×

मोदी ने सोने की खरीद कम करने की अपील क्यों की?

News from Bhopal, Madhya Pradesh News, Heritage, Culture, Farmers, Community News, Awareness, Charity, Climate change, Welfare, NGO, Startup, Economy, Finance, Business summit, Investments, News photo, Breaking news, Exclusive image, Latest update, Coverage, Event highlight, Politics, Election, Politician, Campaign, Government, prativad news photo, top news photo, प्रतिवाद, समाचार, हिन्दी समाचार, फोटो समाचार, फोटो
Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 123

12 मई 2026। मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव और महंगे होते तेल के बीच प्रधानमंत्री Narendra Modi ने भारतीयों से खर्च में संयम बरतने की अपील की है। सरकार का मानना है कि अगर लोग कुछ समय के लिए सोने की खरीद कम करें, तो देश से बाहर जाने वाले डॉलर पर लगाम लगाई जा सकती है और अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने में मदद मिलेगी।

प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक परिवहन, वर्क-फ्रॉम-होम और कारपूलिंग जैसे उपाय अपनाने की सलाह देने के साथ यह भी संकेत दिया कि सोने की मांग घटाने से विदेशी मुद्रा पर दबाव कम हो सकता है। भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ताओं में शामिल है और हर साल अरबों डॉलर का सोना आयात करता है।

विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव
Reserve Bank of India के आंकड़ों के मुताबिक, 1 मई 2026 तक भारत का विदेशी मुद्रा भंडार करीब 690.7 अरब डॉलर था। फरवरी 2026 में यह आंकड़ा लगभग 728 अरब डॉलर के स्तर पर था, यानी कुछ महीनों में इसमें उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई।

वहीं International Monetary Fund का अनुमान है कि 2026 में भारत का चालू खाता घाटा (CAD) बढ़कर 84.5 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसकी बड़ी वजहों में सोने का भारी आयात भी शामिल है।

चालू खाता घाटा तब बढ़ता है जब कोई देश निर्यात से कमाई की तुलना में आयात और विदेशी भुगतान पर ज्यादा डॉलर खर्च करता है। चूंकि सोना पूरी तरह आयातित वस्तु है और इसका भुगतान डॉलर में होता है, इसलिए इसकी मांग बढ़ने से विदेशी मुद्रा पर सीधा दबाव पड़ता है।

भारत का बढ़ता इंपोर्ट बिल
भारत का कुल आयात बिल करीब 775 अरब डॉलर का है। इसमें चार चीजें सबसे बड़ा हिस्सा रखती हैं:

कच्चा तेल
सोना
खाद्य तेल
खाद

कच्चे तेल का आयात बिल लगभग 134.7 अरब डॉलर है, जबकि सोने का आयात करीब 72 अरब डॉलर तक पहुंच चुका है। यह आंकड़ा खाद्य तेल और खाद के संयुक्त आयात खर्च से भी ज्यादा है।

सरकार के सामने चुनौती यह है कि तेल, खाद और खाद्य तेल जैसी चीजों की खपत कम करना आसान नहीं है, क्योंकि ये सीधे ऊर्जा और खाद्य सुरक्षा से जुड़ी हैं। ऐसे में सोने की खरीद को सीमित करना सरकार को अपेाकृत व्यावहारिक विकल्प लग रहा है।

भारतीयों का सोने से भावनात्मक रिश्ता
भारत में सोना सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि परंपरा और सामाजिक प्रतिष्ठा का हिस्सा माना जाता है। शादी-ब्याह और त्योहारों में सोने की खरीद लंबे समय से सांस्कृतिक परंपरा रही है।

हालांकि, लगातार बढ़ती कीमतों ने लोगों की खरीदारी की आदतों पर असर डालना शुरू कर दिया है। World Gold Council के अनुसार, 2026 की पहली तिमाही में भारत में सोने की मांग 10% बढ़कर 151 टन रही, लेकिन कीमतों में उछाल के कारण मूल्य के हिसाब से खर्च लगभग दोगुना हो गया।

दूसरी ओर, पूरे 2025 में भारत की कुल सोना खरीद 11% घटकर 710.9 टन रह गई, जबकि गहनों की खपत में 24% की गिरावट दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि ऊंची कीमतों के समय भारतीय उपभोक्ता खरीदारी कम कर देते हैं।

अगर सोने की खरीद घटी तो क्या होगा?
अनुमानों के मुताबिक, अगर भारत सोने का आयात 30% से 40% तक कम कर दे, तो करीब 25 अरब डॉलर की बचत हो सकती है। यदि यह कटौती 50% तक पहुंचती है, तो बचत 36 अरब डॉलर तक जा सकती है।

यह रकम देश के चालू खाता घाटे को काफी हद तक कम करने में मदद कर सकती है। साथ ही बचाए गए डॉलर का इस्तेमाल तेल और अन्य जरूरी आयातों के लिए किया जा सकता है।

मध्य-पूर्व संकट और भारत की चिंता
मध्य-पूर्व में जारी संघर्ष ने वैश्विक तेल बाजार को अस्थिर कर दिया है। खासतौर पर Strait of Hormuz दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री तेल मार्गों में से एक है, जहां तनाव बढ़ने से तेल आपूर्ति और शिपिंग लागत प्रभावित हो रही है।

तेल की कीमतें बढ़ने का सीधा असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर पड़ता है। ज्यादा डॉलर खर्च होने से रुपया कमजोर पड़ता है और फिर पेट्रोल, डीजल से लेकर रोजमर्रा की कई आयातित वस्तुएं महंगी हो जाती हैं।

सरकार का बड़ा संदेश
सरकार का संकेत साफ है कि मौजूदा वैश्विक हालात में भारत को अपने डॉलर खर्च पर नियंत्रण रखना होगा। सोने की खरीद कुछ समय के लिए टालना सरकार की नजर में ऐसा कदम है, जिससे आम लोग भी आर्थिक स्थिरता में योगदान दे सकते हैं।

हालांकि, यह फैसला आसान नहीं होगा। भारत में सोने की चमक सिर्फ आर्थिक नहीं, भावनात्मक और सांस्कृतिक भी है। ऐसे में आने वाले महीनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि बढ़ती कीमतें और आर्थिक दबाव भारतीयों की “गोल्ड हैबिट” को कितना बदल पाते हैं।

Related News

Global News