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इंदौर में मिलेगा आदिवासी के सबसे बड़े उत्सव 'आदिवासी उत्सव' से रूबरू होने का मौका

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📍 भोपाल
इंदौर में मिलेगा आदिवासी के सबसे बड़े उत्सव 'आदिवासी उत्सव' से रूबरू होने का मौका
- जनजातीय कलाकारों द्वारा कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी तथा 'पिथोरा' आर्ट गैलरी होगी आकर्षण के केंद्र
- विभिन्न अंचलों के जनजातीय नृत्य और लोक नृत्यों की प्रस्तुतियाँ लुभाएँगी इंदौरियों का मन
- जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों तथा जनजातीय साहित्य और परिधानों के विशेष स्टॉल बढ़ाएँगे जात्रा का मान
- इंदौर में पहली बार आयोजित हो रहे इस महापर्व में शहरवासियों के लिए रहेंगे 100 से ज्यादा स्टॉल

इंदौर 12 फरवरी 2026। मालवा-निमाड़ के आदिवासी अंचलों में जब बसंत की हल्की ठंड विदा लेने लगती है और महुए की खुशबू हवा में घुलने लगती है, तब एक पर्व पूरे समाज को उल्लास से भर देता है, नाम है भगोरिया पर्व। यह सिर्फ एक त्यौहार नहीं है, बल्कि आदिवासी जीवन की एक खुली किताब है, जिसे पढ़ने के लिए शब्द नहीं, बल्कि संवेदनाएँ चाहिए। धार, झाबुआ और अलीराजपुर जैसे इलाकों में मनाया जाने वाला भगोरिया, प्रेम की स्वीकृति, आज़ादी की अभिव्यक्ति और सामूहिक खुशी का बहुत बड़ा उत्सव है। गौरतलब है कि पीआर 24x7, इस आयोजन का पीआर पार्टनर है।

आज, जब शहरों की ज़िंदगी तेज़ रफ्तार में भाग रही है और एकाकी होती जा रही है, ऐसे में भगोरिया पर्व हमें रुककर यह सोचने का मौका देता है कि उत्सव क्या होता है। शायद वही, जहाँ कोई अकेला न हो, जहाँ खुशी साझा की जाए और जहाँ जीवन को खुलकर जिया जाए। इसी भावना को शहर तक पहुँचाने की कोशिश है 'जात्रा-2026'। इंदौर में पहली बार आयोजित हो रहा यह आयोजन सिर्फ आदिवासी संस्कृति को दिखाने का मंच नहीं है, बल्कि उसे समझने और महसूस करने का अवसर है। जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी एवं कोषाध्यक्ष श्री गिरीश चव्हाण ने बताया कि जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के तत्वावधान में 20 से 22 फरवरी, 2026 तक गांधी हॉल परिसर में होने वाला यह तीन दिवसीय महोत्सव, धार, झाबुआ और अलीराजपुर की आदिवासी आत्मा को शहर के बीचों-बीच ले आएगा। जनजातीय पर्व भगोरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी 'जात्रा-2026' का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा। इस आयोजन में प्रवेश नि:शुल्क रहेगा। शहरवासियों के लिए यहाँ 100 से ज्यादा स्टॉल रहेंगे, जहाँ से वे आदिवासियों के पारंपरिक व्यंजन व अन्य सामग्री को देख और खरीद भी सकेंगे। 21 फरवरी, 2026 को अमू काका बाबा न पोरिया फेम ओरिजनल गायक आनंदीलाल भावेल अपनी टीम के साथ लाइव प्रस्तुति देंगे।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के अध्यक्ष देवकीनंदन तिवारी ने बताया कि भगोरिया पर्व हमारे आदिवासी समाज की आत्मा है। यह प्रेम, भरोसे और आज़ादी का ऐसा उत्सव है, जहाँ रिश्ते डर से नहीं, समझ और सहमति से बनते हैं। भगोरिया की सबसे खास बात यह है किस इसके दौरान कोई दर्शक नहीं होता, बल्कि हर कोई सहभागी होता है। यही सहभागिता इसे जीवंत बनाती है। इसलिए, 'जात्रा-2026' के जरिए हम चाहते हैं कि शहर का समाज भगोरिया से सिर्फ रूबरू ही न हो, बल्कि उसकी भावना को भी महसूस करे और साथ ही यह भी समझे कि हमारी परंपराएँ आज भी कितनी जीवंत और प्रासंगिक हैं।

