दो साल बाद भी टास्क फोर्स की रिपोर्ट केबिनेट में नहीं आ पाई

Location: Bhopal                                                 👤Posted By: DD                                                                         Views: 1378

Bhopal: - डॉ. नवीन जोशी

भोपाल 5 जून 2022। वन भूमि विवाद के निपटारे के लिये राज्य के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा ने 29 मई 2019 को टास्क फोर्स कमेटी बनाई थी जिसकी रिपोर्ट 6 फरवरी 2020 को प्रस्तुत हो गई थी। 12 अगस्त 2021 को वन मंत्री विजय शाह ने विधानसभा में विधायक ब्रह्मा भलावी के सवाल पर आश्वासन दिया था कि टास्क फोर्स की रिपोर्ट केबिनेट में प्रस्तुत करने की कार्यवाही की जा रही है परन्तु दो साल बाद भी यह रिपोर्ट केबिनेट में नहीं आ पाई है। यही नहीं, अंग्रेजी भाषा में बनी इस रिपोर्ट का हिन्दी रुपांतरण भी अभी तक नहीं हो पाया है। इस मामले में प्रदेश के मंडला जिले की निवास सीट से कांग्रेस के आदिवासी विधायक डॉ. अशोक मर्सकोले ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को पत्र लिखकर टास्क फोर्स कमेटी की सिफारिशें एवं सुझाव लागू करने की मांग की है।
पत्र में मर्सकोले ने कहा है कि राज्य शासन ने 29 मई 2019 को अतिरिक्त मुख्य सचिव वन विभाग एपी श्रीवास्तव की अध्यक्षता में टास्कफोर्स कमेटी का गठन किया जिसने 6 फरवरी 2020 को अपनी रिपोर्ट शासन के समक्ष प्रस्तुत कर दी। रिपोर्ट में भावअ 1927 की धारा 349 के अनुसार राजपत्र में 1975 तक डीनोटीफाईड की गई भूमियों के संबंध में मुख्य रूप से दो सिफारिश कर सुझाव राज्य सरकार के समक्ष प्रस्तुत किए गए, लेकिन राज्य मंत्रालय ने 6 फरवरी 2020 से अभी तक इन दोनों ही सुझावों और सिफारिशों से संबंधित कोई आदेश, निर्देश, पत्र, परीपत्र जारी नही किए।
मर्सकोले ने पत्र में कहा कि राजपत्र में डीनोटीफाईड की गई भूमियों के अभिलेख संशोधन के संबंध में राज्य मंत्रालय ने वर्ष 2004 में भी आदेश जारी किए। मुख्य सचिव का आदेश दिनांक 24 जुलाई 2004, प्रमुख सचिव राजस्व का आदेश दिनांक 30 सितम्बर 2004 आयुक्त भू-अभिलेख एवं बन्दोबस्त का आदेश दिनांक 5 अगस्त 2004 वन मुख्यालय सतपुड़ा भवन भोपाल का आदेश दि. 25 जनवरी 2005, इन चारों ही आदेशों का राज्य के किसी भी जिले और किसी भी वनमण्डल ने अभी तक पालन नहीं किया, डीनोटीफिकेशन की कोई प्रविष्टि वन विभाग और राजस्व विभाग ने अपने किसी भी विभागीय अभिलेख में दर्ज नहीं की, इस बाबत राज्य मंत्रालय एवं वन मुख्यालय ने कोई प्रक्रिया ही निर्धारित नहीं की।
पत्र में मर्सकोले ने राजपत्र में डीनोटीफाईड की गई भूमियों के संबंध में राज्य में उत्पन्न एवं प्रचलित कुछ असाधारण एवं हास्यास्पद स्थिति को उजागर किया जिसमें उन्होंने बताया कि डीनोटीफाईड भूमियों को अभिलेख संशोधित किए बिना ही राज्य मंत्रालय के 14 मई 1996 को जारी आदेश के अनुसार नारंगी भूमि सर्वे एवं नारंगी वनखण्डों में शामिल कर लिया। डीनोटीफाईड की गई भूमियों को सर्वोच्च अदालत की सिविल याचिका क्रमांक 202/95 में दिनांक 12 दिसम्बर 1996 को दिए गए आदेश के दायरे में आने वाली वन भूमि लगातार प्रतिवेदित किया जा रहा है। डीनोटीफाईड की गई भूमियों को जनवरी 2008 से लागू वन अधिकार कानून 2006 के अनुसार वन भूमि बताया जाकर व्यक्तिगत वन अधिकार दावे मान्य एवं अमान्य किए जा रहे हैं। डीनोटीफाईड की गई भूमियों को वन भूमि के बदले क्षतिपूर्ति वैकल्पिक वृक्षारोपण के लिए आवंटित किया जाकर भावअ 1927 की धारा 29 में दुबारा संरक्षित वन भूमि अधिसूचित किया जा रहा है। डीनोटीफाईड की गई भूमियों को वन भूमि बताया जाकर वन संरक्षण कानून 1980 के दायरे में आने वाली वन भूमि प्रतिवेदित कर गैर वानिकी कार्यो की अनुमतियां दी जा रही हैं।

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