15 अप्रैल 2026। भारत सरकार ने संसद के निचले सदन लोकसभा के बड़े विस्तार का प्रस्ताव तैयार किया है। इसके तहत सीटों की संख्या मौजूदा 543 से बढ़ाकर 850 करने की योजना है, यानी करीब 57% की बढ़ोतरी। इस बदलाव के लिए संविधान संशोधन जरूरी होगा और इसी उद्देश्य से सांसदों के साथ मसौदा विधेयक साझा किया गया है।
फिलहाल लोकसभा की अधिकतम सीमा 550 सीटों की है, जिसे बढ़ाने के लिए संवैधानिक बदलाव अनिवार्य है। सरकार का तर्क है कि देश की जनसंख्या और जनसांख्यिकीय प्रोफाइल में पिछले दशकों में बड़ा बदलाव आया है, इसलिए सीटों का पुनर्विन्यास जरूरी हो गया है।
दरअसल, मौजूदा सीटों का निर्धारण 1971 की जनगणना के आधार पर है। उस समय परिसीमन प्रक्रिया को 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक के लिए स्थगित (फ्रीज़) कर दिया गया था। अब सरकार 2011 की जनगणना के आधार पर परिसीमन लागू करने पर विचार कर रही है, क्योंकि नई जनगणना प्रक्रिया 2027 तक पूरी होने की संभावना है।
इस प्रस्ताव का एक अहम पहलू महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित करना भी है। सरकार का कहना है कि अगर नई जनगणना और परिसीमन का इंतजार किया गया, तो महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में और देरी होगी।
हालांकि, इस प्रस्ताव को लेकर विपक्ष ने आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि परिसीमन 2021 की अद्यतन जनगणना के आधार पर होना चाहिए, जो कोविड-19 महामारी के कारण पूरी नहीं हो सकी थी।
दक्षिण भारत के कई राज्यों ने भी चिंता जाहिर की है। उनका तर्क है कि कम जनसंख्या वृद्धि दर के कारण उनकी सीटें कम हो सकती हैं, जबकि अधिक आबादी वाले उत्तरी राज्यों को फायदा मिलेगा।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री M. K. Stalin ने साफ चेतावनी दी है कि यदि इस प्रस्ताव से दक्षिणी राज्यों के हित प्रभावित होते हैं, तो इसके खिलाफ बड़े स्तर पर आंदोलन किया जाएगा।
कुल मिलाकर, लोकसभा विस्तार का यह प्रस्ताव केवल सीटों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके राजनीतिक और क्षेत्रीय असर को लेकर भी बहस तेज हो गई है।