जनजातीय सामाजिक सेवा समिति के कोषाध्यक्ष श्री गिरीश चव्हाण ने बताया कि भगोरिया पर्व आदिवासी जीवन की उस सच्चाई को सामने लाता है, जो प्रकृति, समाज और सामूहिकता से गहराई से जुड़ी है। 'जात्रा-2026' में भगोरिया पर आधारित प्रस्तुतियाँ, फोटोग्राफी और लोकनृत्य उसी खुलेपन और उल्लास को शहर तक पहुँचाने का माध्यम हैं, ताकि लोग आदिवासी संस्कृति को किताबों से नहीं, अनुभव के जरिए जान सकें।

'जात्रा-2026' के प्रमुख आकर्षण होंगे:
* जनजातीय कलाकारों द्वारा कला एवं हस्तशिल्प प्रदर्शनी
* जनजातीय समाज के पारंपरिक व्यंजनों के विशेष स्टॉल
* विभिन्न अंचलों के जनजातीय नृत्य और लोक नृत्यों की प्रस्तुतियाँ
* ट्राइबल फाउंडेशन द्वारा जनजातीय जीवन और परंपरा को दर्शाती 'पिथोरा' आर्ट गैलरी
* जनजातीय पर्व भगौरिया पर आधारित फोटो प्रदर्शनी
* जनजातीय साहित्य और परिधानों के स्टॉल

भगोरिया का नाम सुनते ही आँखों के सामने रंग-बिरंगे परिधान, मांदल की थाप, खुले चेहरे और बेझिझक मुस्कान उभर आती है। यह वह पर्व है, जहाँ प्रेम छुपाया नहीं जाता, बल्कि समाज के सामने खुलकर स्वीकार किया जाता है। लोकमान्यता है कि भगोरिया हाट में युवक-युवती एक-दूसरे को पसंद कर गुलाल लगाते हैं और फिर समाज की सहमति से नया जीवन शुरू करते हैं। न कोई बनावटी रस्म, न दिखावा, सिर्फ सहजता और भरोसा।

भगोरिया पर्व आदिवासी समाज की उस सोच को दर्शाता है, जहाँ रिश्ते डर से नहीं, सहमति और सम्मान से बनते हैं। यहाँ प्रेम कोई अपराध नहीं, बल्कि जीवन का स्वाभाविक हिस्सा है। यही कारण है कि भगोरिया को आदिवासी समाज की सामाजिक आज़ादी का पर्व भी कहा जाता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि आधुनिकता से बहुत पहले आदिवासी समाज रिश्तों और स्वतंत्रता की अपनी परिभाषा गढ़ चुका था।

दरअसल, 'जात्रा-2026' और भगोरिया पर्व एक ही धागे से बुने हैं, संवाद के धागे से। संवाद प्रकृति से, संवाद समाज से और संवाद खुद से। जब शहर का दर्शक भगोरिया को देखेगा, समझेगा और महसूस करेगा, तब शायद उसे भी अपनी जड़ों की आहट सुनाई देगी। तीन दिन का यह आयोजन शहर को यह याद दिलाएगा कि भारत की असली पहचान उसकी विविध संस्कृतियों में बसती है। और भगोरिया पर्व जैसी परंपराएँ इस पहचान की धड़कन हैं खुली, रंगीन और जीवंत..
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