24 मई 2026। डिजिटल दौर में अब मौत भी पूरी तरह अंतिम नहीं रह गई है। किसी अपने के गुज़र जाने के बाद उनकी तस्वीरें, वीडियो और आवाज़ें मोबाइल और क्लाउड में हमेशा के लिए बची रहती हैं। कई लोग इन्हें यादों का सहारा मानते हैं, तो कुछ के लिए यह अतीत से बाहर न निकल पाने जैसा अनुभव बन जाता है।
मेरे फोन में भी मेरी दिवंगत माँ के साथ हुई बातचीत की रिकॉर्डिंग्स का एक पूरा फोल्डर मौजूद है। मैंने उन्हें कभी दोबारा सुनने की कोशिश नहीं की, लेकिन उन्हें डिलीट करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया। शायद यह डिजिटल दुनिया का नया “सुकून” है, जहां इंसान यादों को मिटाना नहीं चाहता।
अब टेक्नोलॉजी इस भावना को एक कदम और आगे ले जा चुकी है। AI आधारित कई ऐसे ऐप सामने आ चुके हैं, जो किसी मृत व्यक्ति का डिजिटल अवतार तैयार कर देते हैं। कुछ तस्वीरें, वीडियो और पुरानी बातचीत अपलोड करते ही ऐसा वर्चुअल इंसान बन जाता है, जो देखने और बात करने में लगभग असली लगता है।
कुछ साल पहले ऐसे ही एक ऐप ने काफी चर्चा बटोरी थी। इसमें लोग अपने गुज़र चुके प्रियजनों से मौत के बाद भी बातचीत कर सकते थे। इस अनुभव को कई लोगों ने भावुक बताया, जबकि कुछ ने इसे बेहद डरावना कहा।
अब ऐसे “ग्रीफ़बॉट्स” तेजी से बढ़ रहे हैं। वैज्ञानिक पत्रिका Nature ने कनाडा की एक साउंड इंजीनियर नोलन की कहानी प्रकाशित की, जिन्होंने अपने दिवंगत पिता का AI अवतार तैयार किया। उनके पिता हमेशा कहा करते थे कि “मौत एक नाकामी है।” पिता की मृत्यु के बाद नोलन ने एक तरह से अपने अधूरे सवालों और गुस्से को उसी AI अवतार के सामने व्यक्त किया।
लेकिन बड़ा सवाल यही है कि क्या ऐसे डिजिटल अवतार लोगों को मानसिक शांति देते हैं, या फिर उन्हें हमेशा अतीत में कैद करके रख देते हैं?
मनोवैज्ञानिक अभी इस पर किसी ठोस निष्कर्ष पर नहीं पहुंचे हैं। Scientific American की रिपोर्ट के मुताबिक, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि “ग्रीफ़बॉट्स” का इस्तेमाल मेडिकल निगरानी में ही होना चाहिए। कुछ रिसर्च यह भी चेतावनी देती हैं कि इंसान कहीं वास्तविक शोक प्रक्रिया से दूर न हो जाए।
इस तकनीक का एक कारोबारी पहलू भी है। कई प्लेटफॉर्म AI चैट के सीमित मैसेज के लिए पैसे वसूल रहे हैं। यानी इंसानी भावनाएं अब सब्सक्रिप्शन मॉडल में बदलती दिखाई दे रही हैं।
मामला सिर्फ आम लोगों तक सीमित नहीं है। AI अब मृत मशहूर हस्तियों को भी “डिजिटल रूप” में वापस ला रहा है। दिवंगत अभिनेता Robin Williams और नागरिक अधिकार नेता Martin Luther King Jr. जैसी हस्तियों के AI पुनर्निर्माण को लेकर पहले भी बहस छिड़ चुकी है। आलोचकों का कहना है कि यह तकनीक कई बार मृत लोगों की छवि और विरासत का व्यावसायिक इस्तेमाल बन जाती है।
इसके साथ एक नई समस्या डिजिटल विरासत की भी है। पहले परिवारों में जमीन-जायदाद को लेकर विवाद होते थे, अब सोशल मीडिया अकाउंट्स और डिजिटल डेटा भी विरासत का हिस्सा बन चुके हैं। कई टेक कंपनियां मृत व्यक्ति के परिवार को प्रोफाइल तक पहुंच देने में सख्त रवैया अपनाती हैं।
Meta के प्लेटफॉर्म्स पर मृत लोगों की प्रोफाइल अक्सर सालों तक बनी रहती हैं। कुछ अकाउंट्स पर “In Memoriam” का टैग लगा दिया जाता है, लेकिन वे डिजिटल दुनिया में लगभग हमेशा मौजूद रहते हैं।
सोशल मीडिया पर यह दृश्य अब आम हो चुका है कि किसी दिवंगत व्यक्ति की प्रोफाइल पर लोग हर साल जन्मदिन की शुभकामनियां लिखते रहते हैं, जैसे डिजिटल दुनिया ने मौत को पूरी तरह स्वीकार करने से इनकार कर दिया हो।
AI और डिजिटल तकनीक इंसानों को यादों से जोड़ रही है, लेकिन साथ ही यह सवाल भी खड़ा कर रही है कि क्या भविष्य में मौत सिर्फ एक जैविक घटना बनकर रह जाएगी, जबकि इंसान का “डिजिटल संस्करण” हमेशा ऑनलाइन मौजूद रहेगा।















