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जियो-शिक्षा का स्मार्ट क्लासरूम: स्कूल बैग का बोझ होगा कम

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 149

जियो-शिक्षा क्लासरूम बदल सकता है पढ़ाई का तरीका
AI के साथ घर और स्कूल के बीच बनेगा एक ही लर्निंग स्पेस

नई दिल्ली, 21 फरवरी 2026। इंडिया AI इम्पैक्ट समिट में लगे जियो पवेलियन पर जियो-शिक्षा क्लासरूम खास तौर पर पेरेंट्स और स्टूडेंट्स का ध्यान खींच रहा है। यह सिर्फ एक टेक डेमो नहीं, बल्कि पढ़ाई के तौर-तरीकों को बदलने की एक गंभीर कोशिश के रूप में सामने आया है। भारत में करीब 25 करोड़ छात्र पारंपरिक तरीकों से पढ़ाई कर रहे हैं। जियो-शिक्षा मॉडल का विज़न है कि आने वाले समय में स्कूलों को “AI पॉवर्ड लर्निंग हब्स में बदला जा सके।

जियो-शिक्षा क्लासरूम के दो बुनियादी स्तंभ हैं, जियो ई-बोर्ड और जियो ई-बुक। दोनों क्लाउड के जरिए जुड़े हैं। शिक्षक बोर्ड पर जो पढ़ाते हैं, वही कंटेंट सीधे विद्यार्थियों की ई-बुक तक पहुंच जाता है। इससे न नोट्स कॉपी करने का झंझट रहता है और न ही भारी किताबों का बोझ। ई-बुक में न सिर्फ पाठ्यपुस्तकें, बल्कि उनसे जुड़े वीडियो, क्विज़ और अतिरिक्त अध्ययन सामग्री भी उपलब्ध रहती है। यानी ब्लैकबोर्ड, किताबें, होमवर्क नोट्स और स्टडी मटीरियल, सब एक डिजिटल इकोसिस्टम में, एक क्लिक पर उपलब्ध।

पढ़ाई का असर तभी गहरा होता है जब छात्र अपनी गति और अपने समय के अनुसार सीख सकें। जियो-शिक्षा इसी निरंतरता पर जोर देता है, ताकि क्लासरूम और घर के बीच पढ़ाई का प्रवाह बना रहे। जो भी कंटेंट क्लासरूम में पढ़ाया जाता है, उसे छात्र घर पर भी आसानी से एक्सेस कर सकते हैं। मॉडल का AI ट्यूटर कॉन्सेप्ट क्लैरिटी देता है, अलग-अलग भाषाओं में संवाद कर सकता है और हर छात्र के लिए अलग लर्निंग पाथ सुझा सकता है। इससे रटने की संस्कृति से हटकर समझ आधारित पढ़ाई की दिशा में कदम बढ़ाने की बात की जा रही है।

जियो-शिक्षा क्लासरूम मॉडल का फोकस सिर्फ छात्रों पर नहीं, बल्कि शिक्षकों पर भी है। शिक्षक पढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दे सकें, इसलिए सिस्टम ऑटोमेटेड इवैल्यूएशन, रियल-टाइम परफॉर्मेंस डेटा और एडमिनिस्ट्रेटिव बोझ में कमी जैसे फीचर प्रदान करता है। प्रिंसिपल और अभिभावकों को भी छात्रों की प्रगति का रियल-टाइम डेटा मिल सकता है, जिससे समय रहते शैक्षणिक हस्तक्षेप संभव हो सके।

फिलहाल यह मॉडल शुरुआती चरण में है और कुछ ही स्कूलों में लागू हुआ है, लेकिन इसकी दिशा संकेत देती है कि भविष्य का क्लासरूम कैसा हो सकता है। इसे केवल एक टेक प्रोडक्ट की तरह नहीं, बल्कि एक विकसित होते लर्निंग सिस्टम की तरह देखा जा रहा है। यदि यह मॉडल व्यापक रूप से लागू होता है, तो यह न सिर्फ स्कूल बैग का बोझ कम करेगा, बल्कि सीखने को ज्यादा व्यक्तिगत, सुरक्षित और सुलभ बनाने की दिशा में अहम भूमिका निभा सकता है।

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