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निकटवर्ती आकाशगंगाओं में छिपे ब्लैक होलों का बड़ा खुलासा, भारतीय वैज्ञानिक भी शोध टीम में शामिल

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 106

उच्च-रिज़ॉल्यूशन रेडियो सर्वेक्षण से स्थानीय ब्रह्मांड में कमजोर लेकिन सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होलों की नई आबादी का पता चला

नई दिल्ली 6 जुलाई 2026। निकटवर्ती आकाशगंगाओं पर किए गए एक उच्च-रिज़ॉल्यूशन रेडियो अध्ययन में ऐसे कमजोर लेकिन सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होलों का पता चला है, जो अब तक वैज्ञानिकों की नजरों से लगभग ओझल थे। यह खोज स्थानीय ब्रह्मांड में ब्लैक होलों की गतिविधियों और आकाशगंगाओं के विकास को समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, लगभग हर बड़ी आकाशगंगा के केंद्र में एक विशाल ब्लैक होल मौजूद होता है। हालांकि, इनमें से कई इतने कम सक्रिय होते हैं कि पारंपरिक दूरबीनों और सर्वेक्षणों से उनका पता लगाना संभव नहीं हो पाता। इसके बावजूद ये ब्लैक होल जेट और गैसीय बहिर्वाह के माध्यम से अपने आसपास के वातावरण को प्रभावित करते हैं, जिससे तारों के निर्माण और आकाशगंगाओं के दीर्घकालिक विकास पर असर पड़ सकता है।

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के स्वायत्त संस्थान भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान (IIA) की वैज्ञानिक डॉ. अरु बेरी सहित अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की एक टीम ने e-MERLIN रेडियो सरणी की सहायता से पालोमर नमूने की 280 निकटवर्ती आकाशगंगाओं के केंद्रीय क्षेत्रों का विस्तृत अध्ययन किया।

शोध के दौरान वैज्ञानिकों ने लगभग 25 प्रतिशत आकाशगंगाओं के केंद्रों से सघन रेडियो उत्सर्जन दर्ज किया। यह संकेत ऐसे सुपरमैसिव ब्लैक होलों की मौजूदगी का है, जो कम मात्रा में पदार्थ को अपने भीतर समाहित कर रहे हैं और इसी कारण सामान्य अवलोकनों में दिखाई नहीं देते। अधिकांश स्रोत अत्यंत सघन पाए गए, जबकि कुछ में कई पारसेक तक फैली जेट जैसी रेडियो संरचनाएं भी देखी गईं।

शोधकर्ताओं का कहना है कि यह अब तक के सबसे व्यापक और सांख्यिकीय रूप से विश्वसनीय उच्च-रिज़ॉल्यूशन रेडियो सर्वेक्षणों में से एक है। इससे पहले किए गए अधिकांश अध्ययनों में या तो पर्याप्त संवेदनशीलता और रिज़ॉल्यूशन नहीं था या फिर वे सीमित आकाशगंगा नमूनों तक ही सीमित थे। इस अध्ययन ने बड़े और सुव्यवस्थित नमूने का उपयोग कर कमजोर ब्लैक होल गतिविधियों की व्यवस्थित पहचान संभव बनाई।

इन निष्कर्षों की पुष्टि के लिए रेडियो प्रेक्षणों की तुलना नासा की चंद्रा एक्स-रे वेधशाला से प्राप्त एक्स-रे आंकड़ों से भी की गई। संयुक्त विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि यह उत्सर्जन तारा निर्माण, सुपरनोवा अवशेषों या एक्स-रे बाइनरी प्रणालियों जैसी प्रक्रियाओं के बजाय सक्रिय सुपरमैसिव ब्लैक होलों से उत्पन्न हो रहा है।

अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि वर्तमान ब्रह्मांड में ब्लैक होलों का विकास मुख्य रूप से इसी प्रकार की कमजोर लेकिन निरंतर गतिविधियों के माध्यम से हो सकता है। साथ ही, यह शोध उच्च-रिज़ॉल्यूशन रेडियो प्रेक्षणों की उपयोगिता को भी रेखांकित करता है, जो उन ब्लैक होलों का पता लगाने में सक्षम हैं जो पारंपरिक आकाशगंगा सर्वेक्षणों में अक्सर छिपे रह जाते हैं।

यह शोध प्रतिष्ठित वैज्ञानिक पत्रिका Monthly Notices of the Royal Astronomical Society में प्रकाशित हुआ है। अध्ययन का नेतृत्व डी.आर.ए. विलियम्स-बाल्डविन और उनकी अंतरराष्ट्रीय शोध टीम ने किया, जिसमें भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान की वैज्ञानिक डॉ. अरु बेरी भी शामिल हैं।

चित्र : ब्रिटेन भर में स्थित 7 ई-मर्लिन रेडियो दूरबीनों के स्थान, जो एक इंटरफेरोमीटर के रूप में कार्य करते हैं (क्रेडिट: जोड्रेल बैंक, यूके)

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