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EU का एज-वेरिफिकेशन ऐप विवादों में, Pavel Durov ने बताया “निगरानी का औज़ार”

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 141

18 अप्रैल 2026। यूरोपीय संघ (EU) के नए एज-वेरिफिकेशन ऐप को लेकर बहस तेज़ हो गई है। Pavel Durov ने इस ऐप को सीधे तौर पर “निगरानी का औज़ार” करार दिया है और इसके सुरक्षा दावों पर सवाल उठाए हैं।

Durov का कहना है कि ब्रसेल्स द्वारा पेश किए गए इस अनिवार्य ID-चेकिंग सॉफ्टवेयर को जारी होने के कुछ ही मिनटों में हैक किया जा सकता है। उन्होंने आरोप लगाया कि ऐप को जानबूझकर कमजोर डिज़ाइन के साथ पेश किया गया है, ताकि बाद में इसे “सुधारने” के नाम पर यूज़र्स की निजता से समझौता किया जा सके।

यह ऐप हाल ही में Ursula von der Leyen द्वारा लॉन्च किया गया था। दावा किया गया कि इससे यूज़र्स बिना निजी जानकारी साझा किए अपनी उम्र साबित कर सकेंगे। EU का कहना है कि यह सिस्टम “निजता के उच्चतम मानकों” को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है।

हालांकि Durov इन दावों से सहमत नहीं हैं। उनका आरोप है कि यह एक तीन-चरणीय रणनीति का हिस्सा हो सकता है—पहले एक “निजता-सम्मान” वाला लेकिन कमजोर ऐप लॉन्च करना, फिर उसे हैक होने देना, और अंत में उसे मजबूत करने के नाम पर निगरानी तंत्र को बढ़ाना।

साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ Paul Moore ने भी ऐप की बुनियादी खामियों की ओर इशारा किया है। उनके मुताबिक, ऐप जिस डिवाइस पर चलता है उसी पर पूरी तरह भरोसा करता है, जो इसे छेड़छाड़ के लिए बेहद आसान बना देता है। उन्होंने चेतावनी दी कि यह भविष्य में बड़े डेटा लीक या सुरक्षा उल्लंघन का कारण बन सकता है।

EU में एज-वेरिफिकेशन को लेकर यह कदम ऐसे समय आया है जब कई देश इसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। Australia पहले ही 16 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया पर पाबंदी लागू कर चुका है। वहीं Denmark, France, Spain, Italy और Greece मिलकर ऐसे टूल्स का परीक्षण कर रहे हैं। Germany में भी इसी तरह के प्रस्ताव पर विचार हो रहा है।

दूसरी ओर, आलोचकों का कहना है कि इस तरह के सिस्टम बड़े पैमाने पर निजी डेटा के “केंद्रीय भंडार” बना सकते हैं, जो हैकर्स के लिए आसान निशाना बनते हैं और निगरानी के जोखिम को बढ़ाते हैं। United Kingdom में प्रस्तावित डिजिटल ID सिस्टम को लेकर पहले ही विरोध हो चुका है, जहां इसे नागरिक स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया जा रहा है।

Durov लंबे समय से डिजिटल निजता और अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर सरकारों के खिलाफ मुखर रहे हैं। उनका दावा है कि दुनिया धीरे-धीरे ऐसे सिस्टम की ओर बढ़ रही है जहां डिजिटल निगरानी सामान्य बात बन सकती है।

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