नई दिल्ली 10 जुलाई 2026। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने कैंसर को लेकर गंभीर चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि यदि मौजूदा रुझान जारी रहे और रोकथाम व उपचार की दिशा में प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो वर्ष 2050 तक दुनिया भर में कैंसर के नए मामलों की संख्या लगभग दोगुनी हो सकती है। संगठन का अनुमान है कि इस बीमारी का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष असर दुनिया की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी पर पड़ेगा।
WHO की नई रिपोर्ट के अनुसार, कैंसर वर्तमान में हृदय रोगों के बाद दुनिया में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। हर दिन 26,000 से अधिक लोगों की मौत कैंसर से होती है। फिलहाल दुनिया में हर वर्ष करीब 2.06 करोड़ नए कैंसर मामलों की पहचान होती है, जबकि लगभग 1 करोड़ लोगों की मौत इस बीमारी के कारण होती है। यदि वर्तमान स्थिति बनी रही, तो 2050 तक नए मामलों की संख्या बढ़कर 3.5 करोड़ तक पहुंच सकती है।
रिपोर्ट के मुताबिक, हर पांच में से एक व्यक्ति को अपने जीवनकाल में कभी न कभी कैंसर होने की आशंका है। फेफड़ों का कैंसर अब भी सबसे घातक प्रकार बना हुआ है और इससे सबसे अधिक मौतें होती हैं।
आय और स्वास्थ्य सुविधाओं में असमानता बड़ी चुनौती
WHO ने कहा कि कैंसर उपचार में उल्लेखनीय प्रगति के बावजूद मरीजों के जीवित रहने की संभावना काफी हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि वे किस देश में रहते हैं और उनकी आर्थिक स्थिति कैसी है।
उच्च आय वाले देशों में स्तन कैंसर और बच्चों के कैंसर के मरीजों की पांच वर्ष तक जीवित रहने की दर 85 प्रतिशत से अधिक है, जबकि कम आय वाले देशों में यह 45 प्रतिशत से भी कम है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि 23 देशों में रेडियोथेरेपी की सुविधा उपलब्ध नहीं है। वहीं, दुनिया के लगभग दो-तिहाई देशों में कैंसर उपचार को सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (Universal Health Coverage) का हिस्सा नहीं बनाया गया है। कई क्षेत्रों में इलाज का खर्च इतना अधिक है कि 90 प्रतिशत तक मरीज बीच में ही उपचार छोड़ देते हैं। अनुमान है कि कम से कम 45 प्रतिशत कैंसर मरीजों को इलाज के दौरान गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है, जिससे कैंसर चिकित्सा दिवालियापन का भी प्रमुख कारण बन रहा है।
2050 तक 92% आबादी किसी न किसी रूप में होगी प्रभावित
WHO का अनुमान है कि यदि मौजूदा स्थिति जारी रही, तो वर्ष 2050 तक दुनिया की लगभग 92 प्रतिशत आबादी कैंसर से किसी न किसी रूप में प्रभावित होगी। इसमें वे लोग भी शामिल होंगे जिन्हें स्वयं कैंसर होगा या जिनके परिवार के किसी करीबी सदस्य को यह बीमारी होगी।
संगठन ने सरकारों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और निजी क्षेत्र से लोगों पर केंद्रित स्वास्थ्य नीति अपनाने का आग्रह किया है। इसमें कैंसर की रोकथाम, समय पर जांच, सुलभ उपचार, मरीजों और उनके देखभालकर्ताओं को सहायता तथा शोध और नई तकनीकों को स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचाने पर विशेष जोर दिया गया है।
कैंसर वैक्सीन पर दुनिया भर में तेज़ हुआ शोध
रिपोर्ट के बीच कैंसर वैक्सीन के क्षेत्र में भी कई देशों में तेजी से शोध जारी है। रूस व्यक्तिगत मरीजों के ट्यूमर के आधार पर तैयार की जाने वाली पर्सनलाइज्ड mRNA कैंसर वैक्सीन विकसित कर रहा है। हाल ही में मेलेनोमा के लिए Neooncovac और कोलोरेक्टल कैंसर के लिए Oncopept नामक दो प्रायोगिक उपचारों को क्लिनिकल उपयोग की मंजूरी दी गई है। शुरुआती चरण में इनसे जुड़े मरीजों में सकारात्मक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया देखने को मिली है।
इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, क्यूबा और चीन भी स्वीकृत उपचारों, क्लिनिकल परीक्षणों और पर्सनलाइज्ड mRNA प्लेटफॉर्म के माध्यम से कैंसर वैक्सीन विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ये प्रयास सफल होते हैं, तो भविष्य में कैंसर उपचार के तरीके में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है।














