने भीतर छिपी रचनात्मकता, करुणा और विवेक को जाग्रत करते हुए ज्ञान व कला के पथ पर निरंतर अग्रसर रहें। माँ शारदा की कृपा से हमारी बुद्धि उज्ज्वल हो, हमारी अभिव्यक्ति सजीव बने और हमारी साधना जनकल्याण का माध्यम बने इसी भावना के साथ बसंत पंचमी का यह पावन पर्व युगों-युगों तक हमारी सांस्कृतिक चेतना को आलोकित करता रहे।
डॉ. दीपक वर्मा
- लेखक शा. संगीत महाविद्यालय, नरसिंहगढ़ में सहायक प्राध्यापक (कथक) हैं।














