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सौर तूफानों पर भारतीय वैज्ञानिकों की बड़ी खोज, अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी होगी अधिक सटीक

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 112

29 वर्षों के अध्ययन में सामने आए नए संकेत, पृथ्वी पर सौर तूफानों के प्रभाव का पहले से लगाया जा सकेगा बेहतर अनुमान

नई दिल्ली 30 जून 2026। भारतीय वैज्ञानिकों ने सौर तूफानों (Solar Storms) को लेकर एक महत्वपूर्ण खोज की है, जिससे भविष्य में अंतरिक्ष मौसम (Space Weather) की भविष्यवाणी पहले से अधिक सटीक हो सकती है। इस शोध से यह समझने में मदद मिली है कि सूर्य से निकलने वाले विशाल प्लाज्मा विस्फोट पृथ्वी तक पहुंचने के दौरान किस तरह ऊष्मीय (थर्मल) बदलावों से गुजरते हैं और यही बदलाव पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण पर उनके प्रभाव की तीव्रता तय करते हैं।

भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के तहत कार्यरत भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA), बेंगलुरु के वैज्ञानिकों ने 1995 से 2024 तक के 29 वर्षों के आंकड़ों का विश्लेषण कर यह अध्ययन किया है। यह पहली बार है जब पृथ्वी के निकट पहुंचने वाले इंटरप्लानेटरी कोरोनल मास इजेक्शन (ICME) के तापीय व्यवहार का इतना विस्तृत सांख्यिकीय अध्ययन किया गया है।

क्या होते हैं सौर तूफान?

सूर्य के बाहरी वातावरण से समय-समय पर चुंबकीय प्लाज्मा के विशाल विस्फोट निकलते हैं, जिन्हें कोरोनल मास इजेक्शन (CME) कहा जाता है। जब ये पृथ्वी की ओर बढ़ते हुए अंतरिक्ष में यात्रा करते हैं और पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र से टकराते हैं, तो वे भूचुंबकीय तूफान (Geomagnetic Storm) उत्पन्न कर सकते हैं।

इनका असर कई महत्वपूर्ण सेवाओं पर पड़ सकता है, जैसे:

उपग्रह संचालन
GPS नेविगेशन
रेडियो संचार
विमानन मार्ग
बिजली ग्रिड
ध्रुवीय क्षेत्रों में अरोरा (Northern Lights) जैसी प्राकृतिक रोशनी
29 वर्षों के डेटा से मिले अहम संकेत

शोधकर्ताओं ने तीन सौर चक्रों (23, 24 और 25 के प्रारंभिक चरण) के दौरान प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन किया। इसमें नासा के ओम्नी डेटाबेस और एल-1 (L1) बिंदु पर मौजूद अंतरिक्ष यानों से प्राप्त सौर पवन के मापों का उपयोग किया गया।

अध्ययन में पाया गया कि:

लगभग 45 प्रतिशत ICME पृथ्वी तक पहुंचते-पहुंचते गर्म (Heating State) हो जाते हैं।
पहले माना जाता था कि सूर्य से दूर जाते समय ये लगातार ठंडे होते जाते हैं, लेकिन नया अध्ययन इस धारणा को चुनौती देता है।
अधिक शक्तिशाली भूचुंबकीय तूफान उन्हीं ICME से जुड़े पाए गए जो गर्म अवस्था में थे।
अंतरिक्ष मौसम पूर्वानुमान में होगा बड़ा सुधार

वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान पॉलीट्रोपिक इंडेक्स नामक एक महत्वपूर्ण मापदंड का उपयोग किया, जिससे यह समझा गया कि ICME के भीतर प्लाज्मा की ऊष्मीय स्थिति समय के साथ कैसे बदलती है।

शोध के अनुसार, यही थर्मल संकेत भविष्य में किसी आने वाले सौर तूफान की संभावित तीव्रता का पहले से अनुमान लगाने में मदद कर सकते हैं।

आदित्य-एल1 मिशन से मिलेगी और मजबूती

शोध के प्रमुख लेखक एवं आईआईए के डॉक्टरेट शोधार्थी सौम्यरंजन खुंटिया ने कहा कि यदि प्रारंभिक चरण में ही ICME के तापीय संकेतों का पता लगाया जा सके, तो पृथ्वी पर उनके प्रभाव का पूर्वानुमान पहले से लगाया जा सकता है।

वहीं आईआईए के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. वागेश मिश्रा ने बताया कि भविष्य में भारत के आदित्य-एल1 मिशन से प्राप्त आंकड़ों को भी इस मॉडल में शामिल किया जाएगा। इससे सूर्य के निकट ही CME के थर्मल विकास की निगरानी संभव होगी और अंतरिक्ष मौसम की भविष्यवाणी और अधिक सटीक बन सकेगी।

प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका में प्रकाशित शोध

यह शोध अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जर्नल Monthly Notices of the Royal Astronomical Society (MNRAS) में प्रकाशित हुआ है। वैज्ञानिकों का मानना है कि तापीय और चुंबकीय विश्लेषण पर आधारित यह नया मॉडल भविष्य में गंभीर सौर तूफानों के प्रभावों का पहले से आकलन करने और उपग्रह, संचार तथा ऊर्जा अवसंरचना की सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण साबित होगा।

चित्र : (ए) एससी23, 24 और एससी25 के उदय चरण में तापन और शीतलन एमई की वार्षिक घटना। सुपरइम्पोज़्ड एपोच एनालिसिस (एसईए) (बी) पॉलीट्रोपिक इंडेक्स (गामा) और (सी) एसवाईएम-एच पैरामीटर के माध्य मानों को दर्शाता है, जो प्री- आईसीएमई, शीथ, एमई और पोस्ट- आईसीएमई क्षेत्रों में हैं। वक्र दर्शाते हैं: भूरा रंग उच्च-प्रभाव वाले आईसीएमई के लिए और हरित-नीला (सियान) रंग मध्यम-प्रभाव वाले आईसीएमई के लिए। ग्रे या स्लेटी (धूसर) रंग की ऊर्ध्वाधर रेखाएं प्रारंभिक शीथ क्षेत्र को चिह्नित करती हैं, और काली रेखाएं एमई क्षेत्र की सीमाओं को चिह्नित करती हैं।

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