26 फरवरी 2026। भारत चुपचाप, लेकिन व्यवस्थित तरीके से, अपनी मिसाइल क्षमता को उस स्तर तक ले जा चुका है जहां उसे अब क्षेत्रीय ताकत भर नहीं कहा जा सकता। न्यूक्लियर ट्रायड, लंबी दूरी की बैलिस्टिक मिसाइलें, सुपरसोनिक क्रूज़ सिस्टम और बढ़ती घरेलू उत्पादन क्षमता ने उसे वैश्विक मिसाइल क्लब में मजबूत जगह दिलाई है। सवाल है, क्या दुनिया इसे उतनी गंभीरता से देख रही है जितनी भारत दिखा रहा है?
भारत का सुरक्षा गणित सीधा है, लेकिन आसान नहीं। पश्चिम में पाकिस्तान और उत्तर व पूर्व में चीन। दोनों परमाणु हथियार संपन्न। दोनों के साथ जटिल इतिहास। इसी दोहरे दबाव ने नई दिल्ली को “विश्वसनीय प्रतिरोध” की रणनीति पर टिकाए रखा है। यही वजह है कि मिसाइल विकास अब रक्षा नीति का सहायक तत्व नहीं, बल्कि उसकी धुरी बन चुका है।
जमीन से अंतरमहाद्वीप तक
भारत ने 1980 के दशक के सीमित रेंज वाले सिस्टम से आगे बढ़कर आज एक लेयर्ड मिसाइल आर्किटेक्चर खड़ा कर लिया है। इसमें शॉर्ट, इंटरमीडिएट और इंटरकॉन्टिनेंटल रेंज बैलिस्टिक मिसाइलें, समुद्र आधारित सिस्टम और सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइलें शामिल हैं।
इस पूरी यात्रा की शुरुआत हुई पृथ्वी से, जिसकी पहली उड़ान 1988 में हुई। करीब 150–250 किमी रेंज वाली यह मिसाइल मुख्य रूप से सीमित थिएटर ऑपरेशन के लिए बनी थी, हालांकि इसमें परमाणु क्षमता भी है।
इसके बाद आया अग्नि-I, जिसकी लगभग 1,200 किमी रेंज ने पाकिस्तान के भीतर गहराई तक लक्ष्यों को कवर किया। फिर अग्नि-II (लगभग 2,500 किमी) और अग्नि-III (करीब 5,000 किमी) ने चीन के बड़े हिस्से को कवरेज में ला दिया।
सबसे अहम छलांग रही अग्नि-V। लगभग 8,000 किमी रेंज और MIRV तकनीक के साथ यह एक ही मिसाइल से कई लक्ष्यों को भेदने में सक्षम है। इससे भारत की पहुंच अंतरमहाद्वीपीय स्तर तक औपचारिक रूप से स्थापित हो गई।
ध्यान देने वाली बात यह है कि यह प्रगति अचानक नहीं हुई। 1990 के दशक से स्वदेशी लॉन्च व्हीकल और अंतरिक्ष कार्यक्रम में मिली तकनीकी दक्षता ने प्रोपल्शन, गाइडेंस और मैटेरियल साइंस में वह आधार दिया, जिस पर स्ट्रेटेजिक मिसाइल कार्यक्रम खड़ा हुआ।
समुद्र से दूसरा प्रहार
सिर्फ जमीन आधारित सिस्टम पर्याप्त नहीं माने जाते। विश्वसनीय प्रतिरोध के लिए “सेकंड स्ट्राइक” क्षमता जरूरी होती है। यहीं से समुद्री आयाम जुड़ता है।
अरिहंत श्रेणी पनडुब्बियां भारत के न्यूक्लियर ट्रायड का अहम हिस्सा हैं। इनमें तैनात K-15 सागरिका (करीब 750 किमी) और K-4 (करीब 3,500 किमी) भारत को समुद्र से परमाणु जवाबी कार्रवाई की क्षमता देते हैं।
लीड वेसल INS अरिधमान के शामिल होने से यह तंत्र और मजबूत होगा। समुद्र में तैनात पनडुब्बियां दुश्मन के पहले हमले के बाद भी जवाब देने में सक्षम रहती हैं। यही वास्तविक प्रतिरोध की रीढ़ है।
ब्रह्मोस: गति और मारक क्षमता
जहां बैलिस्टिक मिसाइलें रणनीतिक ढांचा बनाती हैं, वहीं सामरिक स्तर पर ब्रह्मोस एक गेम चेंजर साबित हुई है। भारत और रूस के संयुक्त उपक्रम ब्रह्मोस एयरोस्पेस प्राइवेट लिमिटेड द्वारा विकसित यह सुपरसोनिक क्रूज़ मिसाइल जमीन, समुद्र, पनडुब्बी और हवा से दागी जा सकती है। इसकी रफ्तार और सटीकता इसे पारंपरिक युद्ध परिदृश्यों में बेहद प्रभावी बनाती है।
भारत अब इसकी फाइनल असेंबली, लॉन्चर निर्माण और कमांड सिस्टम में बड़े पैमाने पर स्वदेशीकरण कर चुका है। निर्यात संभावनाएं भी खुल रही हैं।
बड़ी तस्वीर
भारत का मिसाइल निर्माण सिर्फ संख्या बढ़ाने की कवायद नहीं है। यह तकनीकी आत्मनिर्भरता, औद्योगिक आधार और रणनीतिक संतुलन का संयुक्त परिणाम है।
एक बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था आकार ले रही है। ऐसे में जो देश अपनी सुरक्षा का ढांचा खुद बना सकते हैं, वही भविष्य की शक्ति समीकरण में टिकेंगे। भारत ने संकेत दे दिया है कि वह उस सूची में शामिल रहना चाहता है, और लंबे समय तक रहना चाहता है।
अब यह सिर्फ रक्षा तैयारी की कहानी नहीं, बल्कि शक्ति संतुलन के बदलते मानचित्र की भी कहानी है।














