25 अप्रैल 2026। अमेरिका के न्याय विभाग ने संघीय स्तर पर मृत्युदंड के तरीकों में बड़ा बदलाव करते हुए फायरिंग स्क्वॉड, इलेक्ट्रिक चेयर और गैस एस्फिक्सिएशन जैसे पुराने तरीकों को फिर से लागू करने का फैसला किया है। इसके साथ ही विभाग ने यह भी कहा है कि मृत्युदंड से जुड़े मामलों में तेजी लाने के लिए आंतरिक प्रक्रियाओं को सरल और तेज किया जाएगा।
न्याय विभाग के मुताबिक, पहले Donald Trump प्रशासन के दौरान इस्तेमाल किए गए घातक इंजेक्शन प्रोटोकॉल को फिर से लागू किया जा रहा है, लेकिन इस बार इसे विस्तारित करते हुए अतिरिक्त तरीकों को भी शामिल किया गया है। नई नीति का मकसद उन दोषियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करना है, जिनकी सभी कानूनी अपीलें खत्म हो चुकी हैं।
राष्ट्रपति पद संभालने के बाद Donald Trump ने संकेत दिया था कि वे न्याय विभाग को निर्देश देंगे कि वह “हिंसक अपराधियों, हत्यारों और खतरनाक अपराधियों” के खिलाफ मृत्युदंड को सख्ती से लागू करे।
नई नीति के तहत अब ऐसे कैदियों को मृत्युदंड देने का रास्ता साफ हो गया है, जिनकी सज़ा के खिलाफ सभी अपीलें समाप्त हो चुकी हैं। रिपोर्ट्स के अनुसार, यह पहली बार है जब संघीय स्तर पर स्पष्ट रूप से फायरिंग स्क्वॉड को भी विकल्प के रूप में शामिल किया गया है, हालांकि पहले के नियमों में उन राज्यों की विधियों को मान्यता दी गई थी जहां यह पहले से कानूनी था।
यह फैसला पूर्व राष्ट्रपति Joe Biden के रुख से बिल्कुल उलट है। उनके कार्यकाल में संघीय मृत्युदंड पर रोक लगा दी गई थी। दिसंबर 2024 में उन्होंने मौत की सज़ा का इंतजार कर रहे 37 कैदियों की सज़ा कम करके उन्हें बिना पैरोल के आजीवन कारावास में बदल दिया था, जिसके बाद केवल तीन संघीय कैदी ही मृत्युदंड की कतार में बचे थे।
अमेरिका में मृत्युदंड को लेकर जनता की राय अब भी बंटी हुई है। सर्वे के मुताबिक, 2025 के अंत तक करीब 52% लोग इसके पक्ष में हैं, जो 1994 के 80% के स्तर से काफी कम है। साथ ही, बहुत कम लोग यह मानते हैं कि यह सज़ा पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से दी जाती है।
वैश्विक स्तर पर देखा जाए तो United States अमेरिका महाद्वीप का इकलौता देश है जहां अभी भी सक्रिय रूप से मृत्युदंड दिया जाता है, जबकि दुनिया के दो-तिहाई से अधिक देश इसे कानून या व्यवहार में समाप्त कर चुके हैं।
वहीं Russia में मृत्युदंड का प्रावधान तो मौजूद है, लेकिन 1996 से इस पर रोक लगी हुई है। हालिया सर्वे में करीब आधे लोग इसे फिर से लागू करने के पक्ष में दिखे, हालांकि कानूनी अड़चनों के चलते इसकी वापसी आसान नहीं मानी जा रही है।















