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शहद की मक्खियों से सीखा रास्ता, अब ड्रोन भी बिना GPS खोजेंगे मंज़िल

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Place: भोपाल                                                👤By: prativad                                                                Views: 106

15 मई 2026। वैज्ञानिकों ने प्रकृति से प्रेरणा लेते हुए एक ऐसा नेविगेशन सिस्टम विकसित किया है, जो ड्रोन को बिना GPS के रास्ता ढूँढ़ना सिखाता है। “Bee-Nav” नाम का यह सिस्टम शहद की मक्खियों के व्यवहार पर आधारित है और बेहद कम मेमोरी के सहारे छोटे रोबोट्स को लंबी दूरी तय कर सुरक्षित वापस लौटने में सक्षम बनाता है।

कल्पना कीजिए कि छोटे-छोटे ड्रोन ग्रीनहाउस में उड़ते हुए फसलों की निगरानी कर रहे हों या अपने आप घर तक पार्सल पहुँचा रहे हों। तकनीक यह काम पहले भी कर सकती थी, लेकिन मौजूदा ड्रोन सिस्टम को भारी कंप्यूटिंग पावर और बड़ी मेमोरी की जरूरत पड़ती है। इससे ड्रोन भारी, महंगे और ज्यादा ऊर्जा खर्च करने वाले बन जाते हैं।

इसी चुनौती का समाधान खोजने के लिए नीदरलैंड और जर्मनी के वैज्ञानिकों की एक टीम ने ऐसा नेविगेशन सिस्टम तैयार किया, जो केवल 42 किलोबाइट की न्यूरल मेमोरी में काम कर सकता है। इस शोध में नीदरलैंड की डेल्फ़्ट यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी, वैगनिंगेन यूनिवर्सिटी और जर्मनी की ओल्डेनबर्ग यूनिवर्सिटी के विशेषज्ञ शामिल थे। अध्ययन के नतीजे प्रतिष्ठित वैज्ञानिक जर्नल Nature में प्रकाशित हुए हैं।

मक्खियों की उड़ान से मिली प्रेरणा

शोधकर्ताओं ने बताया कि यह सिस्टम शहद की मक्खियों के व्यवहार से प्रेरित है। जब मक्खियाँ पहली बार छत्ते से बाहर निकलती हैं, तो वे उसके आसपास छोटी-छोटी “सीखने वाली उड़ानें” भरती हैं। इसके बाद वे दूरी और दिशा का अंदाजा लगाकर लंबी यात्रा के बाद भी लगभग सीधे रास्ते से वापस लौट आती हैं।

डेल्फ़्ट यूनिवर्सिटी में बायो-प्रेरित AI के प्रोफेसर Guido de Croon ने कहा कि टीम इस बात से हैरान थी कि मक्खियाँ टेढ़े-मेढ़े रास्तों से दूर तक जाने के बावजूद अपने घर लौटने का रास्ता आसानी से ढूँढ़ लेती हैं।

इसी सिद्धांत को Bee-Nav सिस्टम में लागू किया गया। ड्रोन सबसे पहले अपने “घर” के आसपास छोटी उड़ान भरता है और आसपास के वातावरण की पैनोरमिक तस्वीरें रिकॉर्ड करता है। बाद में एक छोटा न्यूरल नेटवर्क इन तस्वीरों का विश्लेषण कर घर की दिशा और दूरी का अनुमान लगाता है।

केवल 3.4 किलोबाइट में रास्ता याद

शोध के प्रमुख लेखक और PhD छात्र Dequan Ou के मुताबिक, कई बार घर इतना छोटा होता है कि दिखाई भी नहीं देता या पेड़ों के पीछे छिप जाता है। इसलिए सिस्टम को दूरी और दिशा के अनुमान के आधार पर ट्रेन किया गया।

दिलचस्प बात यह रही कि “ओडोमेट्री ड्रिफ्ट” यानी समय के साथ दिशा और दूरी के अनुमान में होने वाली गड़बड़ी के बावजूद ड्रोन घर लौटने में सफल रहा। एक परीक्षण में तो केवल 3.4 किलोबाइट के न्यूरल नेटवर्क ने ही सही रास्ता पहचान लिया।

खेती में बड़ा बदलाव ला सकती है तकनीक

आज के अधिकांश GPS-रहित नेविगेशन सिस्टम विस्तृत डिजिटल मैप्स पर निर्भर करते हैं, जिससे उनकी लागत और बिजली खपत बढ़ जाती है। Bee-Nav आधारित ड्रोन को ऐसे मैप्स की जरूरत नहीं होगी। इससे भविष्य में छोटे, हल्के और ऊर्जा-कुशल ड्रोन विकसित किए जा सकेंगे।

शोधकर्ताओं का मानना है कि यह तकनीक खेती-बाड़ी में बेहद उपयोगी साबित हो सकती है। ऐसे हल्के ड्रोन फसलों की निगरानी कर सकेंगे, बीमारियों और कीटों का पता लगा सकेंगे और आसपास काम कर रहे लोगों के लिए भी सुरक्षित रहेंगे।

इनडोर में शानदार प्रदर्शन, बाहर अभी चुनौती

इस सिस्टम का परीक्षण घर के अंदर और बाहर दोनों जगह किया गया। बड़े इनडोर स्थानों, जैसे हैंगर, में यह हर बार सफल रहा। हालांकि तेज हवा वाले बाहरी माहौल में इसकी सफलता दर लगभग 70 प्रतिशत रही।

Dequan Ou ने कहा कि शुरुआती नतीजे बेहद उत्साहजनक हैं, लेकिन असली दुनिया की परिस्थितियों में इसे और अधिक मजबूत बनाने की जरूरत अभी बाकी है।

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